धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
पृष्ठ 49, कुल 76 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासमेता ४३ न कालो विविधं घोरं न शस्त्रं न च पन्नगाः । न शत्रुव्याधिचौराद्याःशून्यस्था नाशितुं क्षमाः ॥१३०॥ न तो काल, न विविध प्रकार के शस्त्र, न साँप, न शत्रु, न शरीर का रोग, न चोर आदि क्रूर स्वभाव वाले शून्य स्वर में स्थित हुए नाश करने को समर्थ हो सकते हैं॥१३०॥ अयनतिथिदिनेशैः स्वीयतत्वेश्चयुक्तो यदि वहति कदा- चिद्दैवयोगेन पुंसाम् ॥ स जयति रिपुसैन्यं स्तम्भमात्र- स्वरेण प्रभवति न च विघ्नं केशवस्यापि लोके ॥१३१॥ उत्तरायण सूर्य की तिथि और सूर्यस्वर अग्नि तत्व वा वायु तत्व से युक्त होकर कदाचित् दाहिना स्वर अपने आप चले जिस किसी का वह स्वर के स्तम्भ मात्र से ही शत्रु की सेना को जीते और केशव के लोक में भी विघ्न न हो॥१३१॥ जीवेन शस्त्रं बध्नीयाज्जीवेनैव विकाशयेत् । जीवेन प्रक्षिपेच्छस्त्रं युद्धे जयति सर्वदा ॥१३२॥ स्वर से ही शस्त्र बाँधे और स्वर से ही निकाले तथा स्वर से ही फेंके तो युद्ध में सदा जीते॥१३२॥ वामनाड्युदये चन्द्रः कर्तव्यो वामसम्मुखः । सूर्यचारे तथा सूर्यः पृष्ठे दक्षिणगो जयेत् ॥१३३॥ जब बायाँ स्वर चलता हो तब चन्द्रमा बायें वा सम्मुख करना चाहिये, सूर्य के चलते समय सूर्य को वैसे ही पीठ पीछे अथवा दाहिने करे॥१३३॥ दीप्ते कार्ये नाडी परदिशि जीविता सदा कुर्यात् । शान्ते च जीवसहिता त्वेवं सिद्ध्यन्ति कार्याणि ॥१३४॥ क्रूर काम में दूसरे की ओर सदा निर्जीव नाड़ी करे और शान्तकर्म में चलती हुई नाड़ी करे तो कार्य सिद्ध हो॥१३४॥ तत्त्वबलान्नाडीबलमधिकं प्रोक्तं कपर्दिना नियतम् । ज्ञात्वैनं स्वरचारं नरो भवेत्कार्यनिपुणमतिः ॥१३५॥ अब इस शंका को दूर करते हैं, कि तत्वज्ञान तो बड़ा कठिन है, किसी