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धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

हिन्दीटीकासमेता ४३ न कालो विविधं घोरं न शस्त्रं न च पन्नगाः । न शत्रुव्याधिचौराद्याःशून्यस्था नाशितुं क्षमाः ॥१३०॥ न तो काल, न विविध प्रकार के शस्त्र, न साँप, न शत्रु, न शरीर का रोग, न चोर आदि क्रूर स्वभाव वाले शून्य स्वर में स्थित हुए नाश करने को समर्थ हो सकते हैं॥१३०॥ अयनतिथिदिनेशैः स्वीयतत्वेश्चयुक्तो यदि वहति कदा- चिद्दैवयोगेन पुंसाम् ॥ स जयति रिपुसैन्यं स्तम्भमात्र- स्वरेण प्रभवति न च विघ्नं केशवस्यापि लोके ॥१३१॥ उत्तरायण सूर्य की तिथि और सूर्यस्वर अग्नि तत्व वा वायु तत्व से युक्त होकर कदाचित् दाहिना स्वर अपने आप चले जिस किसी का वह स्वर के स्तम्भ मात्र से ही शत्रु की सेना को जीते और केशव के लोक में भी विघ्न न हो॥१३१॥ जीवेन शस्त्रं बध्नीयाज्जीवेनैव विकाशयेत् । जीवेन प्रक्षिपेच्छस्त्रं युद्धे जयति सर्वदा ॥१३२॥ स्वर से ही शस्त्र बाँधे और स्वर से ही निकाले तथा स्वर से ही फेंके तो युद्ध में सदा जीते॥१३२॥ वामनाड्युदये चन्द्रः कर्तव्यो वामसम्मुखः । सूर्यचारे तथा सूर्यः पृष्ठे दक्षिणगो जयेत् ॥१३३॥ जब बायाँ स्वर चलता हो तब चन्द्रमा बायें वा सम्मुख करना चाहिये, सूर्य के चलते समय सूर्य को वैसे ही पीठ पीछे अथवा दाहिने करे॥१३३॥ दीप्ते कार्ये नाडी परदिशि जीविता सदा कुर्यात् । शान्ते च जीवसहिता त्वेवं सिद्ध्यन्ति कार्याणि ॥१३४॥ क्रूर काम में दूसरे की ओर सदा निर्जीव नाड़ी करे और शान्तकर्म में चलती हुई नाड़ी करे तो कार्य सिद्ध हो॥१३४॥ तत्त्वबलान्नाडीबलमधिकं प्रोक्तं कपर्दिना नियतम् । ज्ञात्वैनं स्वरचारं नरो भवेत्कार्यनिपुणमतिः ॥१३५॥ अब इस शंका को दूर करते हैं, कि तत्वज्ञान तो बड़ा कठिन है, किसी

४४ धनुर्वेदसंहिता किसी को होता है तो वशिष्ठजी विश्वामित्र से कहते हैं, कि तत्वबल से नाड़ी बल अधिक है, यह बात श्रीजटाधारी महादेवजी महाराज ने परशुरामजी से निश्चय ही कह दी है, इस स्वर की गति को जानकर मनुष्य अपने कार्य करने में निश्चय ही चतुर बुद्धि होता है॥३५॥ इति स्वरबलयुद्धम् अथ राहुयुक्तयोगिनीबलयुद्धं व्याख्यास्यामः न देयमिदं क्रूराय कुबुद्धयेऽशांताय गुरुद्रोह्यभक्तायेति । देयमिदं ब्रह्मचारिणे धर्मतः प्रजापालदुष्टदण्डविधारिणे साधुरक्षकाय इत्येव प्रवचनमिति ॥३६-३७॥ अब राहुयुक्त योगिनी बल युद्ध को कहते हैं यह (बुद्धि) युद्ध प्रकार क्रूरबुद्धि शांति रहित गुरुद्रोही अभक्त को न देना और ब्रह्मचारी जो हो और धर्म से प्रजा का पालन जो करे (दुष्ट) खोटे पुरुषों को जो दण्ड दे (साधु) अच्छे पुरुषों की जो रक्षा करे ऐसे को दे, इतना ही वचन है॥३६-३७॥ राहुयुक्त योगिनीबल प्रतिपन्नवम्यां प्रथमेर्धयामे राहुयुक्ता योगिनी पूर्वस्यां दिशि स्थिता भवति ॥१॥ द्वितीया दशम्यां पञ्चमेर्धयामे राहुसहिता शिवा प्रतीच्यामुदेति ॥२॥ तृतीयैकादश्यां तृतीये अर्धयामे तमःसंमिलिता पार्वती याम्यां परिभ्रमति ॥३॥ चतुर्थ्यां द्वादश्यां तु सप्तमेऽर्धयामे राहुणा सहनगजा चोत्तरे ज्ञेया ॥४॥ पञ्चम्यामथ त्रयोदश्यामष्टमेऽर्धयाम स्वर्भानुयुता गौरी नैर्ऋत्यामटति ॥५॥ गुहतिथौ चतुर्दश्यां च कात्यायनी पवनालये चायाति ॥६॥ सप्तमीपूर्णिमायां चतुर्थेऽर्धप्रहरे विधुंतुदेन साकं योगिनी मैशान्यां जानीयात् ॥७॥ अष्टम्यमायां षष्ठेऽर्द्धयामे

