भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 680 में से

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पृष्ठ 115

प्रथम उद्योतः ५५ लोचनम् तत्र च द्वितीयकक्ष्यायां 'भ्रमे'ति विध्यतिरिक्तं न किञ्चित्प्रतीयते, अन्वयमा- त्रस्यैव प्रतिपन्नत्वात् । न हि 'गङ्गायां घोषः' 'सिंहो वटुः' इत्यत्र यथान्वय एव बुभूषन् प्रतिहन्यते, योग्यताविरहात्; तथा तव भ्रमणनिषेद्धा स श्वा सिंहेन हतः, तदिदानीं भ्रमणनिषेधकारणवैकल्याद् भ्रमणं तवोचितमित्यन्व- यस्य काचित्क्षतिः । अत एव मुख्यार्थबाधा नात्र शङ्क्येति न विपरीतलक्षणाया अवसरः । भवतु वाऽसौ । तथापि द्वितीयस्थानसंक्रान्ता तावदसौ न भवति । तथा हि-मुख्यार्थबाधायां लक्षणायाः प्रक्लृप्तिः । बाधा च विरोधप्रतीतिरेव । न चात्र सिद्धि नहीं होने के कारण सामान्य विशेष का बोधन करते हैं'। उस दूसरी कक्ष्या में 'घूमो' इस विधि के अतिरिक्त कुछ नहीं प्रतीत होता है, क्योंकि केवल अन्वय प्रतीत होता है। 'गङ्गायां घोषः' और 'सिंहो वटुः' इन स्थलों में जिस प्रकार अन्वय ही होना चाहता हुआ, योग्यता के अभाव के कारण प्रतिहत हो जाता है, उस प्रकार 'तुम्हारे भ्रमण का निषेध करनेवाला वह कुत्ता सिंह के द्वारा मार डाला गया, अतः इस समय भ्रमण-निषेध के कारण के अभाव में तुम्हारा भ्रमण उचित है' इस अन्वय में कोई क्षति (बाधा) नहीं है। अतएव मुख्यार्थबाधा की आशङ्का नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार विपरीतलक्षणा का अवसर नहीं। अथवा वह लक्षणा हो। तब भी वह दूसरे स्थान में संक्रान्त नहीं हो सकती। जैसा कि मुख्य अर्थ की बाधा होने पर लक्षणा की कल्पना होती है। और, बाधा- विरोध की प्रतीति ही है। यहाँ पदार्थों का अपने-आपमें विरोध नहीं है। अगर परस्पर सहायता से। अर्थात् अभिधा से 'गोत्व' सामान्य का ज्ञान होगा न कि 'गौ' रूप विशेष का। विशेष में अभिधा को स्वीकार करने पर आनन्त्य और व्यभिचार दोष उपस्थित होते हैं, क्योंकि विशेष एक नहीं अनन्त होता है अतः सब में 'सङ्केत' सम्भव नहीं होगा और दूसरे, जिस गोविशेष के साथ सङ्केत का ग्रहण नहीं हुआ है उसका भी 'गो' पद से बोध होने की स्थिति में 'व्यभिचार' होगा। इसलिए 'सामान्य' या 'जाति' में ही अभिधा को माना गया है। दूसरी तात्पर्य- शक्ति विशेष रूप परस्पर अन्वित वाक्यार्थ में होती है। इस प्रकार तात्पर्य-शक्ति के द्वारा पदार्थों के परस्पर अन्वय के अतिरिक्त कुछ प्रतीत नहीं होता। जिस प्रकार 'गङ्गायां घोष' आदि लक्षणा के स्थल हैं उस प्रकार प्रस्तुत पद्य लक्षणा-विषय नहीं है, क्योंकि 'गङ्गायां घोषः' आदि में परस्पर अन्वय ही नहीं बन पाता, क्योंकि प्रवाह रूप गङ्गा में 'घोष' के धारण करने की 'योग्यता' नहीं है, किन्तु प्रस्तुत में तो 'अन्वय' अप्रतिहत रूप से बन जाता है, क्योंकि जब सिंह के द्वारा कुत्ता मार डाला गया, जिसके कारण भ्रमण में बाधा होती थी, तब भ्रमण उचित ही है। इस प्रकार अन्वय के उपपन्न हो जाने की स्थिति में मुख्यार्थ-बाधा की शङ्का ही नहीं होनी चाहिए। 'विपरीत- लक्षणा' का यह तभी प्रसंग होता जब कि परस्पर अन्वय के प्रतिहत होने पर मुख्यार्थ की बाधा होती। अन्ततः, 'भ्रमण-निषेध' रूप अर्थ की प्रतीति के लिए अतिरिक्त 'ध्वनन' व्यापार मानना ही पड़ेगा। (कुछ लोग भ्रम से तात्पर्य-शक्ति को 'तात्पर्या' शक्ति के नाम से लिखने लगे हैं, यह सर्वथा अमान्य है, जहाँ तक मैं समझता हूँ, किसी प्राचीन आचार्य ने 'तात्पर्या' प्रयोग नहीं किया है)।