ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यच्चिदं घोषस्यातिपवित्रत्वशीतलत्वसेव्यत्वादिकं प्रयोजनमशब्दान्तर- वाच्यं प्रमाणान्तराप्रतिपन्नम्, वटोर्वा पराक्रमातिशयशालित्वं, तत्र शब्दस्य न तावन्न व्यापारः । तथाहि—तत्सामीप्यात्तद्धर्मत्वानुमानमनैकान्तिकम्, सिंह- शब्दवाच्यत्वं च वटोरसिद्धम् । अथ यत्र यत्रैवं शब्दप्रयोगस्तत्र तत्र तद्धर्मयोग जो कि यह घोष का अतिपवित्रत्व, अतिशीतलत्व और अतिसेव्यत्व आदि प्रयोजन, ( लाक्षणिक शब्द से ) अतिरिक्त शब्द द्वारा अवाच्य एवं ( शब्द से ) अतिरिक्त प्रमाण के द्वारा अज्ञात है, अथवा 'वटु' का अतिशयपराक्रमशालित्व ( प्रयोजन ) है, वहाँ शब्द का व्यापार नहीं है ऐसा नहीं¹। जैसा कि ('गङ्गायां घोषः' इस स्थल में ) 'तत्सामीप्य' के हेतु से तद्धर्मत्व का अनुमान² अनैकान्तिक ( व्यभिचारी ) है । और, 'वटु' का 'सिंह' शब्दवाच्यत्व हेतु असिद्ध ( स्वरूपासिद्ध ) है । ( यदि कहते हैं कि ) जहाँ-जहाँ इस प्रकार के शब्द का प्रयोग है वहाँ-वहाँ उसके धर्म का योग है, यह यही उत्तर देंगे कि गुण और अलङ्कार के औचित्य से सुन्दर शब्दार्थ-शरीर जब ध्वनन रूप आत्मा से युक्त होता है तभी 'काव्य' व्यवहार है। इससे तो कोई आत्मा की असारता व्यक्त नहीं होती है। दूसरे यह भी कि भक्ति ही ध्वनि है, गलत पक्ष है, क्योंकि भक्ति लक्षणा-व्यापार है और तृतीय कक्ष्या में यह व्यापार होता है। अर्थात् प्रथम कक्ष्या में अभिधा-व्यापार दूसरी में तात्पर्य-शक्ति और तीसरी में लक्षणा और ध्वनन-व्यापार चतुर्थ कक्ष्या में होता है। इस प्रकार न तो 'सिंहो वटुः' इत्यादि 'काव्य' की श्रेणी में आयेंगे और न तो भक्ति या लक्षणा ही 'ध्वनि' सिद्ध होगी। १. प्रसङ्ग यह प्राप्त है कि आखिर यहाँ 'प्रयोजन' को क्या समझा जाय ? इसके उत्तर में आचार्य को सिद्ध करना है कि यह 'प्रयोजन' सर्वथा शब्द के व्यापार का विषय है। इसीलिये आचार्य दृढ़ होकर कहते हैं कि शब्द का व्यापार नहीं है ऐसा नहीं, अर्थात् सर्वथा शब्द का ही व्यापार है। इसके शब्द-व्यापार के विषय होने के दो मुख्य कारण हैं, पहला यह कि प्रयोजन 'अशब्दान्तर वाच्य' है, अर्थात् लाक्षणिक शब्द ही, जैसे प्रस्तुत में 'गङ्गा' 'सिंह' आदि शब्द, 'प्रयोजन' का प्रतिपादन कर सकते हैं, तथा दूसरा कारण यह है कि 'शब्द' के अतिरिक्त किसी प्रमाण से ज्ञात नहीं होता है। इसी उद्देश्य से आचार्य ने आगे की पंक्तियों में 'अनुमान' और 'स्मृति' की आशङ्का करके इनकी विषयता का निराकरण किया है तथा शब्द-व्यापारों में अभिधा, तात्पर्य और लक्षणा का भी निराकरण करके इन शब्द-व्यापारों से अतिरिक्त चतुर्थ 'ध्वनन' व्यापार को माना है। २. 'गङ्गायां घोषः' और 'सिंहो वटुः' इन स्थलों में प्रतीयमान 'प्रयोजन' को 'अनुमान' प्रमाण का विषय माना जा सकता है अथवा नहीं यह विचारणीय है। आचार्य का सिद्धान्त पक्ष यह है कि यहाँ 'अनुमान' नहीं हो सकता, क्योंकि पहले स्थल में 'व्यभिचार' है और दूसरे में 'असिद्धि' कैसे ? प्रथम स्थल में 'अनुमान' का रूप यह होगा—'तीरं गङ्गागतातिपवित्रत्वादिकधर्मवत्, गङ्गासामी- प्यात्', इस प्रकार का 'अनुमान' करने वाला यह कहना चाहता है कि जो वस्तु गङ्गा के समीप होती है वह गङ्गा के समान ही पवित्र आदि होती है, गङ्गा के प्रायः सभी गुण उसमें संक्रान्त हो जाते हैं, इसका उदाहरण मुनिजन हैं, जो गङ्गा के समीप रहते हैं और पवित्र होते हैं। किन्तु यहीं यह प्रतिकूल तर्क क्यों न उपस्थित किया जाय कि शिर की खोपड़ी भी तो गङ्गा के समीप रह सकती है, किन्तु वह अति पवित्र नहीं है, ऐसी स्थिति में 'गङ्गा-सामीप्य' को हेतु मानकर अतिपवित्रत्व आदि को सिद्ध करना व्यभिचार-दोषग्रस्त है। इसी को आचार्य ने 'अनैकान्तिक' कहा है।