भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 680 में से

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पृष्ठ 106

४६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तत्र वाच्यः प्रसिद्धो यः प्रकारैरुपमादिभिः । बहुधा व्याकृतः सोऽन्यैः— काव्यलक्ष्मविधायिभिः । —ततो नेह प्रतन्यते ॥ ३ ॥ केवलमनूद्यते पुनर्यथोपयोगमिति ॥ ३ ॥ अब जो वाच्य अर्थ उपमा आदि के प्रकारों से प्रसिद्ध है उसे अन्य लोगों ने बहुधा व्याख्यान किया है। काव्य के लक्षणकारों ने । उसकारण से यहाँ विस्तार नहीं करते हैं ॥ ३ ॥ केवल फिर उपयोग के अनुसार अनूदित करेंगे ॥ ३ ॥ लोचनम् भवति । अथाप्येवं स्यात्तथापि वाच्येऽनैकान्तिको हेतुः । न ह्यलङ्कार्य एवाल- ङ्कारः, गुणी एव गुणः । एतदर्थमपि वाच्यांशोपक्षेपः । अत एव वक्ष्यति— ‘वाच्यः प्रसिद्धः’ इति ॥ २ १॥ तत्रेति । द्व्यंशत्वे सत्यपीत्यर्थः । प्रसिद्ध इति । वनितावदनोद्यानेन्दूदया- दिलौकिक एवेत्यर्थः । ‘उपमादिभिः प्रकारैः स व्याकृतो बहुधे’ति सङ्गतिः । अन्यैरिति कारिकाभागं काव्येत्यादिना व्याचष्टे । ‘ततो नेह प्रतन्यत’ इति विशेषप्रतिषेधेन शेषाभ्यनुज्ञेति दर्शयति—केवलमित्यादिना ॥ ३ ॥ हेतु नहीं होता है । अगर ऐसा हो भी जाता है तथापि वाच्य में हेतु १व्यभिचारी (अनैकान्तिक) है, क्योंकि अलङ्कार्य ही अलङ्कार नहीं होता । गुणी ही गुण नहीं होता । इस लिए भी वाच्य-अंश का त्याग है । अत एव कहेंगे—, वाच्य अर्थ प्रसिद्ध है’ ॥ २ ॥ अब— । अर्थात् दो अंशों वाला होने पर भी । प्रसिद्ध— । अर्थात् वनिता का मुख, उद्यान, चन्द्रोदय आदि लौकिक ही । ‘उपमादि प्रकारों से वह बहुत प्रकार व्याकृत है’ यह सङ्गति है । ‘अन्य’ इस कारिका-भाग की ‘काव्य०’ इत्यादि द्वारा व्याख्या करते हैं । ‘उस कारण उसका यहाँ विस्तार नहीं करते हैं’ इस प्रकार विशेष के प्रतिषेध द्वारा शेष की अभ्यनुज्ञा (अनुवाद) है, यह दिखाते हैं—केवल० इत्यादि ॥ ३ ॥ प्राधान्य में ही बन सकता है, अन्यथा जो ध्वनि नहीं स्वीकार करते हैं किसकी अपेक्षा करके औचित्य का उद्घोष करेंगे ? उनके यहाँ तो रस ही नहीं है । १. यहाँ भी वही प्रश्न है कि जब कारिका में वाच्य और प्रतीयमान दोनों एक अर्थ के भेद हैं फिर यह क्या कि वाच्य को काव्य की आत्मा की सीमा से बाहर कर देते हैं ? इसका समाधान पहले दिया जा चुका है, यहाँ केवल यह कहना है कि जो पहले अभाववाद के प्रसंग में चारुत्व का हेतु