.हिन्दीटीकासमेता ४५ रुद्राणी तमोयुक्ताऽऽग्नेय्यामीक्ष्यते ॥८॥ इति राहुयुक्ता योगिनी उपग्राह्या द्वितीयेऽर्द्धयामे सैंहिकेययुता ॥९॥ पड़वा (प्रतिपदा) और नवमी को पहिले आधे प्रहर में राहु सहिता योगिनी पूर्वदिशा में स्थित होती है॥१॥ द्वितीया और दशमी पाँचवें आधे प्रहर में राहु के साथ योगिनी पश्चिम में उदय होती है॥२॥ तृतीया और एकादशी को तीसरे आधे याम में राहु के साथ योगिनी दक्षिण में घूमती है॥३॥ चौथ और द्वादशी के सातवें आधे याम में राहु के साथ योगिनी उत्तर में जाननी॥४॥ पञ्चमी और त्रयोदशी के आठवें आधे प्रहर में राहु के साथ योगिनी दूसरे नैर्ऋत्य कोण में रहती है॥५॥ षष्ठी और चौदश को राहु के साथ योगिनी दूसरे आधे याम में वायु कोण में चलती है॥६॥ सप्तमी और पूर्णिमा में चौथे आधे प्रहर में राहु के साथ योगिनी ईशान कोण में जाननी॥७॥ अष्टमी और अमावस को छठे आधे याम में योगिनी राहु के साथ अग्निकोण में दिखाई देती है॥८॥ ऐसे राहु के साथ योगिनी ग्रहण करनी चाहिये॥९॥ अथ व्यूहादिभिर्युद्धकथनम् ये राजपुत्राः सामन्ता आप्ताः सेवकजातयः ॥ तान्सर्वा- नात्मनः पार्श्वे रक्षायै स्थापयेन्नृपः॥३८॥परस्परानुरक्ता ये योधाः शार्ङ्गधनुर्धराः । युद्धज्ञास्तु रथाारूढास्ते जयन्ति रणे रिपून् ॥३९॥ एकः कापुरुषो दीर्णो दारयेन्महती चमूम् ॥ तद्दीर्णमनुदीर्यन्ते योधाः शूरतमा अपि॥४०॥ अतो वै कातरं राजा बले नैव नियोजयेत् । द्वाविमौ पुरुषौ लोके सूर्यमंडलभेदिनौ॥४१॥परिव्राड्योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥ यत्र यत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः ॥४२॥ अक्षयं लभते लोकं यदि क्लीबं न भाषते । मूच्छितं नैव विकलं नाशस्त्रं नान्ययोधिनम् ॥४३॥ पलायमानं शरणं गतं चैव न हिंसयेत् ॥ भीरुः पलायमानोपि नान्वेष्टव्यो बलीयसा ॥४४॥ कदाचि- च्छूरतां याति शरणे कृतनिश्चयः ॥ संभृत्य महतीं सेनां

