भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 123

प्रथम उद्योतः ६३ लोचनम् इत्येवंविधं दीर्घदीर्घत्वं विवक्षितम्, तर्हि तत्र सङ्केताकरणात्कथं साक्षात्प्रति- पत्तिः। निमित्तेषु सङ्केतः, नैमित्तिकस्त्वसावर्थस्सङ्केतानपेक्ष एवेति चेत्- पश्यत श्रोत्रियस्योक्तिकौशलम् । यो ह्यसौ पर्यन्तकक्षाभाग्यर्थः प्रथमं प्रतीतिप- थमवतीर्णः, तस्य पश्चात्तनः पदार्थावगमाः निमित्तभावं गच्छन्तीति नूनं मीमांसकस्य प्रपौत्रं प्रति नैमित्तिकत्वमभिमतम् । अथोच्यते—पूर्वं तत्र सङ्केतग्रहणसंस्कृतस्य तथा प्रतिपत्तिर्भवतीत्यमुया वस्तुस्थित्या निमित्तत्वं पदार्थानाम्, तर्हि तदनुसरणोपयोगि न किञ्चिदप्युक्तं द्वारा अभिहित हो जाता है. इस प्रकार का दीर्घदीर्घत्व विवक्षित है, तब यदि 'वहाँ सङ्केत न करने के कारण कैसे उसकी साक्षात् प्रतिपत्ति हो सकती है ? सङ्केत तो निमित्तों में होता है वह अर्थ तो नैमित्तिक होता है, अतः वह सङ्केत की अपेक्षा ही नहीं रखता' यदि यह कहें तब तो देखो जरा वैदिक की वचनचातुरी ! जो कि यह (अर्थ) सबसे अन्त (पर्यन्त) की कक्षा में रहने वाला है वह पहले प्रतीति के पथ में अवतीर्ण होता है, उसके बाद में पदार्थज्ञान निमित्तभाव को प्राप्त करते हैं—इस प्रकार निश्चय ही मीमांसक को प्रपौत्र¹ के प्रति नैमित्तिकत्व अभिमत है ! यदि कहते हैं—'पहले वहां सङ्केतग्रह से संस्कृत (हो जाने पर) उस प्रकार की (पार्यन्तिक अर्थ की) प्रतीति होती है इस वस्तुस्थिति से पदार्थों का निमित्तत्व है।' तब तो फिर उसके अनुसरण² के उपयोग का कोई निमित्त नहीं बताया गया ! दूसरे १. ऊपर जो कि 'दीर्घ दीर्घ' की बात कही गई है उसमें यदि मीमांसक के पक्ष से यह स्वीकार किया जाय कि चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ झटिति वाक्य द्वारा अभिहित कर दिया जाता है तब अनेक व्यापार की कल्पना की स्थिति नहीं रह जाती । इस स्थिति में आचार्य कहते हैं कि तब तो और भी गड़बड़ी उपस्थित होगी, क्योंकि चतुर्थ कक्ष्यानिविष्ट अर्थ की साक्षात् प्रतिपत्ति संकेत किए बिना कैसे हो सकती है ? यदि नैमित्तिक रूप उस अर्थ को संकेत की अपेक्षा से रहित माना गया तब तो एक विचित्र बात होगी । क्योंकि जो चतुर्थ कक्ष्या का अर्थ है सबसे पहले प्रतीत होगा और उसके पश्चात् उत्पन्न होने वाले पदार्थज्ञान उसके निमित्त होंगे ! मीमांसक महोदय अपने पक्ष के समर्थन में यहाँ तक आ पहुँचे कि वे अपने प्रपौत्र को भी अपना कारण बेहिचक स्वीकार कर लेंगे । स्पष्ट यह कि जब कि मीमांसक के अनुसार चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला अर्थ अपने निमित्त रूप पदार्थज्ञान से पहले उत्पन्न होता है तब मीमांसक अपने प्रपौत्र के उत्पन्न होने के बाद में उत्पन्न हुए होंगे यह उन्हें अवश्य अभिमत होगा ! इस प्रकार यहाँ आचार्य ने मीमांसकों की लिहाड़ी ली है । २. पुनः अन्विताभिधानवादी मीमांसक का कहना है कि जहाँ तक यहाँ पदार्थों के निमित्त होने का प्रश्न है वह पहले पदार्थों में संकेतग्रह के मान लेने पर हल हो जाता है। इस प्रकार चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला अर्थ पहले पदार्थों में संकेतग्रह से संस्कृत रूप में उत्पन्न होता है। ऐसा मान लेने पर पदार्थ निमित्त बन जाते हैं। इस पर आचार्य कहते हैं कि उसके अनुसरण का यहाँ आपने कोई उपयोग नहीं कहा ! अर्थात् पहले पार्यन्तिक अर्थ को संकेतग्रह से संस्कृत करने का उपयोग तो यही होना चाहिए कि पहले पदार्थों का ज्ञान हो तत्पश्चात् चतुर्थ कक्ष्यानिविष्ट अर्थ का ज्ञान हो । इस प्रकार पदार्थों का निमित्तत्व भी सार्थक होगा । दूसरे आपके मत में