भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

६० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् स्खलद्गतित्वे पुनर्मुख्यार्थबाधा निमित्तं प्रयोजनमित्यनवस्था स्यात् । अत एव यत्केनचिल्लक्षितलक्षणेति नाम कृतं तद्व्यसनमात्रम् । तस्मादभिधातात्पर्यलक्ष- णाव्यतिरिक्तश्चतुर्थोऽसौ व्यापारो ध्वननद्योतनव्यञ्जनप्रत्यायनावगमनादिसोद्- रव्यपदेशनिरूपितोऽभ्युपगन्तव्यः । यद्वक्ष्यति— 'मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्त्यार्थदर्शनम् । यदुद्दिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्गतिः ।।' इति ।। तेन समयापेक्षा वाच्यावगमनशक्तिरभिधाशक्तिः । तदन्यथानुपपत्तिस- हायार्थावबोधनशक्तिस्तात्पर्यशक्तिः । मुख्यार्थबाधादिसहकार्यपेक्षार्थप्रतिभास- नशक्तिर्लक्षणाशक्तिः। तच्छक्तित्रयोपजनितार्थावगममूलजाततत्प्रतिभासपवित्रि- यदि उस तीरादि अर्थ में भी स्खलद्गति ( स्वार्थभ्रंश ) होना मानते हैं तब पुनः मुख्यार्थबाधा और निमित्त रूप प्रयोजन होने से अनवस्था होगी। अतएव जो कि किसी नें ( लक्षित तीरादि में पुनः पावनत्वादि प्रयोजन को लक्षित करते हुए ) 'लक्षितलक्षणा' यह नाम रखा है वह तो व्यसनमात्र है । अतः अभिधा, तात्पर्य, लक्षणा से व्यतिरिक्त चौथा यह व्यापार, जिसे ध्वनन, द्योतन, व्यंजन, प्रत्यायन, अवगमन आदि पर्याय शब्दों से निरूपित किया गया है, स्वीकार के योग्य है। जिसे कहेंगे— 'मुख्य वृत्ति ( अभिधा व्यापार ) को छोड़कर गुणवृत्ति ( लक्षणारूप व्यापार ) से ( अमुख्य ) अर्थ अमुख्य अर्थ का दर्शन ( ज्ञान ) जिस ( प्रयोजनरूप ) फल को उद्देश्य करके करते हैं उसमें शब्द स्खलद्गति नहीं है ।' इस प्रकार समय ( सङ्केत ) की अपेक्षा रखनेवाली, वाच्य अर्थ के बोधन की शक्ति 'अभिधाशक्ति' है। उसकी अन्यथानुपपत्तिरूप सहायवाली, अर्थावबोधन की शक्ति 'तात्पर्यशक्ति¹' है। लक्षणाशक्ति मुख्यार्थबाध आदि तीन सहकारियों की अपेक्षा से, इस प्रयोजन में भी स्खलद्गतित्व मान लिया जाय तो फिर मुख्यार्थ-बाधा, निमित्त और प्रयोजन की कल्पना करनी पड़ेगी और इस प्रकार अनवस्था होगी। इसलिये यही स्वीकार करना चाहिये कि 'प्रयोजन' में लक्षणा-व्यापार नहीं होता । इसी विषय को आचार्य मम्मट ने 'काव्यप्रकाश' के द्वितीय उल्लास में इन कारिकाओं द्वारा निरूपित किया है— नाभिधा, समयाभावात्, हेत्वभावान्न लक्षणा । लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यत्र बाधो योगः फलेन नो । न प्रयोजनमेतस्मिन् न च शब्दः स्खलद्गतिः । एवमप्यनवस्था स्याद् या मूलक्षयकारिणी । 'काव्यप्रदीप' में 'स्खलद्गति' का अर्थ 'मुख्यार्थबाध आदि तीनों की अपेक्षा करके बोधक होना' किया है—'मुख्यार्थबाधादित्रयमपेक्ष्य बोधकत्वं स्खलद्गतित्वम् ।' १. यह वाक्य अत्यन्त उलझा हुआ है। जैसा कि इसका संस्कृत रूप है—'तदन्यथानुपपत्ति- सहायार्थावबोधनशक्तिस्तात्पर्यशक्तिः'; एक अर्थ के अनुसार उसके अर्थात् अभिधा के अन्यथा अर्थात् विना जिसकी अनुपपत्ति ( असम्भव ) सहायक है अर्थात् अभिधाशक्ति की सहायता प्राप्त करके ही तात्पर्यशक्ति क्रियाशील होती है, और जिस प्रकार अभिधा सङ्केतित अर्थ के अवबोधन की