४६ धनुर्वेदसंहिता चतुरंगं महीपतिः ॥४५॥ व्यूहयित्वाऽग्रतः शूरान्स्थाप- येज्जयलिप्सया । पृष्ठेन वायवो वांति पृष्ठे भानुर्वयांसि च ॥४६॥ अनुप्लवन्ते मेघाश्च यस्य तस्य रणे जयः ॥ अपूर्णेनैव मर्तव्यं संपूर्णेनैव जीवनम् ॥४७॥ तस्माद्धैर्यं विधायैव हन्तव्या परवाहिनी ॥ जिते लक्ष्मीर्मृते स्वर्गः कीर्तिश्च धरणीतले ॥ तस्माद्धैर्यं विधायैव हन्तव्या परवाहिनी ॥४८॥ अब व्यूहादि उपायों से युद्ध कथन करते हैं, जो राजपुत्र (सामन्त) अर्थात् जो अपने भाई बेटे हों, तथा अपने अधीन हों यथार्थ बात कहने वाले नौकर उन सभी को राजा अपने पास चारों ओर रखे और जो योद्धा आपस में प्रेम रखते हों, शार्ङ्ग (धनुष) धारण करने वाले, युद्धरीति जानने वाले घोड़ों के सवार, वे संग्राम में शत्रुओं को जीतते हैं एक भी कायर भगेड़ा सेना में हो तो बड़ी भारी सेना को हरवा देता है, उस डराये हुए शूरवीर के योद्धा भी पीछे भाग जाते हैं, इस कारण राजा डरपोक सेनापति वा पदचरादि नौकर सेना में भरती न करे, दो पुरुष सूर्य के लोक से ऊपर जाते हैं, योगयुक्त संन्यासी और जो संग्राम में सम्मुख होकर मरे, जहाँ २ शूरवीर शत्रुओं से घिरा हुआ मारा जाय। वह (अक्षय) स्वर्गलोक को पाता है, यदि चेत् क्लीब वचन अर्थात् हीन वचन न बोले तो जिस शत्रु को मूर्च्छा आ गई हो और घबरा रहा हो, हथियार पास न हो, वा दूसरे से लड़ाई कर रहा हो, भाग निकला हो, शरण में आ गया हो ऐसे को न मारे, डरपोक शत्रु भाग चला हो तो बलवान् उसको ढूँढ़े नहीं, क्योंकि कभी वह शूरता को प्राप्त हो जाय तो संग्राम का निश्चयकर अर्थात् अपना मरना ठानकर वह मार देता है, इस हेतु भागे हुए शत्रु को ढूँढ़ना योग्य नहीं है॥ बहुत सी सेना इकट्ठी करके चतुरंगिणी अर्थात् हाथी, रथी, घोड़ों के सवार और पैदल एकत्र करके इनका व्यूह बनाकर सबसे आगे शूरवीरों को रखे जीतने की इच्छा से जिसकी सेना की पीठ पीछे, सतर ३ का वायु चलता हो और पीठ पीछे सूर्य हो, तथा पक्षी पीछे उड़ते हों पीठ पीछे की वर्षा हो

३. खड्ग, चक्र, गदा, शक्ति, पाश, रथ-युद्ध एवं धनुर्वेद संहिता उपसंहार

हिन्दीटीकासमेता ४७ उसकी ही रण में जीत होती है। यदि शत्रुओं को बन्धस्वर में रखे तो न मरे और चलते स्वर को रखे तो मारा जाय, इस हेतु धैर्य करके ही शत्रु की सेना मारनी चाहिये, जीत जाय तो धन मिले,और रण में मारा जाय तो स्वर्ग मिले,पृथिवी पर कीर्ति हो इससे धैर्य करके ही शत्रु की सेना मारनी चाहिये॥३८-४५॥ अधर्मः क्षत्रियस्यैष यद्व्याधिमरणं गृहे । यदाजौ निधनं याति साऽस्य धर्मः सनातनः ॥४९॥ वसिष्ठजी कहते हैं हे विश्वामित्र! रोगी होकर घर में मरना क्षत्रियों के लिये अधर्म से मरना है जो कि, संग्राम में मरना है वह इसका सनातन धर्म है॥४९॥ अथ व्यूहानाह युवास्वरे मध्यसेना युद्धं कुर्यादतंद्रिता । द्वे सेने पार्श्वयोश्चैका पृष्ठतो रक्षयेत्सदा ॥ एकां विकटसेनां तु दूरस्थां भ्रामयेद्युधि ॥५०॥ युवा स्वरवाली मध्य सेना घूमती हुई, सामने के

४८ धनुर्वेदसंहिता प्रथमारम्भव्यूह यौद्धीसेना युवास्वर राजा पृष्ठसेना पार्श्वस्था. पार्श्वस्था. विकट सेना

