भारतकोश
धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)

Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary

महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा

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६६ धनुर्वेदसंहिता हन्तव्याऽहन्तव्योपदेशः सुप्तं प्रसुप्तमुन्मत्तं ह्यकच्छं शस्त्रवर्जितम् । बालं स्त्रियं दीनवाक्यं धावन्तं नैव घातयेत् ॥६९॥ अब किसको मारना चाहिये और किसको नहीं, सोये हुए को, गाढ़ निद्रा में सोते हुए को और नशा पिये हुए को जिसका धोती वा लंगोट खुल गया हो उसको, जिसके पास हथियार न होवे उसको तथा बालक अर्थात् बारह वर्ष से कम अवस्थावाले को सज्जन स्त्री को और जो दीन वचन बोले उसको, रण छोड़कर भागते हुए को, धर्मात्मा न मारे॥६९॥ धर्मार्थं यस्त्यजेत्प्राणान्किं तीर्थैश्च जपैश्च किम् । मुक्तिभागी भवेत्सो वै निरयं नाधिगच्छति ॥७०॥ ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा स्त्रीणां बालवधेषु च । प्राणत्यागपरो यस्तु स वै मोक्षमवाप्नुयात् ॥७१॥ इति श्रीम‍हर्षिवसिष्ठप्रणीता वासिष्ठी धनुर्वेदसंहिता समाप्ता हे विश्वामित्र! धर्म के अर्थ जो प्राणों को छोड़े उसको तीर्थ और व्रतों से क्या है, वह स्वर्ग और मोक्ष को पाता है, नरक में नहीं जाता और जो ब्राह्मण गऊ स्त्री बालक इनके लिये प्राण देता है, वह मोक्ष का भागी होता है॥७०॥७१॥ इति श्रीवासिष्ठीधनुर्वेदसंहिता हरितगोत्रोद्भव स्वामि रामरक्षपालविरचित हिन्दीटीकासमेता संपूर्णतामयासीत् ॥