ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः भम धम्मिअ वीसत्थो सो सुणओ अज्ज मारिओ देण । गोलाणइकच्छकुडङ्गवासिणा दरिअसीहेण ॥ ‘बाबा जी, तुम इतमीनान से घूमो । वह कुत्ता गोदावरी नदी के लता गहन में रहने वाले पागल शेर द्वारा आज मार डाला गया ।’ लोचनम् भेदत्रयव्यापकं सामान्यलक्षणम् । यद्यपि हि ध्वननं शब्दस्यैव व्यापारः, तथाप्यर्थसामर्थ्यस्य सहकारिणः सर्वत्रानपायाद्वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तत्वम् । शब्द- शक्तिमूलानुरणनव्यङ्ग्येऽप्यर्थसामर्थ्यादेव प्रतीयमानावगतिः, शब्दशक्तिः केवलमवान्तरसहकारिणीति वक्ष्यामः । दूरं विभेदवानिति । विधिनिषेधौ विरुद्धा- विति न कस्यचिदपि विमतिः । एतदर्थं प्रथमं तावेवोदाहरति— ‘भ्रम धार्मिक विस्रब्धः स शुनकोऽद्य मारितस्तेन । गोदावरीनदीकूललतागहनवासिना दृप्तसिंहेन ॥’ कस्याश्चित्सङ्केतस्थानं जीवितसर्वस्वायमानं धार्मिकसञ्चरणान्तरायदोषा- अलङ्कारध्वनि का ही सम्भवतः उपालम्भ है तो ( ऐसी स्थिति में ) उन्होंने ही ‘रसध्वनि’ को आत्मा के रूप में स्वीकार कर लिया, क्योंकि उनका निर्णय है कि रस-चर्वणारूप तीसरा अंश अभिधा और भावनारूप दो अंशों से अतिरिक्त ( उत्तीर्ण ) है। वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि का रसध्वनि में ही पर्यवसान है यह हम ही उन-उन स्थलों में कहेंगे, बस । ‘वाच्य की सामर्थ्य से आक्षिप्त’ यह ( १वस्तु, अलङ्कार और रस ) इन तीनों भेदों में व्याप्त रहनेवाला सामान्य लक्षण’१ है । यद्यपि ध्वनन शब्द का ही व्यापार है, तथापि सहकारी अर्थसामर्थ्य के सब जगह विद्यमान होने से वाच्य- सामर्थ्याक्षिप्तत्व है। शब्दशक्तिमूल अनुरणनव्यङ्ग्य में भी अर्थ की सामर्थ्य से ही प्रतीयमान का ज्ञान होता है, शब्दशक्ति केवल अवान्तर सहकारिणी होती है, यह कहेंगे । ‘बहुत दूर तक भेद रखनेवाला—’ । विधि और निषेध के परस्पर विरोध में किसी की विमति नहीं है। एतदर्थ पहले उन्हें ही उदाहृत करते हैं— ‘बाबा जी, तुम इतमीनान से घूमो । वह कुत्ता गोदावरी नदी के लतागहन में रहनेवाले पागल शेर द्वारा आज मार डाला गया ।’ प्राणों के सर्वस्व अपने सङ्केत स्थान की, धार्मिक ( बाबाजी ) के संचाररूप विघ्न के अर्थात् ध्वनि नाम का जो अन्य व्यञ्जना रूप व्यापार है उसका ( वाच्य से ) भेद सिद्ध होने पर भी काव्य में अंशत्व होगा रूपता या अंशित्व ( आत्मत्व ) नहीं । १. लोचनकार का तात्पर्य यह है कि यहाँ ग्रन्थ में ‘वाच्यसामर्थ्याक्षिप्त’ को नपुंसक विशेषण समझ कर कोई भ्रम से केवल इसे ‘वस्तुमात्र’ में अन्वित न करने लग जाय, बल्कि यह वस्तु, अलङ्कार और रसादि इन तीनों में अनुगत सामान्य रूप है । लिङ्ग और वचन का विपरिणाम करके सबके साथ इसका अन्वय बैठा लेना चाहिए ।