भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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प्रथम उद्योतः ५१ ध्वन्यालोकः स ह्यर्थो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तं वस्तुमात्रमलंकाररसादयश्चेत्यनेक- प्रभेदप्रभिन्नो दर्शयिष्यते। सर्वेषु च तेषु प्रकारेषु तस्य वाच्यादन्यत्वम्। तथा ह्याद्यस्तावत्प्रभेदो वाच्याद् दूरं विभेदवान् । स हि कदाचिद्वाच्ये विधिरूपे प्रतिषेधरूपः । यथा— वह अर्थ वाच्य के सामर्थ्य से वस्तुमात्र, अलङ्कार और रस आदि के, आक्षिप्त होकर अनेक प्रभेदों से प्रभिन्न रूप में दिखाया जायगा । और समस्त उन प्रकारों में वह वाच्य से अतिरिक्त है । जैसा कि पहला प्रभेद वाच्य से बहुत दूर तक का भेद रखने वाला है । क्योंकि वह कभी वाच्य अर्थ के विधि रूप होने पर प्रतिषेध रूप होता है । जैसे— लोचनम् यदूचे भट्टनायकेन—'अंशत्वं न रूपता' इति, तद्वस्त्वलङ्कारध्वन्योरेव यदि नामोपालम्भः, रसध्वनिस्तु तेनैवात्मतयाङ्गीकृतः, रसचर्वणात्मनस्तृतीयांश- शस्याभिधाभावनांशद्वयोत्तीर्णत्वेन निर्णयात्, वस्त्वलङ्कारध्वन्यो रसध्वनिपर्य- न्तत्वमेवेति वयमेव वक्ष्यामस्तत्र तत्रेत्यास्तां तावत् । वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तमिति द्वारा रसन ( आस्वादन ) के योग्य रस¹ है । काव्य के व्यापार का एकमात्र गोचर 'रसध्वनि' है और वह ध्वनि ही ( ध्वनिमात्र ) है, वही मुख्यरूप से आत्मा है । जो कि भट्टनायक ने कहा है—'अंशत्व है रूपता² नहीं' यदि वह वस्तुध्वनि और १. 'आगे 'रस' का विशद् रूप से सैद्धान्तिक विवेचन होगा, किन्तु प्रस्तुत 'रसध्वनि' के प्रसंग में 'रस' का सामान्य रूप आचार्य अभिनवगुप्त ने एक ही 'समास' में व्यक्त कर दिया है । यहाँ प्रयुक्त 'शब्दसमर्प्यमाण', 'हृदयसंवाद', 'सुन्दर', 'विभावानुभावसमुचित', 'प्राग्विनिविष्टरत्यादि- वासनानुराग', 'सुकुमार', 'स्वसंविदानन्द', 'चर्वणाव्यापार' ये शब्द 'रससिद्धान्त' की विशेष परिभाषा के अनुकूल हैं । जैसा कि आचार्य भरतमुनि का प्रसिद्ध 'रससूत्र' है—'विभावानुभाव- संचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः', इसकी लोचनकार-सम्मत व्याख्या के अनुसार सहृदय के हृदय में जन्म-जन्मान्तर की वासना या संस्कार रूप से रति आदि स्थायी भाव विद्यमान होते हैं, काव्य के शब्दों से विभाव-अनुभाव को ग्रहण करके सहृदय अपने हृदय के साथ उनका संवाद कर लेता है, इस प्रकार सहृदय के रत्यादि और काव्य के द्वारा अर्पित विभावानुभाव आदि से सहृदय के सुकुमार आनन्दमय चित्त का उद्बोध होता है, इसे ही शास्त्रीय परिभाषा में चर्वणारूप व्यापार कहते हैं, इस स्थिति में पहुँचते ही सहृदय जो एक प्रकार का विशेष आस्वादन अनुभव करता है वही 'रस' कहलाता है । 'रस' की स्थिति में स्वशब्दवाच्यता का जरा भी सम्पर्क नहीं होता, इसलिए इसे सर्वथा अलौकिक ही कहते हैं, दूसरे यह 'ध्वनि' ही है, इसमें न तो वस्तु है और न अलंकार । अतः 'रसध्वनि' को ही मुख्य रूप से काव्य की आत्मा का व्यवहार है, अलङ्कारध्वनि और वस्तुध्वनि में आत्मव्यवहार औपचारिक है । २. भट्टनायक का यह पूरा श्लोक पहले 'लोचन' में आ चुका है— ध्वनिर्मानापरो योऽपि व्यापारो व्यञ्जनात्मकः । तस्य सिद्धेऽपि भेदे स्यात्काव्येऽंशत्वं न रूपता ॥