हिन्दीटीकासमेता ४९ जानने, इतने तथा और और व्यूह बनाकर सेनापति सदा चले, बलाध्यक्षादिकों को सब दिशाओं में नियुक्त करे॥५१॥५२॥ दण्डव्यूह सर्वतो भये दण्डव्यूहरचना कार्या । चारों ओर से जब घिर जावे तब दण्डव्यूह रचकर युद्ध करे। इनका चित्र आगे देखिये

५० धनुर्वेदसंहिता पतिकव्यूह राजा पृष्ठतो भये शकटव्यूहः । पीछे से भय हो तब शकटव्यूह रचै ॥ वराहव्यूह पार्श्वभये वराहव्यूहो वा गरुडव्यूहो विधेयः ॥५३॥ दाहिनी ओर से और बाईं ओर भय उपस्थित होने पर वराहव्यूह वा गरुडव्यूह करना चाहिये॥५३॥

हिन्दीटीकासमेता ५१ च क्षु गरुडव्यूह ग्रीवा राजा पुच्छ मकरव्यूह राजा

५२ धनुर्वेदसंहिता अग्रतो भये पिपीलिकाव्यूहः । आगे से भय हो तब पिपीलिका व्यूह रचै ॥ पिपीलिकाव्यूह सूचिव्यूह राजा राजा पद्मव्यूह पैदल घोडा पैदल घोडा पैदल घोडा पैदल घोडा राजा घोडा पैदल घोडा पैदल घोडा पैदल घोडा पैदल

हिन्दीटीकासमेता ५३ दिग्व्यूह अर्द्धचन्द्र राजा चतुष्पथव्यूह राजा

५४ धनुर्वेदसंहिता सर्वतोभद्र ई. पू. आ. षष्ठेनैर्ऋत्यमुखः सप्तमे पश्चिममुखः अष्टमे वायव्यमुखः चतुर्थे दक्षिणमुखः प्रथमे उत्तरमुखः यामार्द्धे दिनयुद्धचक्रम् १ रात्रौ व्यलीकः तृतीयेऽग्निमुखः द्वितीय ईशानमुखः पंचमे पूर्वमुखः

? No, ल Bottom: ध्यप? Or just ध्य? Wait, could it be "बलध्यक्ष" or "बलप"? Look at how 3 is written: से ना नी 3 letters, vertical stack! Now look at 2: से ना प ति 4 letters, vertical stack! Now look at 1: प रि वृ ढः 4 letters, vertical stack! Now look at 8: अ ग्र णी (or ज?) - 3 letters (अ-ग्र-णी or अ-ग्र-ज)! Now look at 7: ना य क 3 letters, vertical stack! Now look at 6: यू थ प 3 letters, vertical stack! Now look at 5: Look at 5: it has 3 letters! Letter 1: ब (or द / व) Letter 2: ल Letter 3: प (or श) If it's 3 letters: दलप or बलप! Now look at 4: It has 3 letters! Letter 1: ब (or व) Letter 2: ल Letter 3: प (or ध्य?) Wait, why would 4 and

५६ धनुर्वेदसंहिता हो वहाँ ढाल तलवार भाले बरछी आदि से लड़ें, युद्ध के अहंकारियों को सेना के अग्र में स्थापन करे, औरों को पीछे रखे॥५४॥ अथ सेनानयः तत्रादौ व्याकरणशिक्षां वक्ष्यामो राज्ञे । नृपतिर्लोट्लका- रस्य कुर्यात्कंठस्थितानि च । रूपाणि कार्यसिद्धयर्थं ह्याज्ञैषा मम गाधिज ॥ मध्यमपुरुषस्यैव प्रयोगान्यो विचिन्तयेत् ॥५५॥ सेनानीः प्रतिदिनं सम्यङ् न केनापि स हन्यते । मध्यमपुरुषोद्भूताः प्रयोगाः सर्वसिद्धिदाः ॥५६॥ तैरेव साधयेदाज्ञां पुरुषा राजभृत्यकाः ॥५७॥ अब सेना के कवायद का प्रकरण कहते हैं, उसके आदि में व्याकरण की शिक्षा को कहते हैं कि, राजा के लिये कितना व्याकरण पढ़ना चाहिये, राजा नव लकारों के रूप छोड़कर केवल लोट् लकार के रूपों को कार्य की सिद्धि के लिये कंठ करे, हे विश्वामित्र! मेरी यह आज्ञा है और जो सेनापति लोट् लकार के मध्यम पुरुष के ही रूप याद करे, वह किसी से भी न मारा जाय, मध्यम पुरुष के बहुवचन के प्रयोग ही सिद्धि के देनेवाले हैं। छोटे छोटे ओहदेदार उनसे ही राजा की वा अपनी आज्ञा का पालन करें॥५५-५७॥ अथोदाहरणसहितो धातुरूपपाठः | भू सत्तायाम् | पत्लृ पतने | डुकृञ् करणे | | भव | पत | कुरु | | भवतम् | पततम् | कुरुतम् | | भवत | पतत | कुरुत | | चल् चलने | चिती संज्ञाने | गमॢ गतौ | | चल | चेत | गच्छ | | चलतम् | चेततम् | गच्छतम् | | चलत | चेतत | गच्छत |

हिन्दीटीकासमेता ५७ ष्ठा गतिनिवृत्तौ | श्रु श्रवणे | दृशिर् प्रेक्षणे तिष्ठ | शृणु | पश्य तिष्ठतम् | शृणुतम् | पश्यतम् तिष्ठत् | शृणुत | पश्यत दा दाने | ग्रह उपादाने | पृच्छ ज्ञीप्सायाम् देहि | गृहाण | पृच्छ दत्तम् | गृह्णीतम् | पृच्छतम् दत्त | गृह्णीत | पृच्छत ब्रूञ् व्यक्तायांवाचि | भक्ष भक्षणे | पा पाने ब्रूहि | भक्षय | पिव ब्रूतम् | भक्षयतम् | पिवतम् ब्रूत | भक्षयत | पिवत इषु इच्छायाम् | ज्ञा अवबोधने | आप्लृ व्याप्तौ इच्छ | जानीहि | आप्नुहि इच्छतम् | जानीतम् | आप्नुतम् इच्छत | जानीत | आप्नुत कुथि हिंसायाम् | त्यज त्यागे | हन् हिंसागत्योः कुंथ | त्यज | जहि कुन्थतम् | त्यजतम् | हतम् कुन्थत | त्यजत | हत शासु अनुशिष्टौ | इण् गतौ | विद ज्ञाने शाधि | इहि | विद्धि शिष्टम् | इतम् | वित्तम् शिष्ट | इत | वित्त

५८ धनुर्वेदसंहिता अस् भुवि | रुधिरावरणे | शीङ् स्वप्ने एधि | रुन्धि | शेष्व स्तम् | रुन्धम् | शयाथाम् स्त | रुन्ध | शेध्वम् अज् गतौ क्षेपणेच | व्रज गतौ | क्रमु पादविक्षेपे अज | व्रज | क्राम्य अजतम् | व्रजतम् | क्राम्यतम् अजत | व्रजत | क्राम्यत दह् भस्मीकरणे | मिह सेचने | णीञ् प्रापणे दह | मेह | नय दहतम् | मेहतम् | नयतम् दहत | मेहत | नयत गै शब्दे | जि जये | कृष् विलेखने गाय | जय | कृष गायतम् | जयतम् | कृषतम् गायत | जयत | कृषत मुच्ऌ मोक्षणे | सिंच सिंचने | कृन्त कर्तने मुञ्च | सिञ्च | कृन्त मुञ्चतम् | सिञ्चतम् | कृन्ततम् मुञ्चत | सिञ्चत | कृन्तत क्षिप प्रेरणे | कॄ विकिरणे | मिल मिलने क्षिप | किर | मिल क्षिपतम् | किरतम् | मिलतम् क्षिपत | किरत | मिलत

हिन्दीटीकासमेता ५९ | लिख लिखने | मनु ज्ञाने | व्यध् वेधने | | लिख | मन्यस्व | विध्य | | लिखतम् | मन्येथाम् | विध्यतम् | | लिखत | मन्यध्वम् | विध्यत | | रच रचने | गण संख्याने | तनु विस्तारे | | रचय | गणय | तनु | | रचयतम् | गणयतम् | तनुतम् | | रचयत | गणयत | तनुत | | भुजपालनाभ्यवहारयोः | भिदिर् विदारणे | या प्रापणे | | भुङ्धि | भिन्धि | याहि | | भुङ्क्त | भिन्तम् | यातम् | | | भिन्त | यात | | अद् भक्षणे | जागृ निद्राक्षये | विश प्रवेशने | | अद्धि | जागृहि | विश | | अत्तम् | जागृतम् | विशतम् | | अत्त | जागृत | विशत | उपसर्गयोगे प्रवेशनार्थ विहायैवं रूपाणि उपविश उपविशतम् उपविशत इति धातुपाठः

६० धनुर्वेदसंहिता अथैतेषामुदाहरणक्रमः कोटं वेष्टयत कोटे विशत, कोटमुपरि यात, अश्वानुपर्यारोहत, अश्वांश्चारयत, अश्वान् जलं पाययत्, अश्वपतयो भल्लैनैव बाटिकाभोजनं पाचयत, जलं पिबत, द्विजातयश्चणकान्नं चर्वयत, तथा जलं पिबत, जलाभावे शीतलीकुरुत, अश्वानारुह्य धावत,पदातयः समीकं परवाहिनीं यात,खड्गैः कृन्तत, भल्लैर्विध्यत,रंजकंदंशितं दहत,कपाटे कुन्तैस्त्रोटयत, वटिका आयान्ति निपतत, दुष्टान् कुन्थत, डमरुं वादयत, गीतं गायत, वामपार्श्वे अयत, दक्षिणपार्श्वे इत सपदि व्रजत, शनैर्व्रजत, अनुव्रजत, अग्रे व्रजत, तूष्णीं भवत, भीरूँस्त्यजत, शूरान् विध्यत, चर्मणा वटिकां रुन्ध, रंजकं दत्त, उपाऽऽगच्छत, दूरं गच्छत, शेध्वम्, जाग्रत, वस्त्राणि, परिधापयत कटिं बध्नीत, शस्त्राणि धारयत, प्रधनार्थं गच्छत, पदा- तयोऽग्रे अश्वपतयः पश्चात्, गजारूढास्तदनुः रथिनोन्तिमस्थाः, पदो- तयस्तिष्ठत समीके, अश्ववाराः प्राच्यामित, गजपाः पश्चिमे चलत । धावनप्रकारः अश्वेषु पल्याणारोपयत, प्रग्रहम्, प्रतिहत, अंकुशेन हस्तिनं रुन्ध, अश्वेष्वारोहयत,हस्तिपका ध्वजान्गृहीत,अश्वपतयो युद्ध्यत,अनश्वैर्भारं वहत, उष्ट्रभारोद्वहनं विदधत, उष्ट्रपका उष्ट्रान्नयत, अश्वपामेहत, सारथिनः शकटेषु वस्तूनि स्थापयत, वृषभान् योजयत चलत, दाशाः कबन्धान् दोलासु क्षिपत, व्रणसहितानपि, सूर्यपृष्ठगाश्चलत, सूर्यदक्षिण- गाश्चलत, वायुपृष्ठगाश्चलत, वायुदक्षिणगाश्चलत, चन्द्राभिमुखाश्चलत चन्द्रवामगाश्चलत ॥ अन्यच्च ऋजवः संप्रयात आलीढम् प्रत्यालीढम् चलत, तिष्ठत प्राङ्मुखाः, प्रत्यङ्मुखाः,अवाङ्मुखाः, उत्तरास्याः, आग्नेय्याम्, वायव्याम्, नैर्ऋत्याम्, ऐशान्याम्, एकस्य प्रत्यक् एको गच्छतु, पूर्ववत्, कमलाकाराः, व्यलीक- कमलाकाराः, धनुरारोपणम्, तोलनं लस्तकं गृहाण, प्रहारम्, अवहारम्, भुशुण्डीलक्ष्यम् अस्त्राघातं, संहारास्त्रम्,नृपाभिमुखाः प्रणम्य गच्छत, श्वः श्वः शिबिरम्, सन्ध्याकालो जातो युद्धेनालम् ॥१॥

हिन्दीटीकासमेता ६१ अन्यः धनुराकाराः, उत्तिष्ठत, चलत, निपतत, धावत, मारयत, शेध्वम्, भवत, पतत, कुरुत, चेतत, गच्छत, अयत, तिष्ठत, शृणुत, पश्यत, दत्त, गृह्णीत, पृच्छत, ब्रूत, भक्षयत, पिबत, इच्छ, जानीत, आप्नुत, कुन्थत, त्यजत, हत, शिष्ट, इत, वित्त, स्त, दत्त, रुन्ध, अजत, व्रजत, क्राम्यत, दहत, मेहत, नयत, मायत, क्रीडत, जयत, कृषत, मुंचत, सिंचत, कृन्तत, क्षिपत, किरत, मिलत, लिखत, मन्यध्वम्, विध्यत, रचयत, गणयत, तनुत, भुङ्क्त, भिन्त, यात, अत्त, जागृत, रोहत, उपविशत, इति सेनानीपाठः ॥ अथावश्यकाऽव्ययानाम्पाठः आङ्–मा, नो–आम्, बाढम्, अद्य, सायम्, प्रातः, श्वः ह्यः, परश्वः अन्येद्युः, उभयेद्युः त्वम्, युवाम्, यूयम्, अहम्, आवाम्, वयम्, संज्ञा, सः–तौ–ते अलम्, सपदि, तूर्णम्, उपरि, अधः, अ-प्र-अनु-उप- पदातिक्रमः समोच्चा द्विपदा ग्राह्या ह्रस्वमा न कदाचन । कूर्दने धावने ये वै समास्ते कार्यसाधकाः ॥५८॥ पश्चाद्गमनं स्थिरीकरणं शयनं धावनं तथा । चलनं परसेनायां पार्श्वदिक्षु च कारयेत् ॥५९॥ ऊँचाई में एक से हों, ऊंचे नीचे न हों, कूदने और भागने में समान जो हों वे कार्यसाधक हैं, इनको पश्चाद्गमन और स्थिरीकरण सिखाना अर्थात् पीछे को हटना और ठहरना, सोना, भागना, शत्रु की सेना में चलना पछवाड़ों में चलना करावे॥५८॥५९॥ षष्ठस्थाने ग्रहा येषां क्रूराः पापाः पतन्ति हि ॥ ते युद्धे युद्धयतां वीरानान्ये कार्यकरा यतः ॥६०॥ व भ ध ड छ क वर्णा ह्यादिमायां प्रकल्प्य तदनु हि अच अर्णा णादिकाः सर्वलेख्याः । उपरिगत भवांस्तान्स्थाप्य सर्वान्

६२ धनुर्वेदसंहिता क्रमेण भवति च युवयस्या युध्यतां सा प्रसेना ॥ जिनके छठे स्थान में क्रूर रवि मंगल और पाप शनि राहु केतु ये पड़े हों वे वीर युद्ध में लड़ें और काम के नहीं होते, अथवा च-व-भ-ड-छ-क ये अक्षर पहिली सेना में लिखे, इसके पीछे स्वरवर्ण अकारादि सब लिखे, ऊपर व्यंजनों के स्वरों को क्रम से स्थापित करे, जिस सेना का युवास्वर हो वही प्रथम होके लड़े॥६०॥ उदाहरणम् यथा, विवस्वान्, भरत, धुन्धुमार, डित्थ, छत्रपति, कुक्षि, इन अक्षरों के नामवाले योद्धाओं को प्रथम सेना युवास्वर में युद्ध ठाने तो जीते॥१॥ अस्या वस्त्राणि पीतानि ध्वजा पीता च तद्वति । युद्धयूपस्तथा पीतश्चतुरस्त्रांकसंयुतः ॥६१॥ इसके पीले वस्त्र, पीली झंडी-वैसा ही युद्ध यज्ञ का बड़ा झण्डा जहां गाड़ा जाय वहां सेना ठहरे। चौकोर चिह्न का॥६१॥ श्वेतरक्तहरित्कृष्णा चान्या सेना हि त्वादिवत् । कर्तव्या पार्थिवैर्नित्यं जयलाभसुखेच्छुभिः ॥६२॥ हे विश्वामित्र! जय और लाभ सुख के वास्ते पहली सेना का जैसे क्रम है उसकी तरह चार सेना चाहनेवाले राजाओं को श्वेत, लाल, हरी और काले रंगवाली करनी चाहिये॥६२॥ ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च चन्द्रसूर्यौ यथाक्रमम् । अधीशाः पंचसेनानां विज्ञेयाः शृणु गाधिज ॥६३॥ हे विश्वामित्र! ब्रह्मा १ विष्णु २ रुद्र ३ चन्द्र ४ सूर्य ५ ये पांच देवता पांच सेनाओं के स्वामी हैं॥६३॥ ब्रह्मा रुद्रबले जीयाद्विष्णुश्चन्द्रबले जयेत् । रुद्रः सूर्यबलं प्राप्य- चन्द्रो ब्रह्मबलं युधि ॥६४॥ सूर्यो विष्णुबलं लब्ध्वा जयेच्चैव न संशयः ।