भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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हिन्दीटीकासमेता २७ अत्यन्तसौष्ठवाद्वाह्वोर्जायते दृढभेदिता ॥३४॥ पत्यालीढ़ स्थान किये पीछे अधःसंधान करै और दर्दुर स्थान से स्थित होकर ऊर्ध्वसंधान करे, स्कंधव्याय से वज्रमुष्टि और पुरुष बाण समसंधान करै, ऐसा करने से बहुत अच्छी दृढ़भेदिता हाथों से ही बाणों की हो जाती है॥३३-३४॥ अथ हीनगतयः सूचीमुखा मीनपुच्छा भ्रमरी च तृतीयाका । शराणां गतयस्तिस्रः प्रशस्ताः कथिता बुधैः ॥३५॥ अब हीन गतियों का वर्णन करते हैं। सूचीमुख १ मीनपुच्छ २ तीसरी भ्रमरी ३ ये बाणों की तीन चाल श्रेष्ठ कही हैं॥३५॥ सूचीमुखा गतिस्तस्य सायकस्य प्रजायते । पत्रं विलोकितं यस्य ह्यथवा हीनपत्रकम् ॥३६॥ जिस बाण के पर देखे हों, अर्थात् परवाला हो, अथवा पर रहित हो, उस बाण की सूचीमुख चाल हो जाती है॥३६॥ कर्करीतन्तु चापेन यैः कृष्टो हीनमुष्टिना । मत्स्यपुच्छा गतिस्तस्य सायकस्य प्रकीर्तिता ॥३७॥ जिस बाण को कठिन धनुष और पूर्वोक्त हीन मुष्टि से खैंचा जाय उसकी मत्स्यपुच्छा गति श्रीमहादेवजी महाराज ने कही है॥३७॥ भ्रमरी कथिता ह्येषा शिवेन श्रमकर्मणि । ऋजुत्वेन विना याति क्षेप्यमाणस्तु सायकः ॥३८॥ फेंका हुआ जो बाण सीधापन के विना ही जाय इसको शिवजी महाराज ने श्रमकर्म में भ्रमरी कहा है पूर्वोक्त तिर्यग्गत लक्ष्य वेधन के लिये श्रेष्ठ हैं॥३८॥ अथ बाणानां लक्ष्यस्खलनगतयः वामगा दक्षिणा चैव ऊर्ध्वगाऽधोगमा तथा । चतस्रो गतयः प्रोक्ता बाणस्खलनहेतवः ॥३९॥