धनुर्वेद संहिता (महर्षि वसिष्ठ - प्राचीन भारतीय युद्धकला, धनुर्विद्या एवं अस्त्र-शास्त्र सटीक)
Dhanurveda Samhita of Maharshi Vasishtha with Commentary
महर्षि वसिष्ठ (टीकाकार: स्वामी हरिदयालु जी महाराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मकाण्ड सम्बन्धी हमारे कुछ प्रकाशन अन्त्येष्टि श्राद्ध कर्म पद्धति (संस्कृत) पत्राकार व पुस्तकाकार उपाकर्म पद्धति मूल "श्रावणी कर्म" के लिये परमोपयोगी ग्रह शांति-हिन्दी टीका सहित (शुक्ल यजुर्वेदोक्त)-इसमें मातृस्थापन पूजन आभ्युदीपक श्राद्ध पद्धति और ग्रहशांति है। यह यज्ञोपवीत तथा विवाहादि शुभ कर्म में बहुत उपयोगी है गौडीय श्राद्ध प्रकाश महानिबन्ध-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, (मूलमात्र, पत्राकार) सभी श्राद्ध, पितृकर्म संबधी सभी वैष्णवादि पूजनादिकों का अपूर्व संग्रह नित्य कर्म प्रयोग माला-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत, नित्य नियम के ६२ विषयों सहित। संस्कृत में प्रेत मञ्जरी-हिन्दी टीका सहित। वैतरणी दान प्रेतदाहविधि, दशाहादि श्राद्ध, एकादशाहश्राद्ध, वृषोत्सर्ग, शय्यादानादि सपिंडी श्राद्ध, षोडश, मासिक श्राद्ध प्रयोग, त्रयोदशाहपद दानादि है। पुस्तकाकार व पत्राकार दोनों में उपलब्ध व्रतोद्यापन प्रकाश-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। मूलमात्र पत्राकार व सजिल्द में उपलब्ध सुगम विवाह पद्धति-(गंगाधारी)-हिन्दीटीकासहित सर्वदेव प्रतिष्ठा प्रकाश-पं० चतुर्थीलालजीकृत। सम्पूर्ण देवताओं की सर्वोत्तम प्रतिष्ठा विधि और प्रतिष्ठोपयोगी अनेकों प्रकार के कुंड, मण्डल, यंत्र आदि के चित्र बनाने तथा रंग पूरने की विधि भी है। संस्कार प्रकाश-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें षोडश संस्कार, लुप्त संस्कार प्रायश्चित, व्रात्यप्रायश्चित प्रयोग, पुनरुपनमन प्रकार इत्यादि सभी विषय है। मूल मात्र संस्कृत में। सजिल्द वासिष्ठी हवन पद्धति-हिन्दी टीका सहित विष्णु पूजन विधि-हिन्दी टीका सहित विवाह सोपांगविधि-'वालोवोधिनी' नामक हिन्दी टीका सहित शांति प्रकाश-स्व० पं० चतुर्थीलालजीकृत। इसमें गणपत्यादि पूजन, पुण्याह वाचन, कलश स्थापनादि और विनायकादि ३० शांति प्रयोग तथा वास्तु शांति तथा वास्तु शांति प्रयोगादि समन्त्रक हैं। मूल मात्र पत्राकार सकाम शिवपूजन विधान हिन्दीटीकांसहित-वैदिक, तांत्रिक मन्त्रों से शिव पूजन स्वस्तिवाचन (पुण्याहवाचन) प्रायः समस्त शुभकर्मों में पढ़ा जाता है। संध्योपासन-हिन्दीटीकासहित देवर्षि पितृतर्पण सहित हरिद्रामातृका पूजा-विवाहादि मंगल करने योग्य (चातुर्थीलाली) उपनयनपद्धति-सटिप्पणीका नवीन आवश्यक विषयों से अलंकृत 'यज्ञोपवीत संस्कार' कराने के लिये परमोयोगी