ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् वैचित्रयेणैवास्याः समर्थितत्वात् । निमित्ततावैचित्र्ये चाभ्युपगते किमपरम- स्मास्वसूयया । येऽप्यविभक्तं स्फोटं वाक्यं तदर्थं चाहुः, तैरप्यविद्यापदपतितैः प्रक्रिया का विघात होगा, क्योंकि निमित्तता के वैचित्र्य से इसका समर्थन किया जा चुका है। जब कि निमित्तताप्रयुक्त वैचित्र्य आप मान लेते हैं तो हम पर असूया १
पदसमूह 'वाक्य' है जो परस्पर आकांक्षाके वश किसी एक अर्थ में पर्यवसित होता है । जैसे— 'देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनो बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नये जुष्टं निर्वपामि'; इस मन्त्र का 'निर्वपामि' इस 'लिङ्ग' द्वारा निर्धाप में विनियोग के साथ ही समवेत अर्थभाग की एकवाक्यता के बल से 'देवस्य त्वा०' इत्यादि भाग का भी निर्धाप में ही विनियोग है । प्रकरण—'लब्धवाक्यभावानां पदानां कार्यान्तरापेक्षावशाद् वाक्यान्तरेण सम्बन्ध आकांक्षा- पर्यवसन्नं प्रकरणम्' अर्थात् जब पदसमूह 'वाक्य' की स्थिति में होता है तब दूसरे कार्य की अपेक्षा 'से दूसरे वाक्य के सम्बन्ध में आकांक्षा को 'प्रकरण' कहते हैं। जैसे- 'समिधो यजति' । यह मन्त्र दर्शपूर्णमास यागों के प्रकरण में पढ़ा जाता है। जब यह आकांक्षा उपस्थित होती है कि दर्शपूर्णमास याग कैसे हों तब पाठवश इसका विनियोग होता है। स्थान—'स्थानं क्रमः', अर्थात् अनेक में आम्नात मन्त्र का सन्निधिविशेष में आम्नात रूप क्रम को 'स्थान' कहते हैं। जैसे- 'दब्धिरसि' इस मन्त्र में आग्नेय, अग्नीषोमीय और उपांशु याग क्रम से ब्राह्मण भाग में पढ़े गए हैं। मन्त्रभाग में भी क्रम से तीनों अनुमन्त्रण पठित हैं। आग्नेय और अग्नीषोमीय यागों में लिङ्ग के ही द्वारा दोनों का विनियोग सिद्ध है, किन्तु 'दब्धिरसि' में लिङ्ग आदि कोई विनियोजक नहीं है । किन्तु 'ब्राह्मण' में जिस स्थान पर 'उपांशु' याग का विधान किया है उसी स्थान पर मन्त्र में भी इसका पाठ है, इस 'क्रम' से 'उपांशु याग' के अनुमन्त्रण में इसका विनियोग है । समाख्या - 'योगबलम्'; अर्थात् यौगिक शब्द 'समाख्या' है। जैसे- 'हौत्रम् औद्गात्रम्' इत्यादि । 'होतुर्इदं हौत्रम्' इस 'योग' के बल से हौत्रादि रूप से समाख्यात कर्म होत्रादि द्वारा अनुष्ठेय होते हैं । विरोध के उदाहरण - श्रुति और लिङ्ग के विरोध में लिङ्ग का दौर्बल्य; जैसे- 'कदाचन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे' ( हे इन्द्र तुम कभी भी हिंसक नहीं होते हो, किन्तु आहुति देने वाले यजमान पर प्रसन्न होते हो ); 'अग्निहोत्र' के प्रकरण में यह ऋक् सुनी जाती है। इस ऋक् का विनियोग करने वाली यह 'श्रुति' है- 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते'; अर्थात् इन्द्रसम्बन्धिनी ऋक् के गार्हपत्य नाम के अग्नि का आराधन करता है। इस प्रकार इन्द्रप्रकाशन-सामर्थ्य रूप लिङ्ग से 'गार्हपत्य' की ही 'इन्द्र' के अर्थ में लक्षणा आदि कारक विनियोग होगा। इस प्रकार श्रुति और लिङ्ग में विरोध होने पर श्रुति द्वारा लिङ्ग दुर्बल होने के कारण बाध लिया जायगा, क्योंकि 'गार्हपत्यम्' में द्वितीया विभक्ति अभिधा द्वारा पहले ही इस ऋक् को गार्हपत्य अग्नि के उपस्थान में विनियोग कर देगी । प्रकाशक 'इन्द्र' पद के सामर्थ्य रूप लिङ्ग के द्वारा विलम्ब से इन्द्रोपस्थान में ऋक् का विनियोग सूचित होता है अतः यह पक्ष दुर्बल है। इसी प्रकार अन्य बाध्य और बाधकों का विचार 'काव्य- प्रकाश' के टीका-ग्रन्थों से कर लेना चाहिए। अब रस-प्रसङ्ग को हम अधिक विस्तार के भय से यहाँ ही छोड़ देते हैं ।
१. सर्वथा आप ( मीमांसक ) को भी निमित्ततावैचित्र्य के आधार पर अनेक व्यापारों की कल्पना करनी ही होगी तब मैंने जो ऐसी कल्पना की है उससे आपको असूया क्यों है ? केवल यही न, विवश होकर आपको जिसे स्वीकार करना पड़ता है उसे हमने अपना पक्ष बना लिया है !