ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः ६१ लोचनम् तप्रतिपत्तप्रतिभासहायार्थद्योतनशक्तिर्ध्वननव्यापारः; स च प्राग्वृत्तं व्यापारत्रयं न्यक्कुर्वन्प्रधानभूतः काव्यात्मेत्याशयेन निषेधप्रमुखतया च प्रयोजनविषयोऽपि निषेधविषय इत्युक्तम् । अभ्युपगममात्रेण चैतदुक्तम् ; न त्वत्र लक्षणा, अत्यन्त- तिरस्कारान्यसंक्रमणयोरभावात् । न ह्यर्थशक्तिमूलेऽस्या व्यापारः । सहकारि- अर्थ के प्रतिभासन (बोधन) की शक्ति है। इन तीनों शक्तियों से उत्पन्न अर्थबोध के मूल से हुई, (उन अभिधेय आदि अर्थों) के प्रतिभास से पवित्रित प्रतिपत्ता (सहृदय) की प्रतिभा की सहायता से अर्थ के द्योतन की शक्ति 'ध्वननव्यापार'¹ है। और वह पहले हुए तीनों व्यापारों को अभिभूत करता हुआ, प्रधानभूत काव्यात्मा है इस आशय से (वृत्तिकार ने ही ध्वनिव्यापार को) निषेध के प्रमुख होने के कारण प्रयोजनविषयक होने पर भी 'निषेधविषयक'² कहा है। अभ्युपगम (प्रौढिवाद) मात्र से यह कहा है कि यहाँ लक्षणा नहीं है क्योंकि अत्यन्त तिरस्कार और अन्यसंक्रमण यहाँ नहीं हैं। अर्थशक्तिमूल में इस (लक्षणा) का व्यापार नहीं है। शक्ति का भेद सहकारी³ के शक्ति है उसी प्रकार तात्पर्यशक्ति अन्वय रूप अर्थ के अवबोधन की शक्ति है। दूसरे अर्थ के अनुसार उसकी अर्थात् अन्वय रूप अर्थ की अन्यथा अर्थात् तात्पर्य के अभाव में जो अनुपपत्ति है उसकी सहायता वाली यह तात्पर्यशक्ति है। इस प्रकार यहाँ आचार्य ने तात्पर्यशक्ति को 'व्यतिरेक' (तदभावे तदभावः = कारणाभावे कार्याभावः) के प्रकार से अनिवार्य सिद्ध किया है। मतलब यह कि तात्पर्यशक्ति के अभाव में वाक्यार्थ-बोध की अनुपपत्ति होगी यही कारण है कि तात्पर्यशक्ति को स्वीकार करना चाहिए। इस प्रकार यहाँ वाक्यार्थ-बोधाभाव ही तात्पर्यशक्ति की सिद्धि का सहायक है। १. पूरी एक पंक्ति में आचार्य ने 'ध्वननव्यापार' के प्रति अभिधा आदि तीनों शक्तियों के द्वारा प्रयोज्य अर्थावबोध को सहकारी कारण बताया है और साथ ही यह भी निर्देश किया है कि इस व्यापार से ध्वन्यमान अर्थ का ज्ञान उसी प्रतिपत्ता को हो सकता है जो काव्यार्थ के पुनः पुनः अनुसन्धान (प्रतिभास) से पवित्रित या संस्कृत होकर पूर्ण 'सहृदय' हो जाता है। २. वृत्तिकार ने 'कच्चिद् वाच्ये विधिरूपे निषेधरूपः' अर्थात् कहीं पर वाच्य विधिरूप होता है तो व्यङ्ग्य निषेधरूप, यह कह कर 'भ्रम धार्मिक०' को उदाहृत किया है। यद्यपि 'प्रयोजन' जो सर्वथा 'व्यङ्ग्य' होता है यहाँ 'निषेध' नहीं बल्कि 'स्वच्छन्दविहार' आदि है, चूँकि इस 'प्रयोजन' की प्रतीति 'निषेध' की प्रतीति के द्वारा होती है इस कारण यहाँ वृत्तिकार ने 'निषेध' को व्यङ्ग्य कहा है। इससे यह समझना गलत होगा कि यहाँ 'निषेध' लक्षणा का विषय है, क्योंकि यहाँ न तो अत्यन्त तिरस्कार है और न अन्य सङ्क्रमण है। ३. अर्थशक्तिमूल ध्वनि का वह स्थल है जहाँ सहकारी के रूप में वक्तृ, बोद्धव्य आदि के वैशिष्ट्य की प्रतीति हो, परन्तु लक्षणा में मुख्यार्थ-बाध आदि सहकारी होते हैं इस कारण दोनों का स्थल एक नहीं हो सकता। सहकारिभेद से शक्ति का भेद होता है इस सिद्धान्त के उदाहरण में आचार्य का कहना है कि वही शब्द का, जो अर्थ-बोधन के लिए प्रयुक्त होता है, व्याप्तिस्मृति, पक्षधर्मताज्ञान आदि सहकारी की अपेक्षा के बल पर विवक्षा के ज्ञान के लिए अनुमापकत्व व्यापार होता है और जब इन्द्रियसन्निकर्ष आदि सहकारी की अपेक्षा होगी तो 'विकल्पकत्व' व्यापार (सविकल्पकज्ञान को उत्पन्न करने की शक्ति) होगा। जहाँ अनुमापकत्व व्यापार होगा वहाँ प्रयोग इस प्रकार होगा—'अयं वक्ता एतद्विवक्षुः एतच्छब्दप्रयोगात्'। शब्द श्रोत्र आदि के