भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

प्रथम उद्योतः ७९

लोचनम्

प्रभेदवर्णनावसरे । यथा हि विधिनिषेधतदनुभयात्मना रूपेण संकलय्य वस्तु- ध्वनिः संक्षेपेण सुवचः, तथा नालङ्कारध्वनिः, अलङ्काराणां भूयस्त्वात् । तत एवोक्तम्-सप्रपञ्चमिति । तृतीयस्त्विति । तुशब्दो व्यतिरेके । वस्त्वलङ्कारावपि शब्दाभिधेयत्व- मध्यासाते तावत् । रसभावतदाभासतत्प्रशमाः पुनर्न कदाचिदभिधीयन्ते, अथ चास्वाद्यमानताप्राणतया भान्ति । तत्र ध्वननव्यापारादृते नास्ति कल्प- नान्तरम् । स्खलद्गतित्वाभावे मुख्यार्थबाधादेर्लक्षणा निवन्धनस्यानाशङ्कनीय- त्वात् । औचित्येन प्रवृत्तौ चित्तवृत्तेरास्वाद्यत्वे स्थायिन्या रसो, व्यभिचारिण्या ‘विवक्षितान्यपरवाच्य’ नामक दूसरे प्रभेद के वर्णन के अवसर में । जिस प्रकार विधि, निषेध और विधिनिषेधानुभय रूप प्रकार के द्वारा सङ्कलित करके वस्तुध्वनि को संक्षेप में कहा जा सकता है, उस प्रकार अलङ्कारध्वनि को नहीं कह सकते, क्योंकि अलङ्कारों की संख्या बहुत है । उसी कारण से कहा—प्रपञ्च के साथ—। तीसरा प्रभेद तो—। ‘तो’ (‘तु’) शब्द व्यतिरेक में प्रयुक्त है। अभिप्राय यह कि वस्तु और अलङ्कार शब्द के द्वारा अभिधेय होते भी हैं, लेकिन रस, भाव, रसाभास, भावा- भास, भावप्रशम कभी-कभी शब्द के द्वारा अभिहित नहीं होते और केवल प्राण रूप में विद्यमान जो उनकी आस्वाद्यमानता है उसी के कारण वे प्रकाशित होते हैं । वहाँ ध्वनन व्यापार को छोड़ कोई दूसरी कल्पना नहीं है । स्खलद्गतित्व के न होने से मुख्यार्थबाध आदि लक्षणा के कारणों की आशङ्का नहीं की जा सकती । औचित्यपूर्वक प्रवृत्ति के होने पर जब चित्तवृत्ति का आस्वाद होता है तब स्थायिनी चित्तवृत्ति से रस, व्यभिचारिणी से भाव, एवं ( स्थायिनी चित्तवृत्ति से ) अनौचित्य-पूर्वक प्रवृत्त होने पर रसाभास


ही । नायिका किसी जार से अपना अधर खण्डित करा कर पहुँची है । यह स्वाभाविक है कि उसका ‘अपराध’ प्रकट हो जायगा और उसका पति उस पर बेहद कुपित होगा । उसकी सखी ने उसे निरपराध सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत ‘वचन’ कहा, जिसका व्यङ्ग्य उसके पति, सुनने वाले आस-पड़ोस के लोग, सौत, स्वयं नायिका, चौर्यकामुक जार एवं तटस्थ विदग्ध जन के प्रति विभिन्न रूप में प्रतीत होता है । नायिका की सखी उसके पति से यह कहना चाहती है कि इसका कोई अपराध नहीं है, अन्यथा समझ कर कहीं क्रोध मत कर बैठना । आस-पड़ोस के लोगों से उसके इस कथन का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि यदि इसका पति इसे उपालम्भ भी दे तो भी इसका अविनय नहीं समझना चाहिए । सपत्नी, जो नायिका के उपालम्भ और अविनय से प्रसन्न है, के प्रति ‘प्रियायाः’ इस शब्द के बल से नायिका का सौभाग्यातिशय ख्यापन व्यङ्ग्य है । नायिका के प्रति व्यङ्ग्य है कि यह न समझना कि सपत्नियों के बीच वह इस तरह हल्की कर दी गई ही है बल्कि ‘सहस्व’ का दूसरा अर्थ यह है कि अब उनके बीच शोभा को प्राप्त कर । ‘प्राकृत’ में ‘सहसु’ का दूसरा रूप ‘शोभस्व’ भी हो सकता है । चौर्यकामुक के प्रति व्यङ्ग्य यह प्रतीत होता है कि आज तो किसी प्रकार प्रसन्नानुरागिणी तेरी इस प्रियतमा की रक्षा मैंने कर दी, अब फिर कहीं स्पष्ट रूप से इसका अधर मत काट देना । तटस्थ सहृदय लोगों के प्रति इस नायिका-सखी का व्यङ्ग्य प्रतीत होता है कि मैंने सफेद झूठ बोल कर किस प्रकार जाहिर बात को छिपा दिया !