भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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२६ धनुर्वेदसंहिता स्खलत्येव कदाचिन्न लक्ष्ये योधो जितश्रमः ॥३०॥ अब निशाना न चूकने की विधि, विशाख स्थान को छोड़कर समसंधान करे, समसंधान के लक्षण पहिले कह आये हैं, गोपुच्छमुख बाण से और सिंहकर्ण मुष्टि से, कौशिकव्याय से खैंचे और शिखा को भी न चलावे, पूर्व और पर समान करे, दोनों कंधे बराबर करे,और दोनों हाथों को हिलने न दे, आँखों को किंचित् भी न चलावे निगाह को निशाने पर जोड़े, मुट्ठी से लक्ष्य को ढ़ककर बाण के आगे करे, मन को दृष्टि से करके अर्थात् जहाँ निशाने पर दृष्टि हो वहां ही मन देकर पीछे बाण छोड़े, इस विधि से जितश्रम योद्धा कभी भी निशाने से नहीं चूकता है, क्योंकि उसने श्रम से लक्ष्य को जीत लिया॥२७-३०॥ अथ शीघ्रसंधानम् आदानं चैव तूणीरात्संधानं कर्षंणं तथा । क्षेपणं च त्वरायुक्तो बाणस्य कुरुते तु यः ॥३१॥ नित्याभ्यासवशात्तस्य शीघ्रसंधानता भवेत् । अब शीघ्रसंधान कहते हैं, जो पुरुष भाथे में से बाण लेकर संधान करके कर्षण करे, फिर जल्दी ही क्षेपण करे वह ऐसे नित्य के अभ्यास से शीघ्र संधानता हो जाती है॥३१॥ अथ दूरपातित्वम् मुष्ट्यापताकया बाणं स्त्रीचिह्नं दूरपातनम् ॥३२॥ पताका नाम मुष्टि से स्त्री चिह्न वाले बाण को फेंके तो दूर पड़े॥३२॥ अथ दृढभेदिता प्रत्यालीढे कृते स्थाने ह्यधःसंधानमाचरेत् । दर्दुरस्थानमास्थाय ह्यूर्ध्वं धारणमाचरेत् ॥३३॥ स्कंधव्यायेन वज्रस्य मुष्ट्या पुंमार्गेण च ।