भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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३६ धनुर्वेदसंहिता ततो धीमहि देवस्य ततो भर्गो वरेण्यम् । सवितुस्तच्च योक्तव्यममुकशत्रुं तथैव च ॥८७॥ ततो हन हन हुंफट् जप्त्वा पूर्वं द्विलक्षकम् । अभिमंत्र्य शरं तद्वत्प्रक्षिपेच्छत्रुषु स्फुटम् ॥८८॥ नश्यन्ति शत्रवः सर्वे यमतुल्या अपि ध्रुवम् । एतदेव विपर्यस्तं जपेत्संहारसिद्धये ॥८९॥ ब्रह्मदण्ड कहते हैं, पहिले प्रणव उच्चारण कर पीछे प्रचोदयात् पीछे नो यो धियो क्रम से पीछे धीमहि देवस्य, पीछे भर्गो वरेण्यम्, पीछे सवितुः जोड़कर अमुक शत्रु को वैसेहि जोड़े पीछे हन हन हुंफट् जपकर दो लाख बाण का मंत्रितकर शत्रुओं पर फेंके, सारे शत्रु यदि यमराज के तुल्य हों तो भी नाश हो इसी को संहार की सिद्ध के लिये उलटा जपे॥८६-८९॥ ब्रह्मशिरः प्रवक्ष्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् । धियो यो नः प्रचोदयात् भर्गोदेवस्य धीमहि ॥९०॥ तत्सवितुर्वरेण्यं शत्रून्मे हनहनेति च । हुंफट् चैव प्रयोक्तव्यं क्षिपेद्ब्रह्मशिरस्ततः ॥९१॥ पुरश्चर्यां पुरः कृत्वा त्रिलक्ष्यं नियतः शुचिः । नश्यन्ति सर्वे रिपवः सर्वे देवाः सुरा अपि ॥९२॥ इदमेव प्रयोक्तव्यं विपर्यस्तं विकर्षणे ॥९३॥ ब्रह्मशिर अस्त्र को कहते हैं, पहिले प्रणव उच्चारण करे पीछे तत्सवितुर्वरेण्यं शत्रून्मे हन २ हुं फट् जोड़ना चाहिये पीछे ब्रह्म शिर को फेंके, तीन लाख का पुरश्चरण करके पवित्र होके देवता वा असुर कोई शत्रु हो सब नाश को प्राप्त हों और इसी को संहार के निमित्त उलटा जपे॥९०-९३॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि चास्त्रं पाशुपतं तव । यस्य विज्ञातमात्रेण नश्यन्ति सर्वशत्रवः ॥९४॥ दादिदन्तां च सावित्रीं प्रोच्य प्रणवमेव च । श्लीं पशुं हुंफट् अमुकशत्रून् हन हन हुंफट् ॥९५॥ जप्त्वा पूर्वं द्विलक्षं च ततः पाशुपतं क्षिपेत् ॥