भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

DevanagariHindipublished76 पृष्ठ

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४६ धनुर्वेदसंहिता चतुरंगं महीपतिः ॥४५॥ व्यूहयित्वाऽग्रतः शूरान्स्थाप- येज्जयलिप्सया । पृष्ठेन वायवो वांति पृष्ठे भानुर्वयांसि च ॥४६॥ अनुप्लवन्ते मेघाश्च यस्य तस्य रणे जयः ॥ अपूर्णेनैव मर्तव्यं संपूर्णेनैव जीवनम् ॥४७॥ तस्माद्धैर्यं विधायैव हन्तव्या परवाहिनी ॥ जिते लक्ष्मीर्मृते स्वर्गः कीर्तिश्च धरणीतले ॥ तस्माद्धैर्यं विधायैव हन्तव्या परवाहिनी ॥४८॥ अब व्यूहादि उपायों से युद्ध कथन करते हैं, जो राजपुत्र (सामन्त) अर्थात् जो अपने भाई बेटे हों, तथा अपने अधीन हों यथार्थ बात कहने वाले नौकर उन सभी को राजा अपने पास चारों ओर रखे और जो योद्धा आपस में प्रेम रखते हों, शार्ङ्ग (धनुष) धारण करने वाले, युद्धरीति जानने वाले घोड़ों के सवार, वे संग्राम में शत्रुओं को जीतते हैं एक भी कायर भगेड़ा सेना में हो तो बड़ी भारी सेना को हरवा देता है, उस डराये हुए शूरवीर के योद्धा भी पीछे भाग जाते हैं, इस कारण राजा डरपोक सेनापति वा पदचरादि नौकर सेना में भरती न करे, दो पुरुष सूर्य के लोक से ऊपर जाते हैं, योगयुक्त संन्यासी और जो संग्राम में सम्मुख होकर मरे, जहाँ २ शूरवीर शत्रुओं से घिरा हुआ मारा जाय। वह (अक्षय) स्वर्गलोक को पाता है, यदि चेत् क्लीब वचन अर्थात् हीन वचन न बोले तो जिस शत्रु को मूर्च्छा आ गई हो और घबरा रहा हो, हथियार पास न हो, वा दूसरे से लड़ाई कर रहा हो, भाग निकला हो, शरण में आ गया हो ऐसे को न मारे, डरपोक शत्रु भाग चला हो तो बलवान् उसको ढूँढ़े नहीं, क्योंकि कभी वह शूरता को प्राप्त हो जाय तो संग्राम का निश्चयकर अर्थात् अपना मरना ठानकर वह मार देता है, इस हेतु भागे हुए शत्रु को ढूँढ़ना योग्य नहीं है॥ बहुत सी सेना इकट्ठी करके चतुरंगिणी अर्थात् हाथी, रथी, घोड़ों के सवार और पैदल एकत्र करके इनका व्यूह बनाकर सबसे आगे शूरवीरों को रखे जीतने की इच्छा से जिसकी सेना की पीठ पीछे, सतर ३ का वायु चलता हो और पीठ पीछे सूर्य हो, तथा पक्षी पीछे उड़ते हों पीठ पीछे की वर्षा हो