ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ | सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम् पदार्थानां स्वात्मनि विरोधः। परस्परं विरोध इति चेत्—सोऽयं तर्ह्यन्वये विरोधः प्रत्येयः। न चाप्रतिपन्नेऽन्वये विरोधप्रतीतिः, प्रतिपत्तिश्चान्वयस्य नाभिधाशक्त्या, तस्याः पदार्थप्रतिपत्त्युपक्षीणाया विरम्यव्यापारात् इति तात्पर्यशक्त्यैवान्वयप्रतिपत्तिः। नन्वेवं 'अङ्गुल्यग्रे करिवरशतम्' इत्यत्राप्यन्वयप्रतीतिः स्यात्। किं न भवत्यन्वयप्रतीतिः दशदाडिमादिवाक्यवत्, किन्तु प्रमाणान्तरेण सोऽन्वयः प्रत्यक्षादिना बाधितः प्रतिपन्नोऽपि शुक्तिकायां रजतमिवेति तदवगमकारिणो वाक्यस्याप्रामाण्यम्। 'सिंहो माणवकः' इत्यत्र द्वितीयकक्ष्यान्निविष्टतात्पर्यशक्ति- समर्पितान्वयबाधकोल्लासानन्तरमभिधातात्पर्यशक्तिद्वयव्यतिरिक्ता तावत् तृती- यैव शक्तिस्तद्बाधकविधुरीकरणनिपुणा लक्षणाभिधाना समुल्लसति। विरोध है तो वह विरोध अन्वय में प्रतीत होना चाहिए। और, अन्वय (सम्बन्ध) के ज्ञात न होने पर विरोध की प्रतीति नहीं हो सकती और अन्वय का ज्ञान अभिधा- शक्ति से नहीं होगा, क्योंकि पदार्थ की प्रतिपत्ति (ज्ञान) हो जाने पर वह उपक्षीण (नष्ट) हो जाती है, फिर विरत होने पर व्यापार नहीं होता। इस प्रकार तात्पर्य-शक्ति से ही अन्वय की प्रतिपत्ति' होती है। (शङ्का) इस प्रकार तो 'अंगुलि के अग्रभाग में सैकड़ों हाथी' इस वाक्य में भी अन्वय²-प्रतीति हो जायगी ! (समाधान) क्या 'दशदाडिमादि' (महाभाष्य के) वाक्य की भाँति अन्वय की प्रतीति नहीं होगी ? किन्तु प्रत्यक्ष आदि प्रमाणान्तर से वह अन्वय ज्ञात होकर भी, शुक्ति में रजत की भाँति बाधित है, इस कारण उसके ज्ञान करानेवाले वाक्य का प्रामाण्य नहीं है। 'सिंहो माणवकः' यहाँ दूसरी कक्ष्या में रहनेवाली तात्पर्य- शक्ति से समर्पित अन्वय के बाधक (विरोध) के उल्लास के पश्चात् अभिधा और तात्पर्य इन दोनों शक्तियों से अतिरिक्त, लक्षणा नाम की तीसरी ही शक्ति उस बाधक के बाधन में निपुण समुल्लसित (प्रवृत्त) होती है। १. किसी प्रकार मान भी लिया जाय कि यहाँ लक्षणा का अवसर है। परन्तु मुख्यार्थ का बाधा या विरोध-प्रतीति कहाँ हो रही है ? आपस में यहाँ पदार्थों का विरोध नहीं है, परस्पर विरोध है तो अन्वय में विरोध होगा। परन्तु जब तक अन्वय की प्रतीति नहीं हो जाती तब तक विरोध की प्रतीति भी सम्भव नहीं। और यह पहले कहा ही जा चुका है कि अभिधा शक्ति 'अन्वय' में प्रवृत्त नहीं हो सकती, फिर 'तात्पर्य-शक्ति' से ही अन्वय की प्रतीति करनी होगी। इस प्रकार तात्पर्य शक्ति भी अन्वय की प्रतीति अर्थात् वाक्यार्थ का ज्ञान ही करने में कृतकार्य हो जाती है फिर अतिरिक्त अर्थ 'भ्रमण-निषेध' उसकी सीमा से बाहर हो जाता है। २. 'ऊपर' जो बाधित स्थल में भी तात्पर्य-शक्ति से अन्वय-प्रतीति को आपने स्वीकार किया है तब 'अङ्गुल्यग्रे करिवरशतम्' में भी वही स्थिति आपको स्वीकार होगी। इस शङ्का का भी समाधान स्वीकृत्यात्मक ही है। आचार्य का कहना है कि जहाँ तक अन्वय या वाक्यार्थ का ज्ञान है वह तो महाभाष्य के 'दशदाडिमादि' वाक्य की भाँति होगा ही। 'दश दाडिमानि, षडपूपाः, कुण्डम्, अजाजिनम्, पललपिण्डः, अधरोरुकमेतत् कुमार्याः, स्फैयकृतस्य पिता प्रतिशीनः' इति (महाभाष्य, १. २. ४५)। किन्तु शुक्ति में रजत का ज्ञान हो जाने पर भी प्रत्यक्षादि प्रमाण से