भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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हिन्दीटीकासमेता ६५ रथः रथाश्वसाधनं तु समादिस्थले विधेयम् ॥ रथ के घोड़ों को सम आदि स्थल में अभ्यास कराना चाहिये॥ इति रथक्रमः अथ सेनापतिकरणविधिं वक्ष्यामः । शृणु भो राजर्षे विश्वामित्र! आकारविद्याबलयुक्तं क्षत्रियं सेनापतिं विदध्यात् तस्यैते नियमाः समस्त वाहिनीमेकाकारदृष्ट्यावलोकयेत् अन्यच्च सर्वान्पदा- तीन् परिश्रमसदृशमधिकारं दद्यात् व्यूहरचनायामति- निपुणश्च भवेत् स एव सेनानीर्विधेय इति । अब सेनापति करने की विधि कहते हैं, सुनो! हे राजऋषि विश्वामित्र! आकारविद्या और बल से जो युक्त हो, ऐसे क्षत्रिय को सेनाध्यक्ष करे, उसके ये नियम हैं, सारी सेना को एकसम दृष्टि से देखे और सब पैदल आदि परिश्रम के सदृश अधिकार (ओहदा) दे, और व्यूहरचना में अतिचतुर हो, उसे ही सेनानी करना चाहिये॥ अथ शिक्षा तत्रादौ पठनपाठनविधिंब्रूमः । आदौ क्षात्रकोशव्याकरण सूत्राण्यध्येतव्यानि । द्वावध्यायौ सप्तमाष्टमौमनोर्मि- ताक्षराव्यवहाराध्यायश्च जयार्णवविष्णुयामलविजया- ख्यस्वरशास्त्राण्यपराणिच पठितव्यानि ततः सरहस्यं धनुर्वेदमापठेत् । अब पठनपाठन की विधि कहते हैं, पहिले क्षात्रकोश व्याकरण सूत्र पढ़ने चाहिये, दो अध्याय सातवां और आठवां मनु का तथा व्यवहाराध्याय मिताक्षरा धर्मशास्त्र, जयार्णव, विष्णुयामल, विजयाख्यतंत्र और स्वरशास्त्र पढ़ने चाहिये, इनको पढ़कर रहस्यसहित धनुर्वेद गुरु से पढ़े।