धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ धनुर्वेदसंहिता हो वहाँ ढाल तलवार भाले बरछी आदि से लड़ें, युद्ध के अहंकारियों को सेना के अग्र में स्थापन करे, औरों को पीछे रखे॥५४॥ अथ सेनानयः तत्रादौ व्याकरणशिक्षां वक्ष्यामो राज्ञे । नृपतिर्लोट्लका- रस्य कुर्यात्कंठस्थितानि च । रूपाणि कार्यसिद्धयर्थं ह्याज्ञैषा मम गाधिज ॥ मध्यमपुरुषस्यैव प्रयोगान्यो विचिन्तयेत् ॥५५॥ सेनानीः प्रतिदिनं सम्यङ् न केनापि स हन्यते । मध्यमपुरुषोद्भूताः प्रयोगाः सर्वसिद्धिदाः ॥५६॥ तैरेव साधयेदाज्ञां पुरुषा राजभृत्यकाः ॥५७॥ अब सेना के कवायद का प्रकरण कहते हैं, उसके आदि में व्याकरण की शिक्षा को कहते हैं कि, राजा के लिये कितना व्याकरण पढ़ना चाहिये, राजा नव लकारों के रूप छोड़कर केवल लोट् लकार के रूपों को कार्य की सिद्धि के लिये कंठ करे, हे विश्वामित्र! मेरी यह आज्ञा है और जो सेनापति लोट् लकार के मध्यम पुरुष के ही रूप याद करे, वह किसी से भी न मारा जाय, मध्यम पुरुष के बहुवचन के प्रयोग ही सिद्धि के देनेवाले हैं। छोटे छोटे ओहदेदार उनसे ही राजा की वा अपनी आज्ञा का पालन करें॥५५-५७॥ अथोदाहरणसहितो धातुरूपपाठः | भू सत्तायाम् | पत्लृ पतने | डुकृञ् करणे | | भव | पत | कुरु | | भवतम् | पततम् | कुरुतम् | | भवत | पतत | कुरुत | | चल् चलने | चिती संज्ञाने | गमॢ गतौ | | चल | चेत | गच्छ | | चलतम् | चेततम् | गच्छतम् | | चलत | चेतत | गच्छत |