ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
प्रथम उद्योतः ६३ लोचनम् इत्येवंविधं दीर्घदीर्घत्वं विवक्षितम्, तर्हि तत्र सङ्केताकरणात्कथं साक्षात्प्रति- पत्तिः। निमित्तेषु सङ्केतः, नैमित्तिकस्त्वसावर्थस्सङ्केतानपेक्ष एवेति चेत्- पश्यत श्रोत्रियस्योक्तिकौशलम् । यो ह्यसौ पर्यन्तकक्षाभाग्यर्थः प्रथमं प्रतीतिप- थमवतीर्णः, तस्य पश्चात्तनः पदार्थावगमाः निमित्तभावं गच्छन्तीति नूनं मीमांसकस्य प्रपौत्रं प्रति नैमित्तिकत्वमभिमतम् । अथोच्यते—पूर्वं तत्र सङ्केतग्रहणसंस्कृतस्य तथा प्रतिपत्तिर्भवतीत्यमुया वस्तुस्थित्या निमित्तत्वं पदार्थानाम्, तर्हि तदनुसरणोपयोगि न किञ्चिदप्युक्तं द्वारा अभिहित हो जाता है. इस प्रकार का दीर्घदीर्घत्व विवक्षित है, तब यदि 'वहाँ सङ्केत न करने के कारण कैसे उसकी साक्षात् प्रतिपत्ति हो सकती है ? सङ्केत तो निमित्तों में होता है वह अर्थ तो नैमित्तिक होता है, अतः वह सङ्केत की अपेक्षा ही नहीं रखता' यदि यह कहें तब तो देखो जरा वैदिक की वचनचातुरी ! जो कि यह (अर्थ) सबसे अन्त (पर्यन्त) की कक्षा में रहने वाला है वह पहले प्रतीति के पथ में अवतीर्ण होता है, उसके बाद में पदार्थज्ञान निमित्तभाव को प्राप्त करते हैं—इस प्रकार निश्चय ही मीमांसक को प्रपौत्र¹ के प्रति नैमित्तिकत्व अभिमत है ! यदि कहते हैं—'पहले वहां सङ्केतग्रह से संस्कृत (हो जाने पर) उस प्रकार की (पार्यन्तिक अर्थ की) प्रतीति होती है इस वस्तुस्थिति से पदार्थों का निमित्तत्व है।' तब तो फिर उसके अनुसरण² के उपयोग का कोई निमित्त नहीं बताया गया ! दूसरे १. ऊपर जो कि 'दीर्घ दीर्घ' की बात कही गई है उसमें यदि मीमांसक के पक्ष से यह स्वीकार किया जाय कि चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ झटिति वाक्य द्वारा अभिहित कर दिया जाता है तब अनेक व्यापार की कल्पना की स्थिति नहीं रह जाती । इस स्थिति में आचार्य कहते हैं कि तब तो और भी गड़बड़ी उपस्थित होगी, क्योंकि चतुर्थ कक्ष्यानिविष्ट अर्थ की साक्षात् प्रतिपत्ति संकेत किए बिना कैसे हो सकती है ? यदि नैमित्तिक रूप उस अर्थ को संकेत की अपेक्षा से रहित माना गया तब तो एक विचित्र बात होगी । क्योंकि जो चतुर्थ कक्ष्या का अर्थ है सबसे पहले प्रतीत होगा और उसके पश्चात् उत्पन्न होने वाले पदार्थज्ञान उसके निमित्त होंगे ! मीमांसक महोदय अपने पक्ष के समर्थन में यहाँ तक आ पहुँचे कि वे अपने प्रपौत्र को भी अपना कारण बेहिचक स्वीकार कर लेंगे । स्पष्ट यह कि जब कि मीमांसक के अनुसार चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला अर्थ अपने निमित्त रूप पदार्थज्ञान से पहले उत्पन्न होता है तब मीमांसक अपने प्रपौत्र के उत्पन्न होने के बाद में उत्पन्न हुए होंगे यह उन्हें अवश्य अभिमत होगा ! इस प्रकार यहाँ आचार्य ने मीमांसकों की लिहाड़ी ली है । २. पुनः अन्विताभिधानवादी मीमांसक का कहना है कि जहाँ तक यहाँ पदार्थों के निमित्त होने का प्रश्न है वह पहले पदार्थों में संकेतग्रह के मान लेने पर हल हो जाता है। इस प्रकार चतुर्थ कक्ष्या में रहने वाला अर्थ पहले पदार्थों में संकेतग्रह से संस्कृत रूप में उत्पन्न होता है। ऐसा मान लेने पर पदार्थ निमित्त बन जाते हैं। इस पर आचार्य कहते हैं कि उसके अनुसरण का यहाँ आपने कोई उपयोग नहीं कहा ! अर्थात् पहले पार्यन्तिक अर्थ को संकेतग्रह से संस्कृत करने का उपयोग तो यही होना चाहिए कि पहले पदार्थों का ज्ञान हो तत्पश्चात् चतुर्थ कक्ष्यानिविष्ट अर्थ का ज्ञान हो । इस प्रकार पदार्थों का निमित्तत्व भी सार्थक होगा । दूसरे आपके मत में
६४ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् स्यात् । न चापि प्राक्पदार्थेषु सङ्केतग्रहणं वृत्तम्, अन्वितानामेव सर्वदा प्रयोगात् । आवापोद्वापाभ्यां तथाभाव इति चेत्-सङ्केतः पदार्थमात्र एवेत्य- भ्युपगमे पाश्चात्त्यैव विशेषप्रतीतिः । अथोच्यते—दृष्टैव झटिति तात्पर्यप्रतिपत्तिः किमत्र कुर्म इति । तदिदं वय- मपि न नाङ्गीकुर्मः । यद्वक्ष्यामः— तद्वत्सचेतसां सोऽर्थो वाक्यार्थविमुखात्मनाम् । बुद्धौ तत्त्वावभासिन्यां झटित्येवावभासते ॥ इति ॥ यह कि पहले पदार्थों में सङ्केतग्रह भी नहीं हुआ है, क्योंकि सर्वदा अन्वितों का ही प्रयोग है । यदि कहिए—'आवापोद्वाप' के द्वारा उस प्रकार (पृथक् पदार्थों में सङ्केतग्रह) होगा, तब तो सङ्केत को पदार्थमात्र में ही स्वीकार करने पर विशेष (वाक्यार्थ ) की प्रतीति बाद में ही होगी । यदि कहते हैं—'झट-से तात्पर्य (पर्यन्तिक अर्थ) की प्रतीति देखी गई है तो हम क्या करें ?' तो हम भी इसे अस्वीकार नहीं करते ! क्योंकि हम कहेंगे— 'उस प्रकार वाक्यार्थ से विमुख स्वभाव वाले सहृदय जनों की तत्त्वावभासिनी बुद्धि में वह अर्थ (पर्यन्तिक अर्थ) झट से अवभासित हो जाता है।' पदार्थों में संकेतग्रह होता ही नहीं, क्योंकि अन्वित पदार्थों का ही सर्वदा आप प्रयोग करते हैं। ऐसी स्थिति में संकेतग्रह को पहले मानने का पक्ष सर्वथा अन्विताभिधानवादी मीमांसक के मत में गलत होगा । १. आवापोद्वाप = प्रक्षेप-निक्षेप; ग्रहण-त्याग । यहाँ अन्विताभिधानवाद का स्पष्टीकरण आवश्यक है । जैसा कि 'अभिहितान्वयवाद' में पहले 'अभिधा' शक्ति द्वारा पदार्थों का ज्ञान, तत्पश्चात् तात्पर्य शक्ति द्वारा अन्वय रूप वाक्यार्थ का ज्ञान है वह प्रस्तुत 'अन्विताभिधानवाद' में सर्वथा त्याज्य पक्ष है। इसके अनुसार 'अभिधा' से अन्वित पदार्थ का ही ज्ञान होता है अर्थात् जो वाक्यार्थ है वही वाच्यार्थ है। ये लोग अन्वयांश में अतिरिक्त शक्ति की कल्पना नहीं करते । जैसे 'गामानय' इस वाक्य में 'गो' शब्द का कोई अर्थ नहीं, बल्कि यहाँ 'गौ' की प्रतीति 'आनयन' से अन्वित होकर, एवं 'आनयन' की प्रतीति 'गौ' से अन्वित होकर होती है । यह मत प्रभाकर-मत या गुरुमत के नाम से प्रसिद्ध है। प्रभाकर ने 'व्यवहार' को संकेतग्रह का प्रधान उपाय माना है। व्यवहार में देखा जाता है कि कोई बड़ा आदमी (उत्तम वृद्ध) अपने से छोटे आदमी (मध्यम वृद्ध) से 'गामानय' कहता है, उस समय वह दूसरा आदमी 'गौ' को लाकर उपस्थित करता है। समीप में स्थित बालक उत्तम वृद्ध के कथन और मध्यम वृद्ध के कार्य दोनों को सुनता और देखता है। इस प्रकार वह बालक 'गामानय' इस अखण्ड वाक्य का अर्थ-ज्ञान करता है। तत्पश्चात् उत्तम वृद्ध के द्वारा 'गां बधान, अश्वमानय' (गौ को बाँधो और अश्व को लाओ) यह कहे जाने पर बालक 'गाम्' और 'आनय' का अलग-अलग अर्थ ग्रहण करता है। यही 'आवापोद्वाप' के द्वारा संकेत का ग्रहण है। इस पर आचार्य अभिनवगुप्त का कहना है कि ऐसी स्थिति में आप भी यही स्वीकार कर रहे हैं कि संकेत पदार्थ मात्र में ही होगा, फिर वाक्यार्थ रूप विशेष की प्रतीति पश्चात् ही होगी, पहले नहीं। इसलिये 'दीर्घदीर्घतरव्यापार' का पक्ष किसी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता ।
प्रथम उद्योतः ६५ लोचनम् किं तु सातिशायानुशीलनाभ्यासात्तत्र सम्भाव्यमानोऽपि क्रमः सजातीय- तद्विकल्पपरम्पराऽनुदयादभ्यस्तविषयव्याप्तिसमयस्मृतिक्रमवन्न संवेद्यत इति। निमित्तनैमित्तिकभावश्चावश्याश्रयणीयः, अन्यथा गौणलाक्षणिकयोर्मुख्याद् भेदः ‘श्रुतिलिङ्गादिप्रमाणषट्कस्य पारदौर्बल्यम्’ इत्यादिप्रक्रियाविघातः, निमित्तता- किन्तु, पर्यालोचन का अभ्यास इतना अधिक हो जाता है कि वहाँ सम्भाव्यमान भी क्रम सजातीय उन (पदार्थविषयक) विकल्पों की परम्परा के उदित न होने से पहले से अभ्यस्त-विषय वाले व्याप्ति और समय (सङ्केत) की स्मृति के क्रमों की भाँति मालूम नहीं होता। और निमित्तनैमित्तिकभाव का अवश्य आश्रयण करना चाहिए। अन्यथा गौण और लाक्षणिक अर्थों का मुख्य अर्थ से भेद (मुख्यामुख्यरूपभेद) एवं (मीमांसा- शास्त्र में उक्त) ‘श्रुति’१ लिङ्ग आदि छः प्रमाणों का क्रमशः दौर्बल्य है’ इत्यादि १. मीमांसाशास्त्र के प्रवर्त्तक आचार्य्य जैमिनि का यह पूरा सूत्र इस प्रकार है—‘श्रुतिलिङ्ग- वाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्’; इस सूत्र को प्रस्तुत ‘लोचन’ में उद्धृत करते हुये आचार्य्य का यह तात्पर्य्य है कि जब ‘दीर्घ-दीर्घ’ रूप से प्रतीत होने वाले अर्थों के क्रम में यदि निमित्त-नैमित्तिकभाव (कार्यकारणभाव) स्वीकार नहीं करते हैं तब उक्त मीमांसा- सूत्र में महर्षि जैमिनि ने श्रुति की अपेक्षा जो लिङ्ग आदि के दौर्बल्य का प्रतिपादन किया है, इस प्रक्रिया का विघात होगा, क्योंकि श्रुतिस्थल की भांति लिङ्ग आदि स्थल में भी शब्दश्रवण के पश्चात् प्रतीयमान सभी अर्थों की अभिधा से ही प्रतीति होने पर लिङ्ग आदि के दौर्बल्य का कारण नहीं रह जाता। इसलिये इस प्रक्रिया का समर्थन एकमात्र—निमित्तता-वैचित्र्य के मानने पर ही हो सकता है। और जब निमित्तता-वैचित्र्य स्वीकार कर लिया गया तो व्यापार का भिन्न होना लाजिमी है। इस प्रकार ‘दीर्घ-दीर्घ’ रूप से प्रतीत होने वाले सभी अर्थों में केवल अभिधा व्यापार से काम नहीं चलेगा, अतिरिक्त व्यापार मानना ही होगा। यहाँ हम स्पष्टीकरण के उद्देश्य से ‘काव्यप्रदीप’ के उल्लेख के आधार पर उक्त मीमांसा-सूत्र का अर्थ-निर्देश करते हैं— श्रुति आदि का समवाय अर्थात् एकत्र प्राप्ति होने पर उनके बीच जिसकी अपेक्षा जो पर (बाद) में होगा उसकी अपेक्षा वह दुर्बल होगा, क्योंकि अर्थविप्रकर्ष है; अर्थात् पूर्व की अपेक्षा पर विलम्ब से अर्थ का प्रत्ययन करता है। श्रुति—‘निरपेक्षो रवः श्रुतिः’, अर्थात् वह शब्द ‘श्रुति’ कहलाता है जो अपने द्वारा किसी के अङ्गत्व-बोध के कार्य में प्रमाणान्तर की अपेक्षा नहीं रखता है। दूसरे प्रकार से यह भी कह सकते हैं कि अपने अर्थ के बोध में अन्य शब्द की अपेक्षा न रखने वाला शब्द ‘श्रुति’ कहलाता है; जैसे ‘व्रीहीनवहन्ति’; क्रिया के फल को प्राप्त करने वाला ही कर्म होता है, इस प्रकार यहाँ ‘व्रीहि’ में कर्मत्व का प्रकार करती हुई द्वितीया विभक्ति किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा के बिना ही व्रीहियों को ‘अवघात’ का शेष (अङ्ग) प्रतिपादन करती है। लिङ्ग—‘अर्थविशेषप्रकाशनसामर्थ्यं लिङ्गम्’; अर्थात् शब्द का वह सामर्थ्य, जिससे अर्थविशेष का प्रकाशन होता है ‘लिङ्ग’ कहलाता है। यह ‘सामर्थ्य’ रूढि ही है। जैसे—‘बर्हिर्देवसदनं दामि’ (देवों के आवास रूप बर्हि-कुश को काटता हूँ) इस मन्त्र का ‘दामि’ (लवन करता हूँ, काटता हूँ) इस श्रुत पद के सामर्थ्य से कुशच्छेदन में विनियोग है। वाक्य—‘परस्पराकांक्षावशात् कचिदेकस्मिन् अर्थे पर्यवसितानि पदानि वाक्यम्’; अर्थात् वह ५ ध्व०
६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् वैचित्रयेणैवास्याः समर्थितत्वात् । निमित्ततावैचित्र्ये चाभ्युपगते किमपरम- स्मास्वसूयया । येऽप्यविभक्तं स्फोटं वाक्यं तदर्थं चाहुः, तैरप्यविद्यापदपतितैः प्रक्रिया का विघात होगा, क्योंकि निमित्तता के वैचित्र्य से इसका समर्थन किया जा चुका है। जब कि निमित्तताप्रयुक्त वैचित्र्य आप मान लेते हैं तो हम पर असूया १
पदसमूह 'वाक्य' है जो परस्पर आकांक्षाके वश किसी एक अर्थ में पर्यवसित होता है । जैसे— 'देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनो बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नये जुष्टं निर्वपामि'; इस मन्त्र का 'निर्वपामि' इस 'लिङ्ग' द्वारा निर्धाप में विनियोग के साथ ही समवेत अर्थभाग की एकवाक्यता के बल से 'देवस्य त्वा०' इत्यादि भाग का भी निर्धाप में ही विनियोग है । प्रकरण—'लब्धवाक्यभावानां पदानां कार्यान्तरापेक्षावशाद् वाक्यान्तरेण सम्बन्ध आकांक्षा- पर्यवसन्नं प्रकरणम्' अर्थात् जब पदसमूह 'वाक्य' की स्थिति में होता है तब दूसरे कार्य की अपेक्षा 'से दूसरे वाक्य के सम्बन्ध में आकांक्षा को 'प्रकरण' कहते हैं। जैसे- 'समिधो यजति' । यह मन्त्र दर्शपूर्णमास यागों के प्रकरण में पढ़ा जाता है। जब यह आकांक्षा उपस्थित होती है कि दर्शपूर्णमास याग कैसे हों तब पाठवश इसका विनियोग होता है। स्थान—'स्थानं क्रमः', अर्थात् अनेक में आम्नात मन्त्र का सन्निधिविशेष में आम्नात रूप क्रम को 'स्थान' कहते हैं। जैसे- 'दब्धिरसि' इस मन्त्र में आग्नेय, अग्नीषोमीय और उपांशु याग क्रम से ब्राह्मण भाग में पढ़े गए हैं। मन्त्रभाग में भी क्रम से तीनों अनुमन्त्रण पठित हैं। आग्नेय और अग्नीषोमीय यागों में लिङ्ग के ही द्वारा दोनों का विनियोग सिद्ध है, किन्तु 'दब्धिरसि' में लिङ्ग आदि कोई विनियोजक नहीं है । किन्तु 'ब्राह्मण' में जिस स्थान पर 'उपांशु' याग का विधान किया है उसी स्थान पर मन्त्र में भी इसका पाठ है, इस 'क्रम' से 'उपांशु याग' के अनुमन्त्रण में इसका विनियोग है । समाख्या - 'योगबलम्'; अर्थात् यौगिक शब्द 'समाख्या' है। जैसे- 'हौत्रम् औद्गात्रम्' इत्यादि । 'होतुर्इदं हौत्रम्' इस 'योग' के बल से हौत्रादि रूप से समाख्यात कर्म होत्रादि द्वारा अनुष्ठेय होते हैं । विरोध के उदाहरण - श्रुति और लिङ्ग के विरोध में लिङ्ग का दौर्बल्य; जैसे- 'कदाचन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे' ( हे इन्द्र तुम कभी भी हिंसक नहीं होते हो, किन्तु आहुति देने वाले यजमान पर प्रसन्न होते हो ); 'अग्निहोत्र' के प्रकरण में यह ऋक् सुनी जाती है। इस ऋक् का विनियोग करने वाली यह 'श्रुति' है- 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते'; अर्थात् इन्द्रसम्बन्धिनी ऋक् के गार्हपत्य नाम के अग्नि का आराधन करता है। इस प्रकार इन्द्रप्रकाशन-सामर्थ्य रूप लिङ्ग से 'गार्हपत्य' की ही 'इन्द्र' के अर्थ में लक्षणा आदि कारक विनियोग होगा। इस प्रकार श्रुति और लिङ्ग में विरोध होने पर श्रुति द्वारा लिङ्ग दुर्बल होने के कारण बाध लिया जायगा, क्योंकि 'गार्हपत्यम्' में द्वितीया विभक्ति अभिधा द्वारा पहले ही इस ऋक् को गार्हपत्य अग्नि के उपस्थान में विनियोग कर देगी । प्रकाशक 'इन्द्र' पद के सामर्थ्य रूप लिङ्ग के द्वारा विलम्ब से इन्द्रोपस्थान में ऋक् का विनियोग सूचित होता है अतः यह पक्ष दुर्बल है। इसी प्रकार अन्य बाध्य और बाधकों का विचार 'काव्य- प्रकाश' के टीका-ग्रन्थों से कर लेना चाहिए। अब रस-प्रसङ्ग को हम अधिक विस्तार के भय से यहाँ ही छोड़ देते हैं ।
१. सर्वथा आप ( मीमांसक ) को भी निमित्ततावैचित्र्य के आधार पर अनेक व्यापारों की कल्पना करनी ही होगी तब मैंने जो ऐसी कल्पना की है उससे आपको असूया क्यों है ? केवल यही न, विवश होकर आपको जिसे स्वीकार करना पड़ता है उसे हमने अपना पक्ष बना लिया है !
प्रथम उद्योतः ६७ लोचनम् सर्वैयमनुसरणीया प्रक्रिया । तदुत्तीर्णत्वे तु सर्वं परमेश्वराद्वयं ब्रह्मेत्यस्मच्छा- स्त्रकारेण न न विदितं तत्त्वालोकग्रन्थं विरचयतेत्यास्ताम् । यत् तु भट्टनायकेनोक्तम्—इह दृप्तसिंहादिपदप्रयोगे च धार्मिकपदप्रयोगे च भयानकरसावेशकृतैव निषेधावगतिः तदीयभीरुवीरत्वप्रकृतिनियमावगममन्त- रेणैकान्ततो निषेधावगत्यभावादिति तन्न केवलार्थसामर्थ्य निषेधावगतेर्निमि- करने से क्या लाभ ? जो लोग¹ वाक्य और उसके अर्थ को अखण्ड, स्फोट रूप कहते हैं वे भी जब अविद्या या व्यवहार में आयेंगे तब उन्हें इस प्रक्रिया का अनुसरण करना होगा । उस (अविद्या या व्यवहार) की स्थिति को पार (उत्तीर्ण) होने के बाद तो सब कुछ परमेश्वराद्वय ब्रह्म हो जाता है, इसे हमारे शास्त्रकार नहीं जानते हैं ? जब कि उन्होंने 'तत्त्वालोक' नामक ग्रन्थ की रचना की है ! अस्तु । जो कि भट्टनायक ने कहा है—यहाँ ('भ्रम धार्मिक०' इस स्थल में) निषेध का ज्ञान दृप्तसिंहादि पद के प्रयोग और 'धार्मिक' पद के प्रयोग में होनेवाले भयानक रस के आवेश² के द्वारा ही होता है, क्योंकि उनकी (धार्मिक और सिंह की, क्रमशः) भीरुता और वीरतारूप प्रकृति के नियम (अविनाभाव) के ज्ञान के बिना एकान्ततः निषेध का ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए केवल अर्थ का सामर्थ्य निषेध के ज्ञान का १. व्याकरण-दर्शन में स्फोट रूप शब्द-ब्रह्म का सिद्धान्त है उसके अनुसार वाक्य और वाक्यार्थ दोनों अखण्ड होते हैं । शब्द अकेले होकर अनर्थक होता है और समस्त अखण्ड वाक्य से अखण्ड अर्थ का बोध होता है । इसी प्रकार वेदान्ती लोग भी अखण्ड वाक्य और वाक्यार्थ को मानते हैं । पद-पदार्थविभाग के बिना किए ही ये लोग 'सत्यं ज्ञानम्' इत्यादि अखण्ड वाक्य को अखण्ड ब्रह्म का वाचक मानते हैं । इस प्रकार इन दोनों सम्प्रदायों के अनुसार अखण्ड वाक्य का अखण्ड वाक्यार्थ बोध सम्पन्न हो जायगा, इतने व्यापारभेद की कल्पना अनावश्यक है यह कहकर प्रस्तुत कार्य का अपलाप नहीं किया जा सकता । आचार्य का कहना है कि हम दोनों मतों को अस्वीकार नहीं करते, बल्कि समर्थन करते हैं, किन्तु जब व्यवहार का प्रसंग है तब तो किसी भी अखण्ड वाक्य को बिना क्रिया-कारक-भेद आदि से खण्ड-खण्ड किए अर्थज्ञान नहीं होगा, यहाँ तक कि वैयाकरण को भी नहीं होगा । तथा दूसरे वेदान्ती भी तो 'अविद्या' की स्थिति या व्यावहारिक दुनियाँ में आकर व्यावहारिक सत्य को स्वीकार करते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें भी पद-पदार्थ की कल्पना अवश्य करनी होगी । हाँ जब वे 'विद्या' की स्थिति की बात करेंगे तब उनका अखण्ड-वाक्य-वाक्यार्थवाद हमें स्वीकार्य होगा, क्योंकि उस स्थिति में एक अद्वैत ब्रह्म को छोड़ कर और कुछ रह ही नहीं जाता यह विषय क्या 'ध्वन्यालोक' के रचयिता आचार्य आनन्दवर्धन को विदित नहीं है ? इस प्रकार व्यवहार-क्षेत्र में वैयाकरण और वेदान्ती दोनों को हमारी सब बातें माननी होंगी । इस विषय का स्पष्टीकरण 'काव्यप्रकाश' के टीका-ग्रन्थों में है । २. भ्रम धार्मिक० में भट्टनायक के कथनानुसार 'दृप्तसिंह' आदि और 'धार्मिक' पद के प्रयोग के होने पर प्रतिपत्ता (बोद्धा) को जो निषेध का ज्ञान होता है वह सर्वथा भयानक रस के आवेश के कारण ही होता है, क्योंकि बिना धार्मिक की भीरुता और सिंह की वीरता के ज्ञान के 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता है । केवल अर्थ के सामर्थ्य से निषेध का ज्ञान नहीं होता है । तात्पर्य यह कि प्रतिपत्ता को भयानक रस की अभिव्यक्ति से प्रस्तुत में निषेध की प्रतीति होती है ।
६८ सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम्
त्तमिति । तत्रोच्यते-केनोक्तमेतत् ‘वक्तृप्रतिपत्तृविशेषावगमविरहेण शब्दगत- ध्वननव्यापारविरहेण च निषेधावगतिः' इति । प्रतिपत्तृप्रतिभासहकारित्वं ह्यस्माभिर्द्योतनस्य प्राणत्वेनोक्तम् । भयानकरसावेशश्च न निवार्यते, तस्य भयमात्रोत्पत्त्यभ्युपगमात् । प्रतिपत्तृश्च रसावेशो रसाभिव्यक्त्यैव । रसश्च व्यङ्ग्य एव, तस्य च शब्दवाच्यत्वं तेनापि नोपगतमिति व्यङ्ग्यत्वमेव । प्रतिपत्तुरपि रसावेशो न नियतः, न ह्यसौ नियमेन भीरुधार्मिकसब्रह्मचारी सहृदयः । अथ तद्विशेषोऽपि सहकारी कल्प्यते, तर्हि वक्तृप्रतिपत्तृप्रतिभाप्राणितो निमित्त नहीं।' इस पर कहते हैं—'यह किसने कहा है कि वक्ता विशेष और प्रतिपत्ता विशेष के बिना जाने और बिना शब्दगत ध्वनन व्यापार के, निषेध का ज्ञान होता है ? प्रतिपत्ता की प्रतिभा की (व्यंग्यार्थविगति में) सहकारिता को तो हमने द्योतन (ध्वनन- व्यापार) का प्राण कहा है । भयानक रस के आवेश का हम निवारण नहीं करते क्योंकि सिर्फ हम उसे भयमात्र की उत्पत्ति के रूप में स्वीकार करते हैं । प्रतिपत्ता को रस का आवेश रस की अभिव्यक्ति से ही होगा । और रस व्यंग्य ही होता है, क्योंकि रस का शब्दवाच्यत्व किसी ने भी नहीं माना है, अतः वह व्यंग्य ही होता है । प्रतिपत्ता को भी नियत रसावेश नहीं होता । क्योंकि वह सहृदय डरपोंक धार्मिक जैसा नियमतः नहीं होता है । यदि उस (प्रतिपत्ता) विशेष को सहकारी कल्पित करते हैं तो वक्ता और इसके खण्डन में लोचनकार का कहना है कि भट्टनायक को समझने में भ्रम हो गया है कि वक्ता और प्रतिपत्ता के वैशिष्ट्य के ज्ञान के बिना और शब्दगत ध्वनन-व्यापार के बिना ही हम 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान करते हैं। बल्कि हम तो यह कहते हैं कि प्रतिपत्ता की प्रतिभा रूप विशेषता द्योतन या व्यञ्जना का प्राण है। दूसरी उपेक्षणीय बात जो भट्टनायक कहते हैं वह यह कि प्रतिपत्ता को भयानक रस का आवेश होता है, अर्थात् सुनने वाला सहृदय भयानकरस से आविष्ट होकर प्रस्तुत पद्य के 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान करता है। यहाँ भयानकरस का आवेश भयमात्र की उत्पत्ति ही हमें स्वीकार्य है। क्योंकि रसावेश रसाभिव्यक्ति ही से रस का आवेश हो सकता है। और रस सर्वथा व्यङ्ग्य ही होता है, शब्द द्वारा वाच्य कदापि नहीं होता है। इसलिए 'दृप्तसिंह' 'आदि और 'धार्मिक' पद के प्रयोग से जो भयानक रस का आवेश भट्टनायक ने कहा है वह उनकी मूलतः गलत धारणा है। यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि धार्मिक के समान प्रतिपत्ता सहृदय नियमतः भीरु नहीं हो सकता है, वह वीरप्रकृति भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में भयानक-रस का आवेश हो यह आवश्यक नहीं है। तब तो आप ऐसे सहृदय के लिए 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान नहीं होना ही बताएँगे ? इसलिए यह स्वीकार करना होगा कि भयानक रस की अभिव्यक्ति से 'निषेध' की प्रतीति नहीं होती। १. ऊपर ध्वनन-व्यापार-खण्डन में भट्टनायक का जो यह मन्तव्य है कि प्रतिपत्ता अर्थात् बोद्धा को भयानकरस के आवेश के कारण ही यहाँ 'निषेध' का ज्ञान होता है, उस पर जो आचार्य अभिनवगुप्त ने यह कहा कि यह कोई नियम नहीं हो सकता कि सहृदय प्रतिपत्ता सर्वथा इस पद्य को सुन कर भयानक रस से आविष्ट होता है; क्योंकि प्रत्येक सहृदय उस 'धार्मिक' के
प्रथम उद्योतः ६९ लोचनम् ध्वननव्यापारः किं न सह्यते । किं च वस्तुध्वनिं दूषयता रसध्वनिस्तदनुग्रा- हकः समर्थ्यत इति सुष्ठुतरां ध्वनिध्वंसोऽयम् । यदाह—'क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः' इति । अथ रसस्यैवेयता प्राधान्यमुक्तम्; तत्को न सहते । अथ वस्तुमात्रध्वनेरेतदुदाहरणं न युक्तमित्युच्यते, तथापि काव्योदाहरणत्वाद् द्वाव- प्यत्र ध्वनी स्तः, को दोषः । यदि तु रसानुवेधेन विना न तुष्यति, तद् भयानकरसानुवेधो नात्र सहृद- यहृदयदर्पणमध्यास्ते; अपि तु उक्तनीत्या सम्भोगाभिलाषविभावसङ्केतस्था- नोचितविशिष्टकाकाद्यनुभावशबलनोदितशृङ्गाररसानुवेधः । रसस्यालौकिकत्वा- प्रतिपत्ता की प्रतिभा से प्राणित ध्वननव्यापार को क्यों नहीं सहन करते ? दूसरे यह कि वस्तुध्वनि को तो दूषित करते हैं, रसध्वनि का, 'जो उस (वस्तुध्वनि) का अनुग्राहक है, समर्थन करते हैं, तो खूब यह ध्वनि का ध्वंस है ! जो कि कहा है— 'देवता का क्रोध भी वर के जैसा होता है।' यदि कहिए कि अब तक रस का ही प्राधान्य कहा है, तो इस बात को कौन नहीं सहन करता है ? यदि वस्तुमात्र ध्वनि का यह उदाहरण ठीक नहीं है, ऐसा कहते हैं तथापि काव्य के उदाहरण होने से दोनों ध्वनि यहाँ हैं तो क्या दोष है ? यदि (सहृदय) विना रसानुवेध (रसावेश) के सन्तुष्ट नहीं होता है, तो (कहना यह है कि) सहृदय के हृदय-दर्पण में भयानक रस का आवेश अधिष्ठित नहीं होता, बल्कि उक्त प्रकार से सम्भोग की अभिलाषा का उद्दीपन-विभाव जो सङ्केत-स्थान है उसके उचित जो विशिष्ट काकु आदि अनुभाव हैं, उनके शबलन (सम्मिश्रण) से शृङ्गाररस का अनुवेध (आवेश) उदित होता है। रस के अलौकिक होने से और उतने मात्र से ही उसका अवगम सम्भव नहीं है, अतएव प्रथम जिनका भेद निर्विवाद समान 'भीरु' नहीं होता है, बल्कि वीरप्रकृति भी होता है। इस पर भट्टनायक के पक्ष का यह कथन है कि यदि प्रतिपत्ता के प्रतिभाविशेष अर्थात् भीरुत्व को यहाँ भयानकरस के आवेश के होने में सहकारी कारण कल्पित कर लिया जाय तो नियम बन सकता है और उस तरह का प्रत्येक प्रतिपत्ता भयानकरस के आवेश से 'निषेध' का ज्ञान कर सकता है। इस पर लोचनकार का कहना है कि जब आपने प्रतिपत्ता के प्रतिभाविशेष तक को स्वीकार कर लिया तब ध्वननव्यापार को क्यों नहीं सह लेते हैं, क्योंकि ध्वनन में भी तो प्रतिपत्ता का प्रतिभाविशेष सहकारी होता है ? आश्चर्य तो इस पर होता है कि वस्तुध्वनि को स्वीकार नहीं करते और रसध्वनि को स्वीकार करते हैं, जब कि सध्वनि वस्तुध्वनि का अनुग्राहक है। यदि आप इस पर अड़े हुए हैं कि यहाँ रसध्वनि का प्राधान्य है तो हम आपकी बात को अमान्य नहीं ठहराते। हमें तो बस यही कहना है कि किसी प्रकार 'ध्वनि' का निराकरण नहीं होना चाहिए। प्रस्तुत में यदि रसध्वनि और वस्तुध्वनि दोनों हों, तो क्या हर्ज है !
७० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् तावन्मात्रादेव चानवगमात्प्रथमं निर्विवादसिद्धविविक्तविधिनिषेधप्रदर्शनाभि- प्रायेण चैतद्वस्तुध्वनेरुदाहरणं दत्तम् । यस्तु ध्वनिव्याख्यानोद्यतस्तात्पर्यशक्तिमेव विवक्षासूचकत्वमेव वा ध्वनन- मवोचत्, स नास्माकं हृदयमावर्जयति । यदाहुः—'भिन्नरुचिर्हि लोकः' इति । तदेतदग्रे यथायथं प्रतनिष्याम इत्यास्तां तावत् । भ्रमेति । अतिसृष्टोऽसि प्राप्तस्ते भ्रमणकालः । धार्मिकेति । कुसुमाद्युपकरणार्थं युक्तं ते भ्रमणम् । विस्रब्ध इति शङ्काकारणवैकल्यात् । स इति यस्ते भयप्रकम्पामङ्गलतिकामकृत । अद्येति । दिष्ट्या वर्धस इत्यर्थः । मारित इति पुनरस्यानुत्थानम् । तेनेति । यः पूर्वं कर्णो- पकर्णिकया त्वयाप्याकर्णितो गोदावरीकच्छगहने प्रतिवसतीति । पूर्वमेव हि तद्रक्षायै तत्तयोपश्रावितोऽसौ; स चाधुना तु दृप्तत्वात्ततो गहनान्निस्सरतीति प्रसिद्धगोदावरीतीरपरिसरानुसरणमपि तावत्कथाशेषीभूतं का कथा तल्लतागहन- प्रवेशशङ्कयेति भावः । सिद्ध है उन विधि और निषेध के प्रदर्शन के अभिप्राय से यह वस्तुध्वनि¹ का उदाहरण दिया है । जिसने ध्वनि का व्याख्यान करने के लिए उद्यत हो, तात्पर्य शक्ति को ही अथवा विवक्षा के सूचकत्व ( अनुमापकत्व ) को ही ध्वनन कहा है, वह हमारे हृदय को आकृष्ट नहीं करता । जैसा कि कहते हैं—'लोग भिन्न रुचि के होते हैं।' तो इसे आगे यथावत् विस्तार करेंगे । घूमो—। तुम अतिसृष्ट हो ( तुम्हारी इच्छा पर है घूमो अथवा न घूमो ), तुम्हारे घूमने का यह समय है । धार्मिक ( बाबाजी )—। फूल आदि सामग्री के लिए तुम्हारा घूमना ठीक है । इतमीनान से—। क्योंकि शङ्का करने का अब कोई कारण नहीं रह गया । वह—। जिसने तुम्हारे अङ्गों को भय से कम्पित कर डाला था । आज—। अर्थात् तुम्हारे भाग्य की वृद्धि है । मार डाला गया—। अब फिर वह नहीं आएगा । उस ( सिंह ने )—। जिसे पहले से तुमने भी कानोंकान सुन रखा है कि गोदावरी के गहन कच्छ में रहता है । पहले से ही उस स्वैरिणी ने सङ्केत स्थान की रक्षा के लिए सिंह के गोदावरी के गहन कच्छ में निवास करने का वृत्तान्त धार्मिक को सुना रखा है । भाव यह कि ( पहले तो कच्छ गहन में रहता मात्र था ) अब तो वह दृप्त ( मत्त, पागल ) हो जाने के कारण गहन से निकल जाता है, इसलिए प्रसिद्ध गोदावरी नदी के तीर की भूमि के आस-पास घूमना भी बिल्कुल बन्द हो गया है ( सिर्फ चर्चा का विषय बन कर रह गया है ) वहाँ के लतागहन में प्रवेश की शङ्का की तो बात ही नहीं । १. सहृदय पर भयानक रस का आवेश तो कतई नहीं माना जा सकता, बल्कि यह कह सकते हैं कि यहाँ शृङ्गार रस का अनुवेध है । परन्तु इसे वस्तुध्वनि का उदाहरण देते हुए आचार्य का अभिप्राय यह है कि पहले निर्विवादसिद्ध विधि-निषेध का प्रदर्शन हो जाय ।
प्रथम उद्योतः ७१ ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्ये प्रतिषेधरूपे विधिरूपो यथा— अत्ता एत्थ णिमज्जइ एत्थ अहं दिअसअं पलोएहि । मा पहिअ रत्तिअन्धअ सेज्जाए मह णिमज्जहिसि ॥ कहीं वाच्य के प्रतिषेधरूप होने पर व्यंग्य विधिरूप; जैसे— सास यहाँ गहरी सोती है, यहाँ मैं (सोती हूँ), दिन में ही देख लो। रात के अन्धे (रतौंधी के रोगी) हे पथिक ! कहीं हमारी खाट पर न गिर पड़ना । लोचनम् अत्ता इति । श्वश्रूरत्र शेते अथवा निमज्जति अत्राहं दिवसकं प्रलोकय । मा पथिक रात्र्यन्ध शय्यायामावयोः शयिष्ठाः ॥ मह इति निपातोऽनेकार्थवृत्तिरत्रावयोरित्यर्थे न तु ममेति । एवं हि विशेष- वचनमेव शङ्काकारि भवेदिति प्रच्छन्नाभ्युपगमो न स्यात् । कांचत्प्रोषित- पतिकां तरुणीमवलोक्य प्रवृद्धमदनाङ्कुरः संपन्नः पान्थोऽनेन निषेधद्वारेण तया- भ्युपगत इति निषेधाभावोऽत्र विधिः । न तु निमन्त्रणरूपोऽप्रवृत्तप्रवर्तनास्व- भावः सौभाग्याभिमानखण्डनाप्रसङ्गात् । अत एव रात्र्यन्धेति समुचितसमय- (प्राकृत गाथा में) 'मह' यह निपात अनेकार्थवृत्ति होने के कारण यहाँ 'हमारी' (अर्थात् मेरी और सास की) इस अर्थ में है न कि 'मेरी' इस अर्थ में। ऐसा करने पर ('मम' यह) विशेष वचन ही श्वश्रू को शङ्कित कर देने वाला^१ हो जायगा, ऐसी स्थिति में नायिका द्वारा किया गया पथिक का प्रच्छन्नाभ्युपगम (छिपे ढंग से साथ सोने की स्वीकृति) नहीं बनेगा। किसी प्रोषित-पतिका (जिसका पति परदेश चला गया है) तरुणी को देखकर कोई पथिक विशेष कामासक्त हो गया, तब इस निषेध के प्रकार से उस तरुणी ने उसे शयन के लिए वचन दिया, इस प्रकार यहाँ निषेधाभावरूप विधि है, न कि अप्रवृत्त में प्रवर्तन स्वभाव का निमन्त्रणरूप^२ (विधि) है; क्योंकि (तब तो) सौभाग्य के अभिमान के खण्डित हो जाने का प्रसंग होगा। इसीलिए 'रात के अन्धे' इसके द्वारा योग्य समय में सम्भावित होने वाले विकारों से उसका आकुलित १. यदि नायिका 'मम' इस विशेष वचन का प्रयोग करेगी तब सुनती हुई उसकी सास को यह शंका हो सकती है यह (बहू) अपनी ही खाट पर पथिक के गिर जाने की बात क्यों करती है?, जब कि रतौंधी वाला पथिक मेरी भी खाट पर गिर सकता है। हो न हो यहाँ दाल में कुछ काला है! २. प्रस्तुत गाथा में प्रतीयमान विधि को निषेध का अभाव रूप समझना चाहिए, क्योंकि नायिका ने 'खाट पर गिर न जाना' इस निषेध के प्रकार से पथिक को मिलन का वचन दिया है। यहाँ आचार्य का निर्देश है कि 'विधि' को निमन्त्रण स्वरूप नहीं समझ लेना चाहिए, अर्थात् नायिका ने यहाँ अप्रवृत्त पथिक को निमन्त्रण के द्वारा प्रवृत्त नहीं किया है, क्योंकि यदि ऐसा माना जायगा तब उसे अपने सौभाग्य का अभिमान क्या रह जायगा। पथिक तो स्वयं नायिका से-
७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् सम्भाव्यमानविकाराकुलितत्वं ध्वनितम् । भावतदभावयोश्च साक्षाद्विरोधाद्वा- च्याद्व्यङ्ग्यस्य स्फुटमेवान्यत्वम् । यत्त्वाह भट्टनायकः-‘अहमित्यभिनयविशेषेणात्मदशावेदनाच्छाब्दमेतदपी’- ति । तत्राहमिति शब्दस्य तावन्नायं साक्षादर्थः; काक्वादिसहायस्य च तावति ध्वननमेव व्यापार इति ध्वनेर्भूषणमेतत् । अत्तेति प्रयत्नेनानिभृतसम्भोगपरि- हारः । अथ यद्यपि भवान्मदनशरासारदीर्यमाणहृदय उपेक्षितुं न युक्तः, तथापि किं करोमि पापो दिवसकोऽयमनुचितत्वात्कुत्सितोऽयमित्यर्थः । प्राकृते पुंनपुंस- कयोरनियमः । न च सर्वथा त्वामुपेक्षे, यतोऽत्रैवाहं तत्प्रलोकय नान्यतोऽहं गच्छामि, तदन्योन्यवदनावलोकनविनोदेन दिनं तावदतिवाहयाव इत्यर्थः । प्रतिपन्नमात्रायां च रात्रावन्धीभूतो मदीयायां शय्यायां मा श्लिक्षः, अपि होना ध्वनित होता है । भाव और अभाव इन दोनों में साक्षात् विरोध होने के कारण वाच्य से व्यंग्य का भिन्नत्व स्पष्ट ही है । जो कि भट्टनायक ने कहा है—( गाथा में प्रयुक्त ) ‘अहं’ ( ‘मैं’ ) इस पद के द्वारा अभिनय विशेष के बल से अपनी दशा के आवेदन करने के कारण यह ( निषेध के द्वारा जो अभ्युपगमन ) भी वह शब्द ( शब्दाभिधेय ) है ।’ इस पर ( कहते हैं कि ) ‘अहं’ ( ‘मैं’ ) इस शब्द का यह ( अभिनय विशेषरूप अभ्युपगमन ) साक्षात् अर्थ नहीं है, बल्कि काकु की सहायता से ऐसा होता है, ऐसी स्थिति में ध्वनन ही व्यापार ( यहाँ ठहरता ) है; यह ध्वनि का भूषण है, दूषण नहीं । ( गाथा में ) ‘अत्ता’ ( ‘श्वश्रू’ ) के प्रयोग द्वारा प्रयत्नपूर्वक सम्भावित अपने अनिभृत ( एकान्त ) सम्भोग का परिहार है । यद्यपि तुम काम के बाणों की वर्षा से फटे हृदय वाले किसी प्रकार उपेक्षणीय नहीं हो तथापि यह पापी दिन सम्भोग के लिए अनुचित होने के कारण बड़ा खराब है—यह अर्थ हुआ । प्राकृत में पुंल्लिङ्ग-नपुंसक का नियम¹ नहीं है । अर्थात् मैं सर्वथा तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर रही हूँ, क्योंकि देखो कहीं अन्यत्र नहीं जाती हूँ, अतः हम एक दूसरे का मुख देखने के विनोद से इस दिन को बितायें । रात के होते ही अन्धे होकर मिलने के लिए प्रवृत्त है, उत्सुक है; इसी कारण ही नायिका ने उसे ‘रात्र्यन्ध’ ( रतौंधी का रोगी या रात का अन्धा ) कह कर उसके सम्भाव्यमान विकारों के कारण आकुलता को सूचित किया है ! अन्यथा नायिका को क्या पड़ी थी कि उसे ‘रात्र्यन्ध’ कहती, जब कि वह किसी प्रकार पहुँचता स्वयं वह मिल ही लेती । किन्तु ऐसी स्थिति ही नहीं है । १. तात्पर्य यह कि कोई भी शब्द, जो पुंल्लिङ्ग है वह नपुंसक भी हो सकता है और जो नपुंसक है वह पुंल्लिङ्ग भी हो सकता है, जैसा कि पुंल्लिङ्ग ‘दिवसक’ शब्द नपुंसक पढ़ा गया है । किन्तु मेरा विचार है कि ‘दिवसकं प्रलोकय’—प्रस्तुत इस स्थल में ‘दिवसकम्’ यह प्रयोग ‘कालाध्वनोर- त्यन्तसंयोगे’ के नियम के अनुसार ‘द्वितीया’ विभक्ति का प्रयोग हुआ है। इसलिए यहां प्राकृत-शब्द के पुंनपुंसकत्व का विचार ही कोई आवश्यक नहीं है । फिर भी, सम्भव है आचार्य का यह कहना ठीक हो ।
प्रथम उद्योतः ७३ ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्ये विधिरूपेऽनुभयरूपो यथा— वच्च मह च्चिअ एक्केइ होन्तु णीसासरोइअव्वाईं । मा तुज्झ वि तीअ विणा दक्खिण्णहअस्स जाअन्तु ॥ कहीं वाच्य के विधिरूप होने पर (व्यङ्ग्य) अनुभय रूप (न विधिरूप तथा न निषेधरूप) होता है। जैसे— तू जा, मुझ ही अकेली के निश्वास और रुदन भाग में हों, उसके बिना दाक्षिण्य (समानुरागिता) से रहित तेरे भी ये (निश्वास, रुदन) मत पैदा हों। लोचनम् तु निभृतनिभृतमेवात्ताभिधाननिकटकण्टकनिद्रान्वेषणपूर्वकमितीयदत्र ध्वन्यते। व्रज ममैवैकस्या भवन्तु निःश्वासरोदितव्यानि । मा तवापि तया विना दाक्षिण्यहतस्य जनिषत ॥ अत्र व्रजेति विधिः । न प्रमादादेव नायिकान्तरसंगमनं तव, अपि तु गाढा- नुरागात्, येनान्यादृङ्मुखरागः गोत्रस्खलनादि च, केवलं पूर्वकृतानुपालना- त्मना दाक्षिण्येनैकरूपत्वाभिमानेनैव त्वमत्र स्थितः, तत्सर्वथा शठोऽसीति गाढमन्युरूपोऽयं खण्डितनायिकाभिप्रायोऽत्र प्रतीयते । न चासौ व्रज्याभाव- रूपो निषेधः, नापि विध्यन्तरमेवान्यनिषेधाभावः । मेरी शय्या पर मत गिर जाओ, बल्कि बहुत कायदे से यह पता कर लो कि 'श्वश्रू' नाम का निकट वाला काँटा नींद में है, यह इतना ध्वनित होता है । यहाँ 'जा' यह विधि है। प्रमादवश ही तू दूसरी नायिका से नहीं मिलता, अपितु गाढ़ अनुरागवश तू (उससे) मिलता है, जिससे यह तेरा मुखराग कुछ भिन्न-सा है और गोत्रस्खलन (दूसरी नायिका का नामोच्चारण) आदि हो रहे हैं। सिर्फ तू यहाँ मेरे पालन का जो पहले वचन कर चुका है उसी दाक्षिण्य के कारण जो एकरूपता का अभिमान तुझे है उसी से तू यहाँ ठहरा है तो तू सर्वथा 'शठ'१ निकला, इस प्रकार यहाँ 'खण्डिता'२ नायिका का अधिक कोपरूप अभिप्राय प्रतीत होता है। न तो यहाँ गमनाभावरूप निषेध है और न तो कोई दूसरा विधि (विध्यन्तर) निषेध का अभाव ही (व्यंग्य होता है)। १. 'शठ' वह नायक कहलाता है जो एक नायिका में बाहर से अनुराग प्रकट करता है और छिपे-छिपे दूसरी से अनुराग करते हुए उसका विप्रिय या अहित करता है—गूढविप्रियकृच्छठः । २. 'खण्डिता' वह नायिका कहलाती है जिसका प्रिय पराई के साथ सम्पन्न मिलन के चिह्न से चिह्नित होकर प्रातःकाल उपस्थित होता है और वह उसे देख कर ईर्ष्या से भर जाती है— पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसम्भोगचिह्नितः । सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्ष्याकषायिता ॥ साहित्यदर्पण ३।११७
७४ | सलोचन-ध्वन्यालोकः
ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्ये प्रतिषेधरूपेऽनुभयरूपो यथा— दे आ पसिअ णिवत्तसु मुहससिजोह्लाविलुत्ततमणिवहे । अहिसारिआणँ विघ्घं करोसि अण्णाणं वि हआसे ॥ कहीं वाच्य के प्रतिषेधरूप होने पर व्यङ्ग्य अनुभयरूप होता है। जैसे— प्रार्थना करता हूँ, प्रसन्न हो, लौट आओ, अरी, अपने मुखचन्द्र की चाँदनी से अन्धकार-समूह को दूर करनेवाली, इन आशाओं वाली, तू दूसरी अभिसारिकाओं के भी विघ्न करती है। लोचनम् दे इति निपातः प्रार्थनायाम् । आ इति तावच्छब्दार्थे । तेनायमर्थः— प्रार्थये तावत्प्रसीद निवर्तस्व मुखशशिज्योत्स्नाविलुप्ततमोनिवहे । अभिसारिकाणां विघ्नं करोष्यन्यासामपि हताशे ॥ अत्र व्यवसिताद्गमनान्निवर्तस्वेति प्रतीतेर्निषेधो वाच्यः । गृहागता नायिका गोत्रस्खलिताद्यपराधिनी नायके सति ततः प्रतिगन्तुं प्रवृत्ता, नायकेन चाटूप- क्रमपूर्वकं निवर्त्यते । न केवलं स्वात्मनो मम च निर्वृतिविघ्नं करोषि, यावद्- न्यासामपि; ततस्तव न कदाचन सुखलवलाभोऽपि भविष्यतीत्यत एव हताशा- सीति वल्लभाभिप्रायरूपश्चाटुविशेषो व्यङ्ग्यः । यदि वा सख्योपदिश्यमानापि तदवधीरण्या गच्छन्ती सख्योच्यते—न केवलमात्मनो विघ्नं करोषि, लाघवादबहुमानास्पदमात्मानं कुर्वती, अत एव हताशा, यावद्वदनचन्द्रिकाप्रकाशितमार्गतयान्यासामप्यभिसारिकाणां विघ्नं ( गाथा में ) 'दे' यह निपात प्रार्थना के अर्थ में है । 'आ' यह निपात 'तावत्' शब्द के अर्थ में है । इसलिए यह अर्थ हुआ— प्रार्थना करता हूँ……। यहाँ व्यवसित गमन से 'लौट आओ' इस प्रतीति के कारण गमन का निषेध वाच्य है । जब नायिका घर आई तब नायक गोत्रस्खलन आदि अपराध कर बैठा और वह (नायिका) लौट जाने के लिए प्रवृत्त हुई, तब नायक प्रशंसा की भाषा का उपक्रम करके उसे निवृत्त करता है । न केवल तू अपने-आपके और मेरे सुख में विघ्न डालती है, बल्कि दूसरी स्त्रियों के भी; इसलिए तुझे कभी भी सुखलेश का लाभ भी नहीं होगा, अतएव तू हताशा है, इस प्रकार नायक का अभिप्राय रूप चाटु विशेष व्यंग्य है । अथवा सखी के द्वारा उपदेश दिए जाने पर भी उसे न मानकर जाती हुई नायिका के प्रति सखी कहती है—न केवल तू अपना विघ्न करती है—इस प्रकार के छुटपन (लघुता) से अपने को अवहुमान का आस्पद बनाती हुई—अतएव हताशा, बल्कि तू अपने मुखचन्द्र की चाँदनी से मार्ग को प्रकाशित करके अन्य अभिसारिकाओं के भी विघ्न करती है, यह सखी का अभिप्रायरूप चाटुविशेष व्यंग्य है । इन दोनों व्याख्यानों में
प्रथम उद्योतः ७५ लोचनम् करोषीति सख्यभिप्रायरूपश्चाटुविशेषो व्यङ्ग्यः । अत्र तु व्याख्यानद्वयेऽपि व्यवसितात्प्रतीपगमनात्प्रियतमगृहगमनाच्च निवर्तस्वेति पुनरपि वाच्य एव विश्रान्तेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यभेदस्य प्रेयोरसवदलङ्कारस्योदाहरणमिदं स्यात्, न ध्वनेः । तेनायमत्र भावः—काचिद्रभसात्प्रियतममभिसरन्ती तद्गृहाभिमुखमाग- च्छता तेनैव हृदयवल्लभेनैवमुपश्लोक्यतेऽप्रत्यभिज्ञानच्छलेन, अत एवात्मप्रत्य- भिज्ञापनार्थमेव नर्मवचनं हताश इति । अन्यासाञ्च विघ्नं करोषि तव चेप्सित- लाभो भविष्यतीति का प्रत्याशा । अत एव मदीयं वा गृहमागच्छ, त्वदीयं वा गच्छावेत्युभयत्रापि तात्पर्यादनुभयरूपो वल्लभाभिप्रायश्चात्वात्मा व्यङ्ग्य इत्यत्येव व्यवतिष्ठते । अन्ये तु—'तटस्थानां सहृदयानामभिसारिकां प्रतीय- मुक्तिः' इत्याहुः । तत्र हताशे इत्यामन्त्रणादि युक्तमयुक्तं वेति सहृदया एव प्रमाणम् । भी (नायिका द्वारा) व्यवसित प्रतीपगमन (अपने घर के प्रति गमन) और प्रियतम के गृह के गमन से 'लौट आओ' (निवृत्त हो) यह जो वाच्य है उसमें ही (सखीगत नायिकाविषयकभावरूप रति अथवा नायकगत नायिकाविषयक रति के) विश्रान्त होने के कारण गुणीभूतव्यंग्य के भेद जो क्रमशः प्रेयोऽलङ्कार और रसवदलङ्कार हैं उनका यह उदाहरण होगा, न कि ध्वनि का। इसलिए' यहाँ यह भाव है—कोई नायिका झटपट प्रियतम के घर के प्रति अभिसार करती है, उसी समय मार्ग में उसके घर की ओर आता हुआ वही प्रियतम अप्रत्यभिज्ञान (नायिका को न पहचानने) के बहाने उसे इस प्रकार प्रशंसा करता है। इसीलिए अपने को पहचानने के लिए ही नर्मवचन 'हताशे' (का प्रयोग) है। दूसरी (अभिसारिकाओं) के विघ्न पहुँचाती है, फिर तेरा ईप्सित लाभ होगा, इसकी क्या प्रत्याशा है ? अतएव 'मेरे घर आ, या हम दोनों तेरे घर चलें' इन दोनों में तात्पर्य होने के कारण अनुभयरूप चाटुगर्भित प्रिय का अभिप्राय व्यंग्य इतने में ही व्यवस्थित होता है। दूसरे तो यह कहते हैं कि यह तटस्थ सहृदयों का अभिसारिका के प्रति वचन है। वहाँ 'हताशे' यह आमन्त्रणादि ठीक है अथवा ठीक नहीं, सहृदयजन ही प्रमाण हैं। १. प्रस्तुत गाथा 'दे आ पसिअ०' को आचार्य ने वक्ता के भेद के आधार पर तीन-चार प्रकार से लगाया है। पहले व्याख्यान के अनुसार नायक के घर पर नायिका पहुँची तब नायक उसके समक्ष गोत्रस्खलन आदि अपराध कर बैठा । इस पर तुनक कर जब वह चल पड़ने के लिए उद्यत हुई तब नायक उसकी प्रशंसा के द्वारा उसे निवृत्त करने का प्रयत्न करने लगा । उसने कहा कि वह अपने और मेरे सुख में तत्काल विघ्न तो कर ही रही है अन्य अभिसारिकाओं के सुख में भी विघ्न डाल रही है। 'अभिसारिका' वह नायिका कहलाती है जो अन्धकार आदि में प्रिय का अभिसरण करती है'। यहाँ नायक का चाटुरूप अभिप्राय व्यङ्ग्य है। दूसरे व्याख्यान के अनुसार यह नायिका की सखी का वचन है, नायिका को सखी ने मना किया कि वह तत्काल अभिसार न करे;
७६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्याद्विभिन्नविषयत्वेन व्यवस्थापितो यथा— कस्स व ण होइ रोसो दट्ठूण पिआएँ सव्वणं अहरम्। सभमरपउमग्घाइणि वारिअवामे सहसु एह्निम्॥ अन्ये चैवंप्रकारा वाच्याद्विभेदिनः प्रतीयमानभेदाः सम्भवन्ति। तेषां दिङ्मात्रमेतत्प्रदर्शितम्। द्वितीयोऽपि प्रभेदो वाच्याद्विभिन्नः सप्रपञ्चमग्रे दर्शयिष्यते। कहीं वाच्य से विभिन्न-विषय रूप में व्यवस्थापित व्यङ्ग्य, जैसे— अथवा प्रिय के व्रणयुक्त अधर को देखकर किसे क्रोध नहीं होता, री, मना करने पर भी भौंरे सहित कमल को सूंघने वाली, अब तू उसका दुष्परिणाम भुगत! वाच्य से भेद रखने वाले प्रतीयमान के दूसरे इस प्रकार के भेद सम्भव हैं। उन्हें दिङ्मात्र यहाँ प्रदर्शित किया है। वाच्य से विभिन्न दूसरा भी प्रभेद आगे प्रपञ्च के साथ दिखायेंगे। लोचनम् एवं वाच्यव्यङ्ग्ययोर्धार्मिकपान्थप्रियतमाभिसारिकाविषयैक्येऽपि स्वरूप- भेदाद्भेद इति प्रतिपादितम्। अधुना तु विषयभेदादपि व्यङ्ग्यस्य वाच्याद्भेद इत्याह—क्वचिद्वाच्यादिति। व्यवस्थापित इति। विषयभेदोऽपि विचित्ररूपो व्यवतिष्ठमानः सहृदयैर्व्यवस्थापयितुं शक्यत इत्यर्थः। कस्य वा न भवति रोषो दृष्ट्वा प्रियायाः सव्रणमधरम्। सभ्रमरपद्माघ्राणशीले वारितवामे सहस्वेदानीम्॥ इस प्रकार (इन निर्दिष्ट उदाहरणों में) धार्मिक, पान्थ, प्रियतम और अभिसारिका के वाच्य और व्यंग्य के एकविषय होने पर भी स्वरूप के भेद से भेद है यह प्रतिपादन किन्तु जब यह नायिका ने नहीं माना तब सखी ने कहा कि हताशा वह अपना विघ्न तो करती ही है साथ ही अपने मुखचन्द्र की चन्द्रिका से मार्ग को प्रकाशित करके अन्य अभिसारिकाओं के भी विघ्न करने के लिए प्रस्तुत है। यहाँ सखी का चाटु रूप अभिप्राय व्यङ्ग्य है। आचार्य के कथनानुसार इन दोनों व्याख्यानों में प्रस्तुत गाथा 'ध्वनि' का उदाहरण न होकर गुणीभूत व्यङ्ग्य का उदाहरण हो जाती है। सखी के वचन के पक्ष में 'प्रेयोऽलङ्कार' है। भाव के पराङ्ग होने पर 'प्रेयोऽलङ्कार' होता है। यहाँ सखी की नायिका में 'रति' व्यङ्ग्य है एवं 'लौट आओ' (निवर्त्तस्व) इस वाच्य के प्रति अङ्ग हो रहा है। इसी प्रकार नायक के वचन के पक्ष में यह रसवदलङ्कार है। क्योंकि रस जब पराङ्ग होता है तब 'रसवदलङ्कार' होता है। यहाँ नायक की नायिकागत रति प्रस्तुत वाच्य के प्रति अङ्ग हो रही है। इसलिए आचार्य ने तृतीय व्याख्यान किया कि नायिका को उस समय अभिसार करते हुए नायक अंधेरे में मार्ग में पाता है जब वह स्वयं नायिका के घर उससे मिलने के लिए जा रहा था। नायिका को पहचान कर भी न पहचानने का बहाना करके नायक ने प्रस्तुत वचन कहा।
प्रथम उद्योतः ७७ लोचनम् कस्य वेति । अनीर्ष्यालोरपि भवति रोषो दृष्ट्वैव; अकृत्वापि कुतश्चिद्देवा- पूर्व्वतया प्रियायाः सव्रणमधरमवलोक्य । सभ्रमरपद्माघ्राणशीले शीलं हि कथंचि- दपि वारयितुं न शक्यम् । वारिते वारणायां, वामे तदनङ्गीकारिणि । सहस्वेदानी- मुपालम्भपरम्परा मित्यर्थः । अत्रायं भावः—काचिद्विनीता कुतश्चित्खण्डिता- धरा निश्चिततत्सविधसंनिधाने तद्भर्त्तरि तमनवलोकमानयेव कयाचिद्विदग्ध- सख्या तद्वाच्यतापरिहारायैवमुच्यते सहस्वेदानीमिति वाच्यमविनयवतीविषयम् । भर्तृविषयं तु-अपराधो नास्तीत्यावेद्यमानं व्यङ्ग्यम् । सहस्वेत्यपि च तद्विषयं व्यङ्ग्यम् । तस्यां च प्रियतमेन गाढमुपालभ्यमानायां तद्व्यलीकशङ्कितप्रातिवे- शिकलोकविषयं चाविनयप्रच्छादनेन प्रत्यायनं व्यङ्ग्यम् । तत्सपत्न्यां च तद्दु- किया गया। अब विषय के भेद से भी व्यंग्य का भेद¹ है, यह कहते हैं—कहीं पर—। व्यवस्थापित—। अर्थात् विषय का भेद भी विचित्ररूप से रहता हुआ सहृदयजनों के द्वारा व्यवस्थापित किया जा सकता है । अथवा प्रिया के व्रणयुक्त······ ईर्ष्या से रहित व्यक्ति के भी क्रोध देखकर ही चढ़ आता है । न करके भी किसी कारण अपूर्व भाव से प्रिया के व्रणयुक्त अधर को देखकर । भौंरे सहित कमल को सूँघने के शील वाली—। शील किसी प्रकार हटाया नहीं जा सकता । वारित में, निवारण में, वामा अर्थात् निवारण को अङ्गीकार न करनेवाली । अब सहन कर ( दुष्परिणाम भुगत )—। अर्थात् उलहनों की परम्परा को सहन कर ( अपने किए का दुष्परिणाम भुगत ) । यहाँ भाव यह है—कोई चालाक ( विदग्ध ) सखी किसी अविनीत नायिका से, जो कहीं से ( जार आदि के द्वारा ) अपना अधर-खण्डित करा चुकी है, उसके पति को निश्चितरूप से सन्निहित जानकर, उसे ( उसके पति को ) न देखती हुई-सी, पति के द्वारा उपालम्भ मिलने के परिहार के लिए ( जिससे कि उसका पति खण्डित-अधर देखकर उसे न डाँटे ) कहती है । 'सहन कर' ( दुष्परिणाम भुगत ) यह वाच्य अविनयवती उस नायिका के प्रति है । पति के प्रति तो—'इसका अपराध नहीं है' यह आवेद्यमान ( निरपराधत्व ) व्यंग्य होता है । प्रियतम के द्वारा अधिक उपालम्भ प्राप्त उस नायिका के होने पर पति का अप्रिय करने से शंकित आस-पास के लोगों के प्रति नायिका के अविनय के प्रच्छादन के द्वारा ( नायिका के निरपराध यहाँ 'निवर्तस्व' वाच्य है, किन्तु नायक का यह तात्पर्य व्यङ्ग्य है कि मेरे घर आ अथवा हम दोनों ही तुम्हारे घर चलें, इस प्रकार यह अनुभय रूप व्यङ्ग्य है । चतुर्थ व्याख्यान के अनुसार यहाँ तटस्थ सहृदयों का किसी अभिसारिका के प्रति वचन है। आचार्य के कथनानुसार इस अंश में 'हुताशे' यह आमन्त्रण आदि ठीक बैठ जाता है या नहीं इसका निर्णय तो सहृदय स्वयं कर सकते हैं ! १. व्यङ्ग्य और वाच्य में विषयभेद और स्वरूपभेद इन दो ही भेदों का दिङ्मात्र प्रदर्शन 'ध्वन्यालोक' में किया गया है। मम्मट आदि अन्य आचार्यों ने और भी कई भेद बतलाए हैं । 'साहित्यदर्पण' में सबका संग्रह एक कारिका में किया गया है—
७८ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् पालम्भतदविनयप्रहृष्टायां सौभाग्यातिशयख्यापनं प्रियाया इति शब्दबलादिति सपत्नीविषयं व्यङ्ग्यम्। सपत्नीमध्ये इयता खलीकृतास्मीति लाघवमात्मनि ग्रहीतुं न युक्तं; प्रत्युतायं बहुमानः, सहस्व शोभस्वेदानीमिति सखीविषयं सौभाग्यप्रख्यापनं व्यङ्ग्यम्। अद्येयं तव प्रच्छन्नानुरागिणी हृदयवल्लभैत्थं रक्षिता, पुनः प्रकटदशनदंशनविधिर्न विधेय इति तच्चौर्यकामुकविषयसम्बोधनं व्यङ्ग्यम्। इत्थं मयैतदपहृतमिति स्ववैदग्ध्यख्यापनं तटस्थविदग्धलोकविषयं व्यङ्ग्यमिति। तदेतदुक्तं व्यवस्थापितशब्देन। अय इति द्वितीयोद्द्योते 'असं- लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः क्रमेणोद्द्योतितः परः' इति विवक्षितान्यपरवाच्यस्य द्वितीय- होने का) बोधन व्यंग्य है। उसकी सपत्नी के प्रति जो उसे उपालम्भ मिलने के कारण और उसके अविनय से प्रसन्न है, 'प्रियाया:' इस शब्द के बल से नायिका के अतिशय सौभाग्य का ख्यापन व्यङ्ग्य है। 'सपत्नियों के बीच इस तरह (अविनय के साफ जाहिर करने से) मैं गौरवहीन कर दी गई हूँ' इस प्रकार का लघुभाव अपने में रखना ठीक नहीं है, बल्कि यह (बहुमान-गौरव) की बात है, 'सहस्व' अर्थात् इस समय शोभित हो, इस प्रकार सखी के प्रति सौभाग्य का प्रख्यापन व्यङ्ग्य है। 'आज तो तुम्हारी इस प्रच्छन्नानुरागिणी हृदयवल्लभा को इस प्रकार बचा लिया, फिर कहीं स्पष्ट रूप से दन्तक्षत नहीं करना' इस प्रकार उस नायिका के चौर्य-कामुक के प्रति सम्बोधन व्यङ्ग्य है। और तटस्थ विदग्ध लोगों के प्रति 'अपना यह वैदग्ध्य-ख्यापन कि मैंने इस प्रकार इसे छिपा लिया' व्यङ्ग्य है। इसीलिए वृत्तिग्रन्थ में 'व्यवस्थापित'¹ कहा है। आगे—। दूसरे 'उद्द्योत' में 'असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यः क्रमेणोद्द्योतितः परः' इस प्रकार बोद्धृस्वरूपसंख्यानिमित्तकार्यप्रतीतिकालानाम् । आश्रयविषयादीनां भेदाद् भिन्नोऽभिधीयते व्यङ्ग्यः ॥ (क) बोद्धृभेद; वाच्य अर्थ को तो पद-पदार्थ की व्युत्पत्ति रखने वाले वैयाकरण आदि भी समझ लेते हैं, किन्तु व्यङ्ग्य को वही समझता है जो सर्वथा 'सहृदय' है ('सहृदय' वैयाकरण आदि भी हो सकते हैं!)। (ख) स्वरूपभेद; वाच्य विधि रूप होता है तो व्यङ्ग्य निषेध रूप आदि। स्वरूपभेद के कई उदाहरण 'ध्वन्यालोक' में दिए गए हैं। (ग) संख्याभेद; यदि वाच्य एक है तो व्यङ्ग्य अनेक भी हो सकते हैं, जैसे 'गतोऽस्तमर्कः' में वाच्य अर्थ एक है और व्यङ्ग्य अर्थ अनेक हैं। (घ) निमित्तभेद; वाच्य अर्थ के ज्ञान के कारण (निमित्त) संकेत-ग्रह आदि हैं किन्तु व्यङ्ग्य अर्थ के बोध के लिए निर्मल प्रतिभा होनी चाहिए, सहृदयता आदि होनी चाहिए। (ङ) कार्यभेद; वाच्य अर्थ केवल प्रतीति को उत्पन्न करता है और व्यङ्ग्य चमत्कार को भी उत्पन्न करता है। (च) कालभेद; वाच्य अर्थ पहले प्रतीत होता है और व्यङ्ग्य अर्थ बाद में। (छ) आश्रयभेद; वाच्य अर्थ शब्द के आश्रित होता है किन्तु व्यङ्ग्य शब्द के एक देश प्रकृति, प्रत्यय, वर्ण, संघटना आदि के भी आश्रित हो सकता है। (ज) विषयभेद; इसका उदाहरण मूल में 'कस्य न वा भवति०' इस गाथा में दिया है, यहाँ वाच्यार्थ-बोध का विषय नायिका है और व्यङ्ग्यार्थ का विषय नायक है। १. प्रस्तुत गाथा में व्यङ्ग्य विषय के भेद से भिन्न रूप में 'व्यवस्थापित' है। 'व्यवस्थापित' कहने का तात्पर्य है कि यहाँ कोई आचार्य के द्वारा अपनी ओर से नहीं जोड़ा गया है, बल्कि ऐसा है
प्रथम उद्योतः ७९
लोचनम्
प्रभेदवर्णनावसरे । यथा हि विधिनिषेधतदनुभयात्मना रूपेण संकलय्य वस्तु- ध्वनिः संक्षेपेण सुवचः, तथा नालङ्कारध्वनिः, अलङ्काराणां भूयस्त्वात् । तत एवोक्तम्-सप्रपञ्चमिति । तृतीयस्त्विति । तुशब्दो व्यतिरेके । वस्त्वलङ्कारावपि शब्दाभिधेयत्व- मध्यासाते तावत् । रसभावतदाभासतत्प्रशमाः पुनर्न कदाचिदभिधीयन्ते, अथ चास्वाद्यमानताप्राणतया भान्ति । तत्र ध्वननव्यापारादृते नास्ति कल्प- नान्तरम् । स्खलद्गतित्वाभावे मुख्यार्थबाधादेर्लक्षणा निवन्धनस्यानाशङ्कनीय- त्वात् । औचित्येन प्रवृत्तौ चित्तवृत्तेरास्वाद्यत्वे स्थायिन्या रसो, व्यभिचारिण्या ‘विवक्षितान्यपरवाच्य’ नामक दूसरे प्रभेद के वर्णन के अवसर में । जिस प्रकार विधि, निषेध और विधिनिषेधानुभय रूप प्रकार के द्वारा सङ्कलित करके वस्तुध्वनि को संक्षेप में कहा जा सकता है, उस प्रकार अलङ्कारध्वनि को नहीं कह सकते, क्योंकि अलङ्कारों की संख्या बहुत है । उसी कारण से कहा—प्रपञ्च के साथ—। तीसरा प्रभेद तो—। ‘तो’ (‘तु’) शब्द व्यतिरेक में प्रयुक्त है। अभिप्राय यह कि वस्तु और अलङ्कार शब्द के द्वारा अभिधेय होते भी हैं, लेकिन रस, भाव, रसाभास, भावा- भास, भावप्रशम कभी-कभी शब्द के द्वारा अभिहित नहीं होते और केवल प्राण रूप में विद्यमान जो उनकी आस्वाद्यमानता है उसी के कारण वे प्रकाशित होते हैं । वहाँ ध्वनन व्यापार को छोड़ कोई दूसरी कल्पना नहीं है । स्खलद्गतित्व के न होने से मुख्यार्थबाध आदि लक्षणा के कारणों की आशङ्का नहीं की जा सकती । औचित्यपूर्वक प्रवृत्ति के होने पर जब चित्तवृत्ति का आस्वाद होता है तब स्थायिनी चित्तवृत्ति से रस, व्यभिचारिणी से भाव, एवं ( स्थायिनी चित्तवृत्ति से ) अनौचित्य-पूर्वक प्रवृत्त होने पर रसाभास
ही । नायिका किसी जार से अपना अधर खण्डित करा कर पहुँची है । यह स्वाभाविक है कि उसका ‘अपराध’ प्रकट हो जायगा और उसका पति उस पर बेहद कुपित होगा । उसकी सखी ने उसे निरपराध सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत ‘वचन’ कहा, जिसका व्यङ्ग्य उसके पति, सुनने वाले आस-पड़ोस के लोग, सौत, स्वयं नायिका, चौर्यकामुक जार एवं तटस्थ विदग्ध जन के प्रति विभिन्न रूप में प्रतीत होता है । नायिका की सखी उसके पति से यह कहना चाहती है कि इसका कोई अपराध नहीं है, अन्यथा समझ कर कहीं क्रोध मत कर बैठना । आस-पड़ोस के लोगों से उसके इस कथन का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि यदि इसका पति इसे उपालम्भ भी दे तो भी इसका अविनय नहीं समझना चाहिए । सपत्नी, जो नायिका के उपालम्भ और अविनय से प्रसन्न है, के प्रति ‘प्रियायाः’ इस शब्द के बल से नायिका का सौभाग्यातिशय ख्यापन व्यङ्ग्य है । नायिका के प्रति व्यङ्ग्य है कि यह न समझना कि सपत्नियों के बीच वह इस तरह हल्की कर दी गई ही है बल्कि ‘सहस्व’ का दूसरा अर्थ यह है कि अब उनके बीच शोभा को प्राप्त कर । ‘प्राकृत’ में ‘सहसु’ का दूसरा रूप ‘शोभस्व’ भी हो सकता है । चौर्यकामुक के प्रति व्यङ्ग्य यह प्रतीत होता है कि आज तो किसी प्रकार प्रसन्नानुरागिणी तेरी इस प्रियतमा की रक्षा मैंने कर दी, अब फिर कहीं स्पष्ट रूप से इसका अधर मत काट देना । तटस्थ सहृदय लोगों के प्रति इस नायिका-सखी का व्यङ्ग्य प्रतीत होता है कि मैंने सफेद झूठ बोल कर किस प्रकार जाहिर बात को छिपा दिया !
८० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् भावः, अनौचित्येन तदाभासः, रावणस्येव सीतायां रतेः । यद्यपि तत्र हास्यरसरूपतैव, 'शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यः' इति वचनात् । तथापि पाश्चात्त्येयं सामाजिकानां स्थितिः, तन्मयीभवनदशायां तु रतेरेवास्वाद्यतेति शृङ्गारतैव भाति पौर्वापर्यविवेकावधारणेन 'दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि याते श्रुतिम्' इत्यादौ । तदसौ शृङ्गाराभास एव । तदङ्गं भावाभासश्चित्तवृत्तेः प्रशम एव प्रक्रान्ताया हृदयमाह्लादयति यतो विशेषेण, तत एव तत्संगृहीतोऽपि पृथग्गणितोऽसौ । यथा— एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो- रन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम् । दंपत्योः शनकैरपाङ्गवलनामिश्रीभवच्चक्षुषो- र्भग्नो मानकलिः सहासरभसव्यावृत्तकण्ठग्रहम् ॥ इत्यत्रेष्र्यारोषात्मनो मानस्य प्रशमः । न चायं रसादिरर्थः 'पुत्रस्ते जातः' इत्यतो यथा हर्षो जायते तथा । नापि लक्षणया । अपि तु सहृदयस्य हृदय- होता है, जैसे रावण की सीता में रति से । यद्यपि वहाँ 'हास्यरस' का ही ढंग है, जैसा कि वचन है—'शृङ्गार से हास्य होता है'; तथापि यह सामाजिकों की पाश्चात्य (अन्त में होने वाली) स्थिति है । तन्मय होने की स्थिति में तो रति का ही आस्वाद होता रहता है, इस प्रकार शृङ्गारता ही भासित होती है, पौर्वापर्य (क्रम) के विवेक के अभाव के कारण—जैसे 'दूर ही से आकर्षण करनेवाले मोहमन्त्र के समान उसके नाम के कर्णगोचर होने पर०' इत्यादि में । तो यह शृङ्गाराभास ही$^१$ है । उस (शृङ्गार आदि रसाभास का) अङ्ग जो भावाभास है, चित्तवृत्ति जब प्रशम की अवस्था में प्रक्रान्त होती है तभी विशेष रूप से हृदय को आह्लादित करता है, इसी लिए 'भाव' शब्द से वह संगृहीत हुआ भी अलग से गणित है । जैसे— 'एक ही सेज पर एक दूससे से मुँह फेर लेने के कारण निद्रा के समाप्त हो जाने के बाद सन्तप्त होते हुए, परस्पर एक दूसरे के प्रति अनुनय उनके हृदय में मौजूद था, तब भी गौरव की रक्षा करते हुए पति और पत्नी के नेत्र जब धीरे से अपाङ्ग की ओर झुकने के कारण मिल गए, तभी उनका प्रणय-रोष भग्न हो गया और वे हँस कर वेग- पूर्वक एक दूसरे का कण्ठग्रह कर पड़े ।' यहाँ ईर्ष्या-रोष रूप मान का प्रशम है । यह रसादि अर्थ 'तुम्हें लड़का हुआ है' इस वाक्य के श्रवण से जैसे हर्ष होता है, उस प्रकार नहीं है । और न लक्षणा से (वह प्रकाशित होता है) । अपितु, सहृदय जनों के हृदय के संवाद के बल से १. क्योंकि रावण की सीताविषयक रति जब सहृदयों की रति से तन्मयीभाव प्राप्त करेगी तब शृङ्गार की चर्वणा होगी । तत्पश्चात् उन्हें यह मालूम होगा कि यह रति अनुचित आलम्बन में हो रही है । तभी हास का उद्बोध होगा, तभी शृङ्गार की चर्वणा शृङ्गाराभास-चर्वणा का रूप ले लेगी ।
प्रथम उद्योतः ८१ ध्वन्यालोकः तृतीयस्तु रसादिलक्षणः प्रभेदो वाच्यसामर्थ्याक्षिप्तः प्रकाशते, न तु साक्षाच्छब्दव्यापारविषय इति वाच्याद्विभिन्न एव । तथा हि वाच्यत्वं तस्य स्वशब्दनिवेदितत्वेन वा स्यात् । विभावादिप्रतिपादनमुखेन वा । पूर्वस्मिन् पक्षे स्वशब्दनिवेदितत्वाभावे रसादीनामप्रतीतिप्रसङ्गः । रसाद्रिरूप तीसरा प्रभेद तो वाच्य की सामर्थ्य से आक्षिप्त हो प्रकाशित होता है, न कि वह साक्षात् शब्द-व्यापार का विषय होता है, इसलिए वह भी वाच्य विभिन्न ही है । जैसा कि उसका वाच्यत्व अपने शब्दों से निवेदित होने के रूप से अथवा विभाव आदि के प्रतिपादन के द्वारा हो सकता है । पहले पक्ष में यदि अपने शब्द (रस अथवा शृङ्गार आदि नामों) के द्वारा निवेदित न होने पर रसादिकों की अप्रतीति का प्रसङ्ग होगा । लोचनम् संवादबलाद्विभावानुभावप्रतीतौ तन्मयीभावेनास्वाद्यमान एव रस्यमानतैकप्राणः सिद्धस्वभावसुखादिविलक्षणः परिस्फुरति । तदाह—प्रकाशत इति । तेन तत्र शब्दस्य ध्वननमेव व्यापारोऽर्थसहकृतस्येति । विभावाद्यर्थोऽपि न पुत्रजन्म- हर्षन्यायेन तां चित्तवृत्तिं जनयतीति जननातिरिक्तोऽर्थस्यापि व्यापारो ध्वनन- मेवोच्यते । स्वशब्देति । शृङ्गारादिना शब्देनाभिधाव्यापारवशादेव निवेदित- त्वेन । विभावादीति । तात्पर्यशक्त्येत्यर्थः । विभाव-अनुभाव की प्रतीति होने पर तन्मयीभाव के प्रकार से आस्वादित होता हुआ ही, सर्वथा रस्यमान रूप, सिद्ध स्वभाव वाला एवं सुखादिकों से विलक्षण (वह रसादि अर्थ) परिस्फुरित१ होता है । उसे कहा है—प्रकाशित होता है— । इससे वहाँ अर्थ-सहकृत शब्द का ध्वनन ही व्यापार है । पुत्रजन्म से हुए हर्ष के समान विभावादि अर्थ भी उस चित्तवृत्ति को उत्पन्न नहीं करता, इस लिए 'जनन' से अतिरिक्त अर्थ का भी व्यापार 'ध्वनन' ही कहा जाता है । अपना शब्द— । 'शृङ्गार' आदि शब्द द्वारा अभिधा व्यापार के वश निवेदित होने के कारण । विभाव आदि— । अर्थात् तात्पर्य-शक्ति के द्वारा । १. रसादि अर्थ उत्पन्न नहीं होता हैं बल्कि प्रकाशित होता है। सहृदय के हृदय में स्थित रत्यादि स्थायीभाव ही रस रूप में परिणत हो जाते हैं। स्थायीभावों की रस रूप में परिणति के पूर्व सहृदय के हृदय का संवाद द्वारा जब विभाव आदि की प्रतीति हो जाती है तब तन्मयीभाव होता है, ऐसी स्थिति में रस आस्वाद्यमान होने लगता है, यह सुखादि से विलक्षण आत्मिक आनन्दानुभूति है । उसके रहने पर कार्य हो, यह 'अन्वय' है (दे० पृ० ८२) और उसके अभाव में कार्य न हो यह 'व्यतिरेक' है—'तत्सत्त्वे कार्यसत्त्वमन्वयः, तदभावे कार्याभावो व्यतिरेकः।' प्रस्तुत में आचार्य आनन्दवर्धन ने स्वशब्द के अन्वयव्यतिरेक का निराकरण किया है अर्थात् 'शृङ्गार' आदि शब्द के रहने पर रसादि की प्रतीति नहीं होती है और उसके अभाव में भी रसादि की प्रतीति हो जाती है । किन्तु जहाँ ध्वनन व्यापार होता है वहीं रसादि की प्रतीति होती है । ६ ध्व०
८२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः न च सर्वत्र तेषां स्वशब्दनिवेदितत्वम् । यत्राप्यस्ति तत्, तत्रापि विशिष्टविभावादिप्रतिपादनमुखेनैवैषां प्रतीतिः । स्वशब्देन सा केवलमनूद्यते, न तु तत्कृता विषयान्तरे तथा तस्या अदर्शनात् । किन्तु सर्वत्र उन (रसादिकों) का अपने शब्दों द्वारा निवेदितत्व नहीं। जहाँ कहीं भी वह है, वहाँ भी विशेष प्रकार से विभाव आदि के प्रतिपादन के द्वारा ही उनकी प्रतीति है । अपने शब्द से वह प्रतीति केवल अनूदित हो जाती है, उस (शब्द के बदौलत) कृत नहीं होती । क्योंकि विषयान्तर में उस प्रकार उसे नहीं देखते । लोचनम् तत्र स्वशब्दस्यान्वयव्यतिरेकौ रस्यमानतासारं रसं प्रति निराकुर्वन्ध्वन- नस्यैव ताविति दर्शयति-न च सर्वत्रेति । यथा भट्ठेन्दुराजस्य- यद्विश्रम्य विलोकितेषु बहुशो निःस्थेमनी लोचने यद्गात्राणि दरिद्रति प्रतिदिनं लूनाब्जिनीनालवत् । दूर्वाकाण्डविडम्बकश्च निबिडो यत्पाण्डिमा गण्डयोः कृष्णे यूनि सयौवनासु वनितास्वेषैव वेषस्थितिः ॥ इत्यत्रानुभावविभावावबोधनोत्तरमेव तन्मयीभवनयुक्त्या तद्विभावानुभावो- चितचित्तवृत्तिवासनानुरञ्जितस्वसंविदानन्दचर्वणागोचरोऽर्थो रसात्मा स्फुरत्ये- वाभिलाषचिन्तौत्सुक्यनिद्राधृतिग्लान्यालस्यश्रमस्मृतिवितर्कादिशब्दाभावेऽपि । एवं व्यतिरेकाभावं प्रदर्श्यान्वयाभावं दर्शयति-यत्रापीति । तदिति । स्वश- ब्दनिवेदितत्वम् । प्रतिपादनमुखेनेति । शब्दप्रयुक्त्या विभावादिप्रतिपत्त्येत्यर्थः । वहाँ स्वशब्द (शृङ्गार आदि शब्द) के अन्वयव्यतिरेक को रस्यमानताप्राण रूप रस के प्रति, निराकरण करते हुए वे दोनों (अन्वय और व्यतिरेक) हैं यह दिखाते हैं- सर्वत्र वे शब्द द्वारा निवेदित नहीं होते हैं- । जैसे भट्ट इन्दुराज का- 'जो कि रुक-रुक कर विलोकनों में बहुत वार आँखें स्थैर्यरहित हो जाती हैं, जो कि अङ्ग-अङ्ग कटे हुए कमलिनी के नाल की भांति प्रतिदिन सूखते जा रहे हैं, जो कि गालों पर दूर्वाकाण्ड का अनुकरण करने वाला घना पीलापन छाया हुआ है, युवक कृष्ण के प्रति युवतियों की यही वेषरचना है।' यहाँ अनुभाव-विभाव के बोधन के बाद ही तन्मयीभाव की युक्ति से उस विभाव- अनुभाव के अनुरूप वासना रूप चित्तवृत्ति से अनुरञ्जित स्वसंविदानन्द की चर्वणा का गोचर रस रूप अर्थ अभिलाष, चिन्ता, औत्सुक्य, निद्रा, धृति, ग्लानि, आलस्य, श्रम, स्मृति, वितर्क आदि शब्द के अभाव में भी स्फुरित होता ही है। इस प्रकार व्यतिरेक का अभाव दिखाकर अन्वय का अभाव दिखाते हैं-जहाँ भी- । वह- । अर्थात् स्वशब्द द्वारा निवेदितत्व । प्रतिपादन के जरिए- । अर्थात् शब्द से प्रयुक्त विभाव की प्रतिपत्ति के द्वारा ।