भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 680 में से

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पृष्ठ 140

८० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् भावः, अनौचित्येन तदाभासः, रावणस्येव सीतायां रतेः । यद्यपि तत्र हास्यरसरूपतैव, 'शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यः' इति वचनात् । तथापि पाश्चात्त्येयं सामाजिकानां स्थितिः, तन्मयीभवनदशायां तु रतेरेवास्वाद्यतेति शृङ्गारतैव भाति पौर्वापर्यविवेकावधारणेन 'दूराकर्षणमोहमन्त्र इव मे तन्नाम्नि याते श्रुतिम्' इत्यादौ । तदसौ शृङ्गाराभास एव । तदङ्गं भावाभासश्चित्तवृत्तेः प्रशम एव प्रक्रान्ताया हृदयमाह्लादयति यतो विशेषेण, तत एव तत्संगृहीतोऽपि पृथग्गणितोऽसौ । यथा— एकस्मिन् शयने पराङ्मुखतया वीतोत्तरं ताम्यतो- रन्योन्यस्य हृदि स्थितेऽप्यनुनये संरक्षतोगौरवम् । दंपत्योः शनकैरपाङ्गवलनामिश्रीभवच्चक्षुषो- र्भग्नो मानकलिः सहासरभसव्यावृत्तकण्ठग्रहम् ॥ इत्यत्रेष्र्यारोषात्मनो मानस्य प्रशमः । न चायं रसादिरर्थः 'पुत्रस्ते जातः' इत्यतो यथा हर्षो जायते तथा । नापि लक्षणया । अपि तु सहृदयस्य हृदय- होता है, जैसे रावण की सीता में रति से । यद्यपि वहाँ 'हास्यरस' का ही ढंग है, जैसा कि वचन है—'शृङ्गार से हास्य होता है'; तथापि यह सामाजिकों की पाश्चात्य (अन्त में होने वाली) स्थिति है । तन्मय होने की स्थिति में तो रति का ही आस्वाद होता रहता है, इस प्रकार शृङ्गारता ही भासित होती है, पौर्वापर्य (क्रम) के विवेक के अभाव के कारण—जैसे 'दूर ही से आकर्षण करनेवाले मोहमन्त्र के समान उसके नाम के कर्णगोचर होने पर०' इत्यादि में । तो यह शृङ्गाराभास ही$^१$ है । उस (शृङ्गार आदि रसाभास का) अङ्ग जो भावाभास है, चित्तवृत्ति जब प्रशम की अवस्था में प्रक्रान्त होती है तभी विशेष रूप से हृदय को आह्लादित करता है, इसी लिए 'भाव' शब्द से वह संगृहीत हुआ भी अलग से गणित है । जैसे— 'एक ही सेज पर एक दूससे से मुँह फेर लेने के कारण निद्रा के समाप्त हो जाने के बाद सन्तप्त होते हुए, परस्पर एक दूसरे के प्रति अनुनय उनके हृदय में मौजूद था, तब भी गौरव की रक्षा करते हुए पति और पत्नी के नेत्र जब धीरे से अपाङ्ग की ओर झुकने के कारण मिल गए, तभी उनका प्रणय-रोष भग्न हो गया और वे हँस कर वेग- पूर्वक एक दूसरे का कण्ठग्रह कर पड़े ।' यहाँ ईर्ष्या-रोष रूप मान का प्रशम है । यह रसादि अर्थ 'तुम्हें लड़का हुआ है' इस वाक्य के श्रवण से जैसे हर्ष होता है, उस प्रकार नहीं है । और न लक्षणा से (वह प्रकाशित होता है) । अपितु, सहृदय जनों के हृदय के संवाद के बल से १. क्योंकि रावण की सीताविषयक रति जब सहृदयों की रति से तन्मयीभाव प्राप्त करेगी तब शृङ्गार की चर्वणा होगी । तत्पश्चात् उन्हें यह मालूम होगा कि यह रति अनुचित आलम्बन में हो रही है । तभी हास का उद्बोध होगा, तभी शृङ्गार की चर्वणा शृङ्गाराभास-चर्वणा का रूप ले लेगी ।