भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 680 में से

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प्रथम उद्योतः ७१ ध्वन्यालोकः क्वचिद्वाच्ये प्रतिषेधरूपे विधिरूपो यथा— अत्ता एत्थ णिमज्जइ एत्थ अहं दिअसअं पलोएहि । मा पहिअ रत्तिअन्धअ सेज्जाए मह णिमज्जहिसि ॥ कहीं वाच्य के प्रतिषेधरूप होने पर व्यंग्य विधिरूप; जैसे— सास यहाँ गहरी सोती है, यहाँ मैं (सोती हूँ), दिन में ही देख लो। रात के अन्धे (रतौंधी के रोगी) हे पथिक ! कहीं हमारी खाट पर न गिर पड़ना । लोचनम् अत्ता इति । श्वश्रूरत्र शेते अथवा निमज्जति अत्राहं दिवसकं प्रलोकय । मा पथिक रात्र्यन्ध शय्यायामावयोः शयिष्ठाः ॥ मह इति निपातोऽनेकार्थवृत्तिरत्रावयोरित्यर्थे न तु ममेति । एवं हि विशेष- वचनमेव शङ्काकारि भवेदिति प्रच्छन्नाभ्युपगमो न स्यात् । कांचत्प्रोषित- पतिकां तरुणीमवलोक्य प्रवृद्धमदनाङ्कुरः संपन्नः पान्थोऽनेन निषेधद्वारेण तया- भ्युपगत इति निषेधाभावोऽत्र विधिः । न तु निमन्त्रणरूपोऽप्रवृत्तप्रवर्तनास्व- भावः सौभाग्याभिमानखण्डनाप्रसङ्गात् । अत एव रात्र्यन्धेति समुचितसमय- (प्राकृत गाथा में) 'मह' यह निपात अनेकार्थवृत्ति होने के कारण यहाँ 'हमारी' (अर्थात् मेरी और सास की) इस अर्थ में है न कि 'मेरी' इस अर्थ में। ऐसा करने पर ('मम' यह) विशेष वचन ही श्वश्रू को शङ्कित कर देने वाला^१ हो जायगा, ऐसी स्थिति में नायिका द्वारा किया गया पथिक का प्रच्छन्नाभ्युपगम (छिपे ढंग से साथ सोने की स्वीकृति) नहीं बनेगा। किसी प्रोषित-पतिका (जिसका पति परदेश चला गया है) तरुणी को देखकर कोई पथिक विशेष कामासक्त हो गया, तब इस निषेध के प्रकार से उस तरुणी ने उसे शयन के लिए वचन दिया, इस प्रकार यहाँ निषेधाभावरूप विधि है, न कि अप्रवृत्त में प्रवर्तन स्वभाव का निमन्त्रणरूप^२ (विधि) है; क्योंकि (तब तो) सौभाग्य के अभिमान के खण्डित हो जाने का प्रसंग होगा। इसीलिए 'रात के अन्धे' इसके द्वारा योग्य समय में सम्भावित होने वाले विकारों से उसका आकुलित १. यदि नायिका 'मम' इस विशेष वचन का प्रयोग करेगी तब सुनती हुई उसकी सास को यह शंका हो सकती है यह (बहू) अपनी ही खाट पर पथिक के गिर जाने की बात क्यों करती है?, जब कि रतौंधी वाला पथिक मेरी भी खाट पर गिर सकता है। हो न हो यहाँ दाल में कुