भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 680 में से

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पृष्ठ 113

प्रथम उद्योतः ५३ लोचनम् तदवलुप्यमानपल्लवकुसुमादिविच्छायायीकरणाच्च परित्रातुमियमुक्तिः । तत्र स्वतःसिद्धमपि भ्रमणं श्वभयेनापोदितमिति प्रतिप्रसवात्मको निषेधाभावरूपः, न तु नियोगः प्रैषादिरूपोऽत्र विधिः; अतिसर्गप्राप्तकालयोर्ह्ययं लोट् । तत्र भावतदभावयोर्विरोधाद् द्वयोस्तावन्न युगपद्वाच्यता, न क्रमेण, विरम्य व्यापारा- भावात् । ‘विशेष्यं नाभिधा गच्छेत्’ इत्यादिनाभिधाव्यापारस्य विरम्य व्यापारासंभवाभिधानात् । दोष एवं उसके तोड़े जाते हुए फूल-पत्तों से छायाहीन कर देने के कार्य से, रक्षा के निमित्त किसी स्त्री की यह उक्ति है । वहाँ, बाबाजी का स्वतःसिद्ध भी भ्रमण कुत्ते के भय से प्रतिषिद्ध होने से यहाँ विधि प्रतिप्रसवरूप१, अर्थात् निषेधाभावरूप है, न कि प्रैषादिरूप नियोग है । ( ‘भ्रम’ पद का ) जो यह ‘लोट्’ लकार है वह अतिसर्ग और प्राप्तकाल के अर्थ में हुआ है । भाव और अभाव में विरोध होने से दोनों की युगपत्२ ( एक समय में ) वाच्यता नहीं है । एवं क्रम से ( भी ) नहीं, क्योंकि विराम होने पश्चात् व्यापार नहीं होता । जैसा कि ‘( विशेषण में क्षीणशक्ति हो जाने के कारण फिर ) अभिधा विशेष्य तक नहीं पहुँचती’ इत्यादि द्वारा अभिधा व्यापार के विरत हो जाने पर व्यापार का असम्भव कहा गया है । १. नायिका पुंश्चली एवं प्रगल्भा है । उसके प्राणसमान प्रिय सङ्केतस्थान पर कोई धार्मिक बाबाजी अपनी असामयिक उपस्थिति से विघ्न तो उत्पन्न करने ही लगे साथ ही वहाँ की फूल- पत्तियाँ भी तोड़-तोड़ कर उस स्थान को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे । उससे न रहा गया तो उसने चाल चलते हुए उनसे प्रार्थना की कि वे इतमीनान से अब घूमें, क्योंकि गोदावरी तट के रहने वाले मतवाले सिंह ने उस कुत्ते को मार डाला है । बाबाजी एक तो कुत्ते से ही परेशान थे अब सिंह पहुँच आया । यहाँ घूमो या ‘भ्रम’ में लोट् लकार ‘विधि’ अर्थ का सूचक है, किन्तु यहाँ ‘विधि’ नियोग या आज्ञारूप नहीं है, क्योंकि वह पुंश्चली धार्मिक को आज्ञा नहीं दे रही है कि वह भ्रमण करे, बल्कि वह तो स्वयं भ्रमण कर रहा है, उसका भ्रमण स्वतः सिद्ध है । पुंश्चली धार्मिक के भ्रमण का विधान प्रतिषेधक तत्त्व जो कुत्ते का भय था, उसके अभाव द्वारा करती है. इसलिए यहाँ ‘विधि’ प्रतिषेधाभाव या ‘प्रतिप्रसव’ रूप है । इस प्रकार यहाँ ‘प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च’ ( ३. ३. १०३ ) इस पाणिनीय सूत्र के अनुसार अतिसर्ग या प्राप्तकाल में ‘लोट्’ हुआ है । ‘अतिसर्ग’ अर्थात् कामचार या स्वेच्छा-विहार । २. प्रस्तुत उदाहरण में ‘घूमो’ इस विधिरूप अर्थ के बाद ही ‘मत घूमो’ यह जो निषेध रूप अर्थ की प्रतीति हो रही है, यहाँ यह कहना गलत होगा कि दोनों विधि-निषेध रूप अर्थ जब कि ये दोनों एक दूसरे से सर्वथा विरुद्ध हैं, एक ही समय में ( युगपत् ) वाच्य हो रहे हैं, क्योंकि अभिधा जब एक विधिरूप अर्थ को बता चुकी तब उसकी प्रवृत्ति पुनः निषेध रूप अर्थ में नहीं होगी—यह नियम है कि कार्य करके विरत हो जाने पर व्यापार नहीं होता—‘विशेष्यं नाभिधा गच्छेत् क्षीणशक्तिर्विशेषणे ।’ शब्द के सङ्केतित अर्थ के अभिधान में जो व्यापार होता है वह ‘अभिधा’ कहलाता है । इस प्रकार यहाँ यह बात सिद्ध हुई कि ‘निषेध’ रूप अर्थ ( क्योंकि यह अर्थ ‘संकेतित’ नहीं है ) के बोध के लिए किसी अतिरिक्त शक्ति की कल्पना आवश्यक है, वह ‘शक्ति’ व्यञ्जना हो सकती है और इससे प्रतीत निषेध रूप अर्थ ‘व्यङ्ग्य’ होगा ।

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 113, कुल 680 में से · BharatKosha