ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
भेदाच्च शक्तिभेदः स्पष्ट एव, यथा तस्यैव शब्दस्य व्याप्तिस्मृत्यादिसहकृतस्य विवक्षावगतावनुमापकत्वव्यापारः । अक्षादिसहकृतस्य वा विकल्पकत्वव्यापारः। एवमभिहितान्वयवादिनामियदनपह्नवनीयम् । योऽप्यन्विताभिधानवादी 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' इति हृदये गृहीत्वा शरवदभिधाव्यापारमेव दीर्घदीर्घमिच्छति, तस्य यदि दीर्घो व्यापारस्तदेकोऽ- साविति कुतः ? भिन्नविषयत्वात् । अथानेकोऽसौ ? तद्विषयसहकारिभेदादस- जातीय एव युक्तः । सजातीये च कार्ये विरम्यव्यापारः शब्दकर्मबुद्ध्यादीनां पदार्थविद्भिर्निषिद्धः । असजातीये चास्मन्नय एव । अथ योऽसौ चतुर्थकक्षानिविष्टोऽर्थः, स एव झटिति वाक्येनाभिधीयत भेद से होता है यह स्पष्ट है। जैसे उसी शब्द के सहकारी व्याप्तिस्मृति आदि हों और उनके द्वारा विवक्षा (वक्ता की इच्छा) का ज्ञान हो, तब अनुमापकत्व व्यापार होगा। अथवा चक्षु आदि सहकारी में तब विकल्पकत्व व्यापार होगा। इस प्रकार 'अभिहितान्वयवादियों' के लिए यह ध्वनन व्यापार का अस्तित्व अनिराकरणीय है। जो कि अन्विताभिधानवादी२ 'शब्द का जिसमें तात्पर्य होता है वह शब्द का अर्थ होता है' इस बात को हृदय में रखकर, बाण की भाँति एक अभिधा व्यापार को ही दीर्घ-दीर्घ मानता है, उसका यदि वह दीर्घ व्यापार एक है सो कैसे ? क्योंकि विषय के भिन्न होने से (व्यापार को भी भिन्न होना चाहिए) । यदि वह व्यापार अनेक है तो विषय और सहकारी के भेद से असजातीय ही है यह (मानना) ठीक होगा। और कार्य के सजातीय मानने पर पदार्थविद् लोगों ने शब्द, बुद्धि और कर्म के विराम हो जाने के बाद व्यापार का निषेध किया है। और यदि (व्यापार को) असजातीय मानते हैं तो हमारा नय (पक्ष) ही है। (यदि कहें) जो वह चौथी कक्षा में रहने वाला अर्थ है वह भी झट से वाक्य के
सहकार से अपना प्रत्यक्ष उत्पन्न करता है। इस प्रकार एक ही शब्द के अर्थ-ज्ञान में सहकारी भेद को लेकर व्यापारभेद हो गया है। १. अभिहितान्वयवादी—अन्वय या पदों के सम्बन्ध के अर्थ के पक्षपाती ये आचार्य मीमांसक हैं और ये 'भाट्ट' या 'तौतातिक' मत के अनुयायी माने जाते हैं। २. अन्विताभिधानवादी—इसे प्राभाकर मत कहते हैं। यहाँ 'अभिधा' के अतिरिक्त कोई व्यापार नहीं माना जाता। जिस प्रकार एक ही बाण दीर्घ-दीर्घ व्यापार के द्वारा अपने लक्ष्य तक पहुँच जाता है उसी प्रकार एक ही अभिधा-व्यापार दीर्घ-दीर्घ होकर वक्ता के अभिप्रेत अर्थ का ज्ञान करा देता है। किन्तु जब आचार्य इस सिद्धान्त को अपने तर्क की कसौटी पर लाते हैं। तब यह विशृङ्खल हो जाता है। क्योंकि किसी प्रकार एक ही व्यापार को नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जिस व्यापार से विधि रूप अर्थ का बोध होता है उसी से निषेध रूप अर्थ करना सम्भव नहीं, अतः मानना पड़ेगा कि व्यापार अनेक है, साथ ही विषय और सहकारी के भेद से उसे असजातीय भी मानना होगा। अनेक व्यापार को सजातीय इसलिए नहीं मान सकते कि शब्द, बुद्धि और कर्म का विरम्य व्यापार नहीं होता।