भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 104

४४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् श्लाघ्य इति। स एक एवार्थो द्विशाखतया विवेकिभिर्विभागबुद्ध्या विभज्यते । तथाहि-तुल्येऽर्थरूपत्वे किमिति कस्मैचिदेव सहृदयाः श्लाघन्ते। तद्भवित- तव्यं तत्र केनचिद्विशेषेण। यो विशेषः, स प्रतीयमानभागो विवेकिभिर्विशेष- हेतुत्वादात्मेति व्यवस्थाप्यते । वाच्यसंवलनाविमोहितहृदयैस्तु तत्पृथग्भावे विप्रतिपद्यते, चार्वाकैरिवात्मपृथग्भावे। अत एव अर्थ इत्येकतयोपक्रम्य सहृद- यश्लाघ्य इति विशेषणद्वारा हेतुमभिधायापोद्धारदृशा तस्य द्वौ भेदावंशावित्यु- क्तम्, न तु द्वावप्यात्मानौ काव्यस्येति । दो शाखाओं (अंशों) वाला होने के कारण विवेचनशील लोगों द्वारा विभाग-बुद्धि से विभाजित किया जाता १ है। जैसा कि—दोनों का अर्थरूप होना समान है तब क्यों किसी एक के लिए सहृदय जन प्रशंसा करते हैं? अतः, वहाँ किसी विशेष को होना चाहिए। जो विशेष है वह प्रतीयमान भाग, विशेष होने के कारण विवेकी लोगों द्वारा आत्मा के रूप में व्यवस्थापित किया जाता है। वाच्य अर्थ की संवलना (वासना) से विमोहित हृदय वाले लोग उस (प्रतीयमान) के अलग होने में विप्रतिपत्ति करते हैं, जिस प्रकार चार्वाक लोग आत्मा को (शरीर से) अलग मानने में। अत एव 'अर्थः' इस एकवचन के रूप से उपक्रम करके 'सहृदयश्लाघ्य' (सहृदय जनों द्वारा प्रशंसनीय) इस विशेषण द्वारा हेतु कहकर विभाग (अपोद्धार) की दृष्टि से उसके दो भेद अर्थात् अंश हैं, यह कहा है; न कि काव्य के दोनों ही अर्थ आत्मा हैं। १. प्रस्तुत 'कारिका' साधारण विचार वालों को भ्रम में डाल देने वाली है। कुछ लोग भ्रम में पड़ कर समझ जाते हैं कि आचार्य ने यहाँ 'ध्वनि' का ही भेद करना आरम्भ कर दिया है, फिर यह सोच कर और भी परेशानी होती है कि ध्वनि का भेद है तो 'वाच्य' अर्थ ध्वनि के भेद के अन्तर्गत कैसे आ सकता है? इस भ्रम का निवारण 'लोचन' में बड़ी योग्यता से किया गया है। लोचनकार का कहना है कि यहाँ ग्रन्थकार अपने साध्य प्रतीयमान अर्थ को निर्विवाद सिद्ध वाच्य अर्थ की सामान्य कोटि में लाकर प्रतीयमान का भी वाच्य अर्थ की भाँति 'अनपह्नवनीयत्व' (प्रतिषेधनीयत्व) प्रतिपादन करना चाहते हैं। शब्द और अर्थ को काव्य का शरीर माना गया है, ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि उस काव्य-शरीर का कोई आत्मा भी हो। शब्द और अर्थ में अर्थ की अपेक्षा शब्द अधिक स्थूल होता है, इसलिए साधारण लोग भी उसे जान लेते हैं किन्तु अर्थ को साधारण लोग नहीं समझ पाते। किन्तु केवल अर्थ के आधार पर कभी किसी रचना को 'काव्य' नहीं कहा गया है इसलिए अपेक्षित है कि वह अर्थ 'सहृदयजनों के द्वारा प्रशंसा के योग्य' हो--सहृदयश्लाघ्य हो। इस प्रकार सामान्य अर्थ और सहृदयश्लाघ्य अर्थ का भेद हर विचारशील व्यक्ति समझ सकता है। इसीलिए आचार्य ने एक ही अर्थ को दो भागों में विभक्त किया। किन्तु अर्थ की दृष्टि से वाच्य और प्रतीयमान दोनों एक होने पर भी जहाँ तक सहृदयश्लाघ्यत्व की बात है उसके अनुसार काव्य की आत्मा प्रतीयमान अर्थ ही होगा, वाच्य अर्थ नहीं। कुछ लोग अवश्य यह विप्रतिपत्ति खड़ी कर सकते हैं कि प्रतीयमान अर्थ ही क्यों, वाच्य अर्थ भी सहृदयश्लाघ्य हो सकता है ? जिस प्रकार चार्वाकों ने शरीर को लेकर ही पृथक् आत्मा स्वीकार करने का वाद

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 104, कुल 680 में से · BharatKosha