भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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४४ धनुर्वेदसंहिता किसी को होता है तो वशिष्ठजी विश्वामित्र से कहते हैं, कि तत्वबल से नाड़ी बल अधिक है, यह बात श्रीजटाधारी महादेवजी महाराज ने परशुरामजी से निश्चय ही कह दी है, इस स्वर की गति को जानकर मनुष्य अपने कार्य करने में निश्चय ही चतुर बुद्धि होता है॥३५॥ इति स्वरबलयुद्धम् अथ राहुयुक्तयोगिनीबलयुद्धं व्याख्यास्यामः न देयमिदं क्रूराय कुबुद्धयेऽशांताय गुरुद्रोह्यभक्तायेति । देयमिदं ब्रह्मचारिणे धर्मतः प्रजापालदुष्टदण्डविधारिणे साधुरक्षकाय इत्येव प्रवचनमिति ॥३६-३७॥ अब राहुयुक्त योगिनी बल युद्ध को कहते हैं यह (बुद्धि) युद्ध प्रकार क्रूरबुद्धि शांति रहित गुरुद्रोही अभक्त को न देना और ब्रह्मचारी जो हो और धर्म से प्रजा का पालन जो करे (दुष्ट) खोटे पुरुषों को जो दण्ड दे (साधु) अच्छे पुरुषों की जो रक्षा करे ऐसे को दे, इतना ही वचन है॥३६-३७॥ राहुयुक्त योगिनीबल प्रतिपन्नवम्यां प्रथमेर्धयामे राहुयुक्ता योगिनी पूर्वस्यां दिशि स्थिता भवति ॥१॥ द्वितीया दशम्यां पञ्चमेर्धयामे राहुसहिता शिवा प्रतीच्यामुदेति ॥२॥ तृतीयैकादश्यां तृतीये अर्धयामे तमःसंमिलिता पार्वती याम्यां परिभ्रमति ॥३॥ चतुर्थ्यां द्वादश्यां तु सप्तमेऽर्धयामे राहुणा सहनगजा चोत्तरे ज्ञेया ॥४॥ पञ्चम्यामथ त्रयोदश्यामष्टमेऽर्धयाम स्वर्भानुयुता गौरी नैर्ऋत्यामटति ॥५॥ गुहतिथौ चतुर्दश्यां च कात्यायनी पवनालये चायाति ॥६॥ सप्तमीपूर्णिमायां चतुर्थेऽर्धप्रहरे विधुंतुदेन साकं योगिनी मैशान्यां जानीयात् ॥७॥ अष्टम्यमायां षष्ठेऽर्द्धयामे