ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् सम्भाव्यमानविकाराकुलितत्वं ध्वनितम् । भावतदभावयोश्च साक्षाद्विरोधाद्वा- च्याद्व्यङ्ग्यस्य स्फुटमेवान्यत्वम् । यत्त्वाह भट्टनायकः-‘अहमित्यभिनयविशेषेणात्मदशावेदनाच्छाब्दमेतदपी’- ति । तत्राहमिति शब्दस्य तावन्नायं साक्षादर्थः; काक्वादिसहायस्य च तावति ध्वननमेव व्यापार इति ध्वनेर्भूषणमेतत् । अत्तेति प्रयत्नेनानिभृतसम्भोगपरि- हारः । अथ यद्यपि भवान्मदनशरासारदीर्यमाणहृदय उपेक्षितुं न युक्तः, तथापि किं करोमि पापो दिवसकोऽयमनुचितत्वात्कुत्सितोऽयमित्यर्थः । प्राकृते पुंनपुंस- कयोरनियमः । न च सर्वथा त्वामुपेक्षे, यतोऽत्रैवाहं तत्प्रलोकय नान्यतोऽहं गच्छामि, तदन्योन्यवदनावलोकनविनोदेन दिनं तावदतिवाहयाव इत्यर्थः । प्रतिपन्नमात्रायां च रात्रावन्धीभूतो मदीयायां शय्यायां मा श्लिक्षः, अपि होना ध्वनित होता है । भाव और अभाव इन दोनों में साक्षात् विरोध होने के कारण वाच्य से व्यंग्य का भिन्नत्व स्पष्ट ही है । जो कि भट्टनायक ने कहा है—( गाथा में प्रयुक्त ) ‘अहं’ ( ‘मैं’ ) इस पद के द्वारा अभिनय विशेष के बल से अपनी दशा के आवेदन करने के कारण यह ( निषेध के द्वारा जो अभ्युपगमन ) भी वह शब्द ( शब्दाभिधेय ) है ।’ इस पर ( कहते हैं कि ) ‘अहं’ ( ‘मैं’ ) इस शब्द का यह ( अभिनय विशेषरूप अभ्युपगमन ) साक्षात् अर्थ नहीं है, बल्कि काकु की सहायता से ऐसा होता है, ऐसी स्थिति में ध्वनन ही व्यापार ( यहाँ ठहरता ) है; यह ध्वनि का भूषण है, दूषण नहीं । ( गाथा में ) ‘अत्ता’ ( ‘श्वश्रू’ ) के प्रयोग द्वारा प्रयत्नपूर्वक सम्भावित अपने अनिभृत ( एकान्त ) सम्भोग का परिहार है । यद्यपि तुम काम के बाणों की वर्षा से फटे हृदय वाले किसी प्रकार उपेक्षणीय नहीं हो तथापि यह पापी दिन सम्भोग के लिए अनुचित होने के कारण बड़ा खराब है—यह अर्थ हुआ । प्राकृत में पुंल्लिङ्ग-नपुंसक का नियम¹ नहीं है । अर्थात् मैं सर्वथा तुम्हारी उपेक्षा नहीं कर रही हूँ, क्योंकि देखो कहीं अन्यत्र नहीं जाती हूँ, अतः हम एक दूसरे का मुख देखने के विनोद से इस दिन को बितायें । रात के होते ही अन्धे होकर मिलने के लिए प्रवृत्त है, उत्सुक है; इसी कारण ही नायिका ने उसे ‘रात्र्यन्ध’ ( रतौंधी का रोगी या रात का अन्धा ) कह कर उसके सम्भाव्यमान विकारों के कारण आकुलता को सूचित किया है ! अन्यथा नायिका को क्या पड़ी थी कि उसे ‘रात्र्यन्ध’ कहती, जब कि वह किसी प्रकार पहुँचता स्वयं वह मिल ही लेती । किन्तु ऐसी स्थिति ही नहीं है । १. तात्पर्य यह कि कोई भी शब्द, जो पुंल्लिङ्ग है वह नपुंसक भी हो सकता है और जो नपुंसक है वह पुंल्लिङ्ग भी हो सकता है, जैसा कि पुंल्लिङ्ग ‘दिवसक’ शब्द नपुंसक पढ़ा गया है । किन्तु मेरा विचार है कि ‘दिवसकं प्रलोकय’—प्रस्तुत इस स्थल में ‘दिवसकम्’ यह प्रयोग ‘कालाध्वनोर- त्यन्तसंयोगे’ के नियम के अनुसार ‘द्वितीया’ विभक्ति का प्रयोग हुआ है। इसलिए यहां प्राकृत-शब्द के पुंनपुंसकत्व का विचार ही कोई आवश्यक नहीं है । फिर भी, सम्भव है आचार्य का यह कहना ठीक हो ।