भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 680 में से

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पृष्ठ 127

प्रथम उद्योतः ६७ लोचनम् सर्वैयमनुसरणीया प्रक्रिया । तदुत्तीर्णत्वे तु सर्वं परमेश्वराद्वयं ब्रह्मेत्यस्मच्छा- स्त्रकारेण न न विदितं तत्त्वालोकग्रन्थं विरचयतेत्यास्ताम् । यत् तु भट्टनायकेनोक्तम्—इह दृप्तसिंहादिपदप्रयोगे च धार्मिकपदप्रयोगे च भयानकरसावेशकृतैव निषेधावगतिः तदीयभीरुवीरत्वप्रकृतिनियमावगममन्त- रेणैकान्ततो निषेधावगत्यभावादिति तन्न केवलार्थसामर्थ्य निषेधावगतेर्निमि- करने से क्या लाभ ? जो लोग¹ वाक्य और उसके अर्थ को अखण्ड, स्फोट रूप कहते हैं वे भी जब अविद्या या व्यवहार में आयेंगे तब उन्हें इस प्रक्रिया का अनुसरण करना होगा । उस (अविद्या या व्यवहार) की स्थिति को पार (उत्तीर्ण) होने के बाद तो सब कुछ परमेश्वराद्वय ब्रह्म हो जाता है, इसे हमारे शास्त्रकार नहीं जानते हैं ? जब कि उन्होंने 'तत्त्वालोक' नामक ग्रन्थ की रचना की है ! अस्तु । जो कि भट्टनायक ने कहा है—यहाँ ('भ्रम धार्मिक०' इस स्थल में) निषेध का ज्ञान दृप्तसिंहादि पद के प्रयोग और 'धार्मिक' पद के प्रयोग में होनेवाले भयानक रस के आवेश² के द्वारा ही होता है, क्योंकि उनकी (धार्मिक और सिंह की, क्रमशः) भीरुता और वीरतारूप प्रकृति के नियम (अविनाभाव) के ज्ञान के बिना एकान्ततः निषेध का ज्ञान नहीं हो सकता, इसलिए केवल अर्थ का सामर्थ्य निषेध के ज्ञान का १. व्याकरण-दर्शन में स्फोट रूप शब्द-ब्रह्म का सिद्धान्त है उसके अनुसार वाक्य और वाक्यार्थ दोनों अखण्ड होते हैं । शब्द अकेले होकर अनर्थक होता है और समस्त अखण्ड वाक्य से अखण्ड अर्थ का बोध होता है । इसी प्रकार वेदान्ती लोग भी अखण्ड वाक्य और वाक्यार्थ को मानते हैं । पद-पदार्थविभाग के बिना किए ही ये लोग 'सत्यं ज्ञानम्' इत्यादि अखण्ड वाक्य को अखण्ड ब्रह्म का वाचक मानते हैं । इस प्रकार इन दोनों सम्प्रदायों के अनुसार अखण्ड वाक्य का अखण्ड वाक्यार्थ बोध सम्पन्न हो जायगा, इतने व्यापारभेद की कल्पना अनावश्यक है यह कहकर प्रस्तुत कार्य का अपलाप नहीं किया जा सकता । आचार्य का कहना है कि हम दोनों मतों को अस्वीकार नहीं करते, बल्कि समर्थन करते हैं, किन्तु जब व्यवहार का प्रसंग है तब तो किसी भी अखण्ड वाक्य को बिना क्रिया-कारक-भेद आदि से खण्ड-खण्ड किए अर्थज्ञान नहीं होगा, यहाँ तक कि वैयाकरण को भी नहीं होगा । तथा दूसरे वेदान्ती भी तो 'अविद्या' की स्थिति या व्यावहारिक दुनियाँ में आकर व्यावहारिक सत्य को स्वीकार करते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें भी पद-पदार्थ की कल्पना अवश्य करनी होगी । हाँ जब वे 'विद्या' की स्थिति की बात करेंगे तब उनका अखण्ड-वाक्य-वाक्यार्थवाद हमें स्वीकार्य होगा, क्योंकि उस स्थिति में एक अद्वैत ब्रह्म को छोड़ कर और कुछ रह ही नहीं जाता यह विषय क्या 'ध्वन्यालोक' के रचयिता आचार्य आनन्दवर्धन को विदित नहीं है ? इस प्रकार व्यवहार-क्षेत्र में वैयाकरण और वेदान्ती दोनों को हमारी सब बातें माननी होंगी । इस विषय का स्पष्टीकरण 'काव्यप्रकाश' के टीका-ग्रन्थों में है । २. भ्रम धार्मिक० में भट्टनायक के कथनानुसार 'दृप्तसिंह' आदि और 'धार्मिक' पद के प्रयोग के होने पर प्रतिपत्ता (बोद्धा) को जो निषेध का ज्ञान होता है वह सर्वथा भयानक रस के आवेश के कारण ही होता है, क्योंकि बिना धार्मिक की भीरुता और सिंह की वीरता के ज्ञान के 'निषेध' रूप अर्थ का ज्ञान नहीं हो सकता है । केवल अर्थ के सामर्थ्य से निषेध का ज्ञान नहीं होता है । तात्पर्य यह कि प्रतिपत्ता को भयानक रस की अभिव्यक्ति से प्रस्तुत में निषेध की प्रतीति होती है ।

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 127, कुल 680 में से · BharatKosha