भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

प्रथम उद्योतः ५९ लोचनम् इत्यनुमानम्, तस्यापि व्याप्तिग्रहणकाले मौलिकं प्रमाणान्तरं वाच्यम्, न चास्ति । न च स्मृतिरियम्, अननुभूते तदयोगात्, नियमाप्रतिपत्तेर्वक्तुरेर्त- द्विवक्षितमित्यध्यवसायाभावप्रसङ्गाच्चेत्यस्ति तावदत्र शब्दस्यैव व्यापारः। व्यापारश्च नाभिधात्मा, समयाभावात् । न तात्पर्यात्मा, तस्यान्वयप्रतीतावेव परिक्षयात् । न लक्षणात्मा, उक्तादेव हेतोः स्खलद्गतित्वाभावात् । तत्रापि हि अनुमान होगा। उसका भी व्याप्ति-ग्रहण के समय मौलिक प्रमाण कहना चाहिए, पर है नहीं। न कि यह स्मृति १ है, अननुभूत में क्योंकि उसका योग नहीं और नियम का ज्ञान न होने के कारण 'वक्ता का यह विवक्षित है' इस अध्यवसाय का अभाव- प्रसङ्ग है। इसलिए यहाँ शब्द का ही व्यापार है। और (यहाँ) व्यापार अभिधारूप नहीं है, क्योंकि 'समय' (सङ्केत) का अभाव है। और तात्पर्यरूप व्यापार नहीं है, क्योंकि वह 'अन्वय' (सम्बन्ध) का बोध होने पर ही परिक्षीण हो जाता है। लक्षणा रूप (व्यापार) नहीं है, क्योंकि कहे हुए कारण से ही स्खलद्गतित्व' का अभाव है। दूसरे स्थल में 'सिंहो माणवकः' में अनुमान का रूप यह होगा-वटुः सिंहधर्मवान् सिंह- शब्दवाच्यत्वात्, सम्प्रतिपन्नसिंहवत्; यहाँ हेतु 'स्वरूपासिद्ध' है, क्योंकि 'सिंह' शब्द से 'वटु' वाच्य नहीं होता। इसी प्रकार इन स्थलों में कोई अन्य प्रकार का अनुमान भी, जैसे 'जहाँ-जहाँ ऐसा प्रयोग होता है वहाँ उसके धर्म का योग होता है' यह अनुमान भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि अनुमान तब तक सिद्ध नहीं होता जब तक कि व्याप्ति-ग्रहण के समय मौलिक प्रमाणान्तर नहीं हो। प्रस्तुत में, जो भी व्याप्ति सामान्य को लेकर की जायगी वह प्रामाणिक नहीं होगी, क्योंकि व्याप्ति-ग्रह का प्रयोजन कोई प्रत्यक्ष आदि प्रमाण नहीं। इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि अनुमान प्रमाण का विषय किसी प्रकार 'प्रयोजन' को नहीं बनाया जा सकता। १. आचार्य लिखते हैं कि यह 'स्मृति' नहीं है, अर्थात् गङ्गागत शैत्य-पावनत्व आदि प्रयोजन के ज्ञान को 'स्मृति' भी नहीं कहा जा सकता, अर्थात् 'प्रयोजन' स्मृति का भी विषय नहीं बन सकता, क्योंकि स्मृति उसकी होती है जो पहले कभी अनुभूत हो चुका हो। यहाँ ऐसा कोई पूर्वानुभव विद्यमान नहीं है जिसके आधार पर 'स्मृति' होगी। कथञ्चित् भी स्मृति को यहाँ लाया नहीं जा सकता, क्योंकि ऐसा कोई यहाँ नियामक नहीं है जिसके बल से यह समझा जाय कि वक्ता का यही विवक्षित है। अन्ततः जब कि अनुमान भी नहीं और स्मृति भी नहीं, तो स्वीकार करना होगा कि यहाँ शब्द का ही व्यापार है। २. यहाँ शब्द का व्यापार न 'अभिधा' है, न 'तात्पर्य' है और न 'लक्षणा' है। 'अभिधा' तो इसलिये नहीं है कि गङ्गा शब्द का 'समय' या संकेत शैत्य-पावनत्व में नहीं मिलता, 'तात्पर्य' इसलिये नहीं है कि वह केवल अन्वय या परस्पर सम्बन्ध की प्रतीति होते ही समाप्त हो जाता है और लक्षणा व्यापार भी यहाँ नहीं है क्योंकि मुख्यार्थ-बाध आदि हेतु, जो कहा जा चुका है सो यहाँ अवगमन रूप व्यापार स्खलित या प्रतिहत नहीं हो रहा है। 'स्खलद्गतित्व' अर्थात् स्वार्थ- भ्रंश। लक्षणा-व्यापार वहीं होता है जहाँ स्खलद्गतित्व या स्वार्थभ्रंश होता है। स्पष्टीकरण यह कि 'गङ्गायां घोषः' इस स्थल में 'गङ्गा' शब्द का प्रवाह रूप स्व अर्थ मुख्यार्थ-बाध आदि स्खलित होकर 'तीर' अर्थ को प्रकट करता है अतः 'तीर' अर्थ में लक्षणा-व्यापार है, किन्तु 'प्रयोजन' रूप शैत्य-पावनत्व के अंश में स्वार्थभ्रंश का अनुभव नहीं होता, क्योंकि मुख्यार्थबाध आदि की वहाँ प्रवृत्ति ही नहीं। ऐसी स्थिति में लक्षणा-व्यापार का विषय यह नहीं हो सकता। यदि किसी प्रकार