धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ धनुर्वेदसंहिता न तस्य रिपुभिः शक्तिर्बलिष्ठैरपि हन्यते ॥२४॥ शत्रुओं के प्रहारों से जो पूर्ण अंगों की रक्षा करते हैं उनकी शक्ति को बलवान् शत्रु भी नहीं हनन कर सकते हैं॥२४॥ अगुष्ठतर्जनीवंशे पादाङ्गुष्ठे तथा ध्वनिः । युद्धकाले प्रकर्तव्या लक्षयोधजयी भवेत् ॥२५॥ अँगूठा तर्जनी के बाँस में और पैर के अँगूठे में वैसे ही ध्वनि करनी चाहिये ऐसा करने से लाख योद्धाओं को जीतने वाला हो॥२५॥ भूतत्वे ह्युदरं रक्षेत्पादौ रक्षेज्जलेन च । ऊरू च वह्नितत्वेन करौ रक्षेच्च वायुना ॥ व्योमतत्वे शिरो रक्षेदेवं योधो जयी भवेत् ॥२६॥ जब पृथ्वी का तत्व हो, तब उदर में चोट लगती है इससे चाहिये कि, जब पृथ्वीतत्व हो तब पेट की रक्षा ढाल आदि से करे, जल के बहने में पादों की रक्षा करे, अग्नितत्व के समय ऊरुओं को बचावे, वायु से हाथों को बचावे, आकाश हो जब शिर की रक्षा करे तो ऐसा योद्धा जीतने वाला होता है॥२६॥ सूर्ये पूर्वे चोत्तरे च मुखं कृत्वा जयेन्नरः । चन्द्रे मुखं सदा कुर्याद्दक्षिणे पश्चिमे सुधीः ॥२७॥ चिरयुद्धे शुभश्चन्द्रः शीघ्रयुद्धे रविस्तथा ॥ दूरयुद्धे जयी चन्द्रः समीपस्थे दिवाकरः ॥२८॥ सूर्य में पूर्व और उत्तर दिशा में मुख करके जीते, चन्द्रमा में सदा दक्षिण और पश्चिम में मुख करे तो जीते, बहुत देर तक युद्ध करना हो तो चन्द्रमा का स्वर अच्छा है, और जल्दी करना हो तो सूर्य का और दूर के युद्ध में चन्द्र और समीप के युद्ध में सूर्य जीतने वाला होता है॥२७-२८॥ आकृष्य प्राणपवनं समारोहेत्तु वाहनम् । समुत्तरेत्पदं दद्यात्सर्वकार्याणि साधयेत् ॥२९॥ प्राण पवन को खैंचकर सवारी पर चढ़े, अर्थात् कुम्भक करके चढ़े, रेचक करता हुआ उतरे तो सब कामों की सिद्धि करे॥२९॥