ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः ४५ ध्वन्यालोकः काव्यस्य हि ललितोचितसन्निवेशचारुणः शरीरस्येवात्मा सार- रूपतया स्थितः सहृदयश्लाघ्यो योऽर्थस्तस्य वाच्यः प्रतीयमानश्चेति द्वौ भेदौ। ललित और उचित सन्निवेश के कारण चारु काव्य का, शरीर की आत्मा की भाँति, सार रूप में स्थित होकर सहृदय जनों द्वारा प्रशंसा के योग्य जो अर्थ है, उसके वाच्य और प्रतीयमान, ये दो भेद हैं। लोचनम् कारिकाभागगतं काव्यशब्दं व्याकर्तुमाह—काव्यस्य हीति। ललितशब्देन गुणालङ्कारानुग्रहमाह। उचितशब्देन रसविषयमेवौचित्यं भवतीति दर्शयन् रसध्वनेर्जीवितत्वं सूचयति। तदभावे हि किमपेक्षयेदमौचित्यं नाम सर्वत्रोद्घो- ष्यत इति भावः। योऽर्थ इति यदानुवदन् परेणाप्येतत्तावदभ्युपगतमिति दर्श- यति। तस्येत्यादिना तदभ्युपगम एव द्वयंशत्वे सत्युपपद्यत इति दर्शयति। तेन यदुक्तम्-‘चारुत्वहेतुत्वाद् गुणालङ्कारव्यतिरिक्तो न ध्वनिः' इति, तत्र ध्वनेरात्मस्वरूपत्वाद्वेतुरसिद्ध इति दर्शितम्। न ह्यात्मा चारुत्वहेतुर्देहस्येति कारिका-भाग में आए हुए 'काव्य' शब्द को व्याकृत करने के लिए कहते हैं— काव्य का—। 'ललित' शब्द से गुण और अलङ्कार का अनुग्रह (सहायकत्व) कहा है। 'उचित' शब्द से रसविषयक ही औचित्य होता है यह दिखाते हुए रसध्वनि का जीवितत्व सूचित करते हैं। भाव यह कि उस (रस) के अभाव में किस अपेक्षा से इस औचित्य को सब जगह उद्घोषित करते हैं? 'योऽर्थः' यह 'यत्' शब्द द्वारा अनुवाद करते हुए यह दिखाते हैं कि दूसरे ने भी इसे माना है। 'तस्य' इत्यादि द्वारा उसका स्वीकार (अभ्युपगम) ही दो अंशों के होने पर उपपन्न हो सकता है, यह दिखाते हैं। उस कारण जो कि कहा है—'चारुत्व के हेतु होने के कारण ध्वनि, गुण और अलङ्कार से व्यतिरिक्त (पृथक्) नहीं है'; वहाँ यह दिखा दिया कि 'ध्वनि' के आत्मस्वरूप होने के कारण हेतु असिद्ध है। आत्मा शरीर के चारुत्व का खड़ा किया था। इस प्रकार प्रस्तुत कारिका में आचार्य ने 'अर्थ' के रूप में उपक्रम करके 'सहृदय- श्लाघ्य' इस विशेषण 'विभाग' की दृष्टि से उस अर्थ के दो भेद बताये हैं न कि यह कहा है कि काव्य के दो आत्मा हैं। १. यह 'काव्यलक्ष्मविधायिभिः' इस वृत्तिभाग का अनुवाद है। कुछ संस्करणों में इसे कारिका- भाग ही मानकर छापा है किन्तु 'लोचन' के अनुसार यह वृत्तिभाग है और 'ततो नेह प्रतन्यते' यह कारिका भाग। ललित और उचित सन्निवेश से चारु काव्य—काव्य में ललित सन्निवेश की सिद्धि गुण और अलङ्कार के अनुग्रह से सम्भव होती है और उचित सन्निवेश तब बनता है जब 'रस' की स्थिति अनुकूल होती है। इसी से प्रकट होता है कि रसध्वनि आत्मा है, क्योंकि रस का औचित्य रस के