ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः ७३ ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्ये विधिरूपेऽनुभयरूपो यथा— वच्च मह च्चिअ एक्केइ होन्तु णीसासरोइअव्वाईं । मा तुज्झ वि तीअ विणा दक्खिण्णहअस्स जाअन्तु ॥ कहीं वाच्य के विधिरूप होने पर (व्यङ्ग्य) अनुभय रूप (न विधिरूप तथा न निषेधरूप) होता है। जैसे— तू जा, मुझ ही अकेली के निश्वास और रुदन भाग में हों, उसके बिना दाक्षिण्य (समानुरागिता) से रहित तेरे भी ये (निश्वास, रुदन) मत पैदा हों। लोचनम् तु निभृतनिभृतमेवात्ताभिधाननिकटकण्टकनिद्रान्वेषणपूर्वकमितीयदत्र ध्वन्यते। व्रज ममैवैकस्या भवन्तु निःश्वासरोदितव्यानि । मा तवापि तया विना दाक्षिण्यहतस्य जनिषत ॥ अत्र व्रजेति विधिः । न प्रमादादेव नायिकान्तरसंगमनं तव, अपि तु गाढा- नुरागात्, येनान्यादृङ्मुखरागः गोत्रस्खलनादि च, केवलं पूर्वकृतानुपालना- त्मना दाक्षिण्येनैकरूपत्वाभिमानेनैव त्वमत्र स्थितः, तत्सर्वथा शठोऽसीति गाढमन्युरूपोऽयं खण्डितनायिकाभिप्रायोऽत्र प्रतीयते । न चासौ व्रज्याभाव- रूपो निषेधः, नापि विध्यन्तरमेवान्यनिषेधाभावः । मेरी शय्या पर मत गिर जाओ, बल्कि बहुत कायदे से यह पता कर लो कि 'श्वश्रू' नाम का निकट वाला काँटा नींद में है, यह इतना ध्वनित होता है । यहाँ 'जा' यह विधि है। प्रमादवश ही तू दूसरी नायिका से नहीं मिलता, अपितु गाढ़ अनुरागवश तू (उससे) मिलता है, जिससे यह तेरा मुखराग कुछ भिन्न-सा है और गोत्रस्खलन (दूसरी नायिका का नामोच्चारण) आदि हो रहे हैं। सिर्फ तू यहाँ मेरे पालन का जो पहले वचन कर चुका है उसी दाक्षिण्य के कारण जो एकरूपता का अभिमान तुझे है उसी से तू यहाँ ठहरा है तो तू सर्वथा 'शठ'१ निकला, इस प्रकार यहाँ 'खण्डिता'२ नायिका का अधिक कोपरूप अभिप्राय प्रतीत होता है। न तो यहाँ गमनाभावरूप निषेध है और न तो कोई दूसरा विधि (विध्यन्तर) निषेध का अभाव ही (व्यंग्य होता है)। १. 'शठ' वह नायक कहलाता है जो एक नायिका में बाहर से अनुराग प्रकट करता है और छिपे-छिपे दूसरी से अनुराग करते हुए उसका विप्रिय या अहित करता है—गूढविप्रियकृच्छठः । २. 'खण्डिता' वह नायिका कहलाती है जिसका प्रिय पराई के साथ सम्पन्न मिलन के चिह्न से चिह्नित होकर प्रातःकाल उपस्थित होता है और वह उसे देख कर ईर्ष्या से भर जाती है— पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसम्भोगचिह्नितः । सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्ष्याकषायिता ॥ साहित्यदर्पण ३।११७