ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः ६५ लोचनम् किं तु सातिशायानुशीलनाभ्यासात्तत्र सम्भाव्यमानोऽपि क्रमः सजातीय- तद्विकल्पपरम्पराऽनुदयादभ्यस्तविषयव्याप्तिसमयस्मृतिक्रमवन्न संवेद्यत इति। निमित्तनैमित्तिकभावश्चावश्याश्रयणीयः, अन्यथा गौणलाक्षणिकयोर्मुख्याद् भेदः ‘श्रुतिलिङ्गादिप्रमाणषट्कस्य पारदौर्बल्यम्’ इत्यादिप्रक्रियाविघातः, निमित्तता- किन्तु, पर्यालोचन का अभ्यास इतना अधिक हो जाता है कि वहाँ सम्भाव्यमान भी क्रम सजातीय उन (पदार्थविषयक) विकल्पों की परम्परा के उदित न होने से पहले से अभ्यस्त-विषय वाले व्याप्ति और समय (सङ्केत) की स्मृति के क्रमों की भाँति मालूम नहीं होता। और निमित्तनैमित्तिकभाव का अवश्य आश्रयण करना चाहिए। अन्यथा गौण और लाक्षणिक अर्थों का मुख्य अर्थ से भेद (मुख्यामुख्यरूपभेद) एवं (मीमांसा- शास्त्र में उक्त) ‘श्रुति’१ लिङ्ग आदि छः प्रमाणों का क्रमशः दौर्बल्य है’ इत्यादि १. मीमांसाशास्त्र के प्रवर्त्तक आचार्य्य जैमिनि का यह पूरा सूत्र इस प्रकार है—‘श्रुतिलिङ्ग- वाक्यप्रकरणस्थानसमाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्’; इस सूत्र को प्रस्तुत ‘लोचन’ में उद्धृत करते हुये आचार्य्य का यह तात्पर्य्य है कि जब ‘दीर्घ-दीर्घ’ रूप से प्रतीत होने वाले अर्थों के क्रम में यदि निमित्त-नैमित्तिकभाव (कार्यकारणभाव) स्वीकार नहीं करते हैं तब उक्त मीमांसा- सूत्र में महर्षि जैमिनि ने श्रुति की अपेक्षा जो लिङ्ग आदि के दौर्बल्य का प्रतिपादन किया है, इस प्रक्रिया का विघात होगा, क्योंकि श्रुतिस्थल की भांति लिङ्ग आदि स्थल में भी शब्दश्रवण के पश्चात् प्रतीयमान सभी अर्थों की अभिधा से ही प्रतीति होने पर लिङ्ग आदि के दौर्बल्य का कारण नहीं रह जाता। इसलिये इस प्रक्रिया का समर्थन एकमात्र—निमित्तता-वैचित्र्य के मानने पर ही हो सकता है। और जब निमित्तता-वैचित्र्य स्वीकार कर लिया गया तो व्यापार का भिन्न होना लाजिमी है। इस प्रकार ‘दीर्घ-दीर्घ’ रूप से प्रतीत होने वाले सभी अर्थों में केवल अभिधा व्यापार से काम नहीं चलेगा, अतिरिक्त व्यापार मानना ही होगा। यहाँ हम स्पष्टीकरण के उद्देश्य से ‘काव्यप्रदीप’ के उल्लेख के आधार पर उक्त मीमांसा-सूत्र का अर्थ-निर्देश करते हैं— श्रुति आदि का समवाय अर्थात् एकत्र प्राप्ति होने पर उनके बीच जिसकी अपेक्षा जो पर (बाद) में होगा उसकी अपेक्षा वह दुर्बल होगा, क्योंकि अर्थविप्रकर्ष है; अर्थात् पूर्व की अपेक्षा पर विलम्ब से अर्थ का प्रत्ययन करता है। श्रुति—‘निरपेक्षो रवः श्रुतिः’, अर्थात् वह शब्द ‘श्रुति’ कहलाता है जो अपने द्वारा किसी के अङ्गत्व-बोध के कार्य में प्रमाणान्तर की अपेक्षा नहीं रखता है। दूसरे प्रकार से यह भी कह सकते हैं कि अपने अर्थ के बोध में अन्य शब्द की अपेक्षा न रखने वाला शब्द ‘श्रुति’ कहलाता है; जैसे ‘व्रीहीनवहन्ति’; क्रिया के फल को प्राप्त करने वाला ही कर्म होता है, इस प्रकार यहाँ ‘व्रीहि’ में कर्मत्व का प्रकार करती हुई द्वितीया विभक्ति किसी अन्य प्रमाण की अपेक्षा के बिना ही व्रीहियों को ‘अवघात’ का शेष (अङ्ग) प्रतिपादन करती है। लिङ्ग—‘अर्थविशेषप्रकाशनसामर्थ्यं लिङ्गम्’; अर्थात् शब्द का वह सामर्थ्य, जिससे अर्थविशेष का प्रकाशन होता है ‘लिङ्ग’ कहलाता है। यह ‘सामर्थ्य’ रूढि ही है। जैसे—‘बर्हिर्देवसदनं दामि’ (देवों के आवास रूप बर्हि-कुश को काटता हूँ) इस मन्त्र का ‘दामि’ (लवन करता हूँ, काटता हूँ) इस श्रुत पद के सामर्थ्य से कुशच्छेदन में विनियोग है। वाक्य—‘परस्पराकांक्षावशात् कचिदेकस्मिन् अर्थे पर्यवसितानि पदानि वाक्यम्’; अर्थात् वह ५ ध्व०