धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता २५ नाराचास्तस्य सिध्यंति यस्य तुष्टो महेश्वरः ॥२३॥ छः महीने में मुट्ठी सिद्ध होती है और बाण एक वर्ष में सिद्ध होते हैं, नाराच उसके सिद्ध होते हैं, जिस पर श्रीमहादेवजी प्रसन्न हों॥२३॥ पुष्पवद्धारयेद्वाणं सर्पवत्पीडयेद्धनुः । धनवच्चिंतयेल्लक्ष्यं यदिच्छेत्सिद्धिमात्मनः ॥२४॥ यदि अपनी सिद्धि चाहे तो फूल की तरह बाण धारण करे, साँप की तरह धनुष को पीडन करे, धन की तरह लक्ष्य का चिंतन करे॥२४॥ क्रियामिच्छन्ति चाचार्या दूरमिच्छन्ति भार्गवाः । राजानो दृढमिच्छन्ति लक्ष्यमिच्छन्ति चेतरे ॥२५॥ आचार्य तो क्रिया की इच्छा करते हैं और भृगुवंशी बाण दूर जाकर पड़े यह इच्छा करते हैं, राजा अंग दृढ़ वस्तु कट जाय ऐसी इच्छा करते हैं और लोग लक्ष्य (निशाना) अच्छा लगे, इसकी इच्छा करते हैं॥२५॥ जनानां रंजनं येन लक्ष्यपातातप्रजायते । हीनेनापीषुणा तस्मात्प्रशस्तं लक्ष्यवेधनम् ॥२६॥ जिस लक्ष्य के मारने से मनुष्यों का चित्त प्रसन्न हो, इससे छोटे बाण से भी लक्ष्य का बींधना अच्छा है छोटे बाण से निशाना अच्छा बिंधता है यह बात सिद्ध हुई॥२६॥ अथ लक्ष्यास्खलनविधिः विशाखस्थानकं हित्वा समसंधानमाचरेत् । गोपुच्छमुखबाणेन सिंहकर्णे न मुष्टिना ॥२७॥ आकर्षेत्कौशिकव्याये न शिखाञ्चालयेत्ततः । पूर्वापरौ समं कार्यौ समासौ निश्चलौ करौ ॥२८॥ चक्षुषी स्पंदयेन्नैव दृष्टिं लक्ष्ये नियोजयेत् । मुष्टिनाऽऽच्छादितं लक्ष्यं शरस्याग्रे नियोजयेत् ॥२९॥ मनो दृष्टिगतं कृत्वा ततः काण्डं विसर्जयेत् ॥