भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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हिन्दीटीकासमेता ४७ उसकी ही रण में जीत होती है। यदि शत्रुओं को बन्धस्वर में रखे तो न मरे और चलते स्वर को रखे तो मारा जाय, इस हेतु धैर्य करके ही शत्रु की सेना मारनी चाहिये, जीत जाय तो धन मिले,और रण में मारा जाय तो स्वर्ग मिले,पृथिवी पर कीर्ति हो इससे धैर्य करके ही शत्रु की सेना मारनी चाहिये॥३८-४५॥ अधर्मः क्षत्रियस्यैष यद्व्याधिमरणं गृहे । यदाजौ निधनं याति साऽस्य धर्मः सनातनः ॥४९॥ वसिष्ठजी कहते हैं हे विश्वामित्र! रोगी होकर घर में मरना क्षत्रियों के लिये अधर्म से मरना है जो कि, संग्राम में मरना है वह इसका सनातन धर्म है॥४९॥ अथ व्यूहानाह युवास्वरे मध्यसेना युद्धं कुर्यादतंद्रिता । द्वे सेने पार्श्वयोश्चैका पृष्ठतो रक्षयेत्सदा ॥ एकां विकटसेनां तु दूरस्थां भ्रामयेद्युधि ॥५०॥ युवा स्वरवाली मध्य सेना घूमती हुई, सामने के