भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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२० धनुर्वेदसंहिता कैशिक चित्रयुद्ध में और अधोलक्षों में सात्विक तथा बत्सकर्ण सदा जानना और गूढ़ भेद में भरत और दृढ़ भेद में तथा दूर बाण फेंकने को स्कंधनाम व्याय कहा है॥९३॥ अथ लक्ष्यम् लक्ष्यं चतुर्विधं ज्ञेयं स्थिरं चैव चलं तथा । चलाचलं द्वयचलं वेधनीयं क्रमेण तु ॥९४॥ अब निशाना कहते हैं, चार प्रकार का लक्ष्य जानना एक स्थिर, दूसरा चल, तीसरा चलाचल, चौथा द्वयचल इनको क्रमसे वेधना चाहिये॥९४॥ आत्मानं सुस्थिरं कृत्वा लक्ष्यं चैव स्थिरं बुधः । वेधयेत्त्रिप्रकारं तु स्थिरवेधी स उच्यते ॥९५॥ बुद्धिमान् अपने को स्थिर करके तीनों प्रकार के संधानों से लक्ष्य को वेधे वह स्थिरवेधी कहाता है, तीन प्रकार पहिले कह चुके हैं॥९५॥ चलन्तु वेधयेद्यस्तु आत्मस्थानेषु संस्थितः । चलं लक्ष्यं तु तत्प्रोक्तमाचार्येण शिवेन वै ॥९६॥ चलते हुए को जो अपने स्थान पर बैठा हुआ वेधे उसको युद्ध के आचार्य शिवजी महाराज चल लक्ष्य कहते हैं॥९६॥ धन्वी तु चलते यत्र स्थिरलक्ष्ये समाहितः । चलाचलं भवेत्तच्च ह्यप्रमेयमचिंतितम् ॥९७॥ जहाँ धनुषधारी तो स्थिर लक्ष्यपर सावधान होकर चलता है, उसका नाम चलाचल है, जो चिंतन में नहीं आता है यह अत्यंत उत्तम लक्ष्य है॥९७॥ उभावेव चलौ यत्र लक्ष्यं चापि धनुर्द्धरः । तद्विज्ञेयं द्वयचलं श्रमेण बहु साध्यते ॥९८॥ जहाँ धनुषधारी और लक्ष्य दोनों चलते हों उसको द्वयचल जानो, वह बड़ी मेहनत से सिद्ध होता है॥९८॥ श्रमेणास्खलितं लक्ष्यं दूरं च बहुभेदनम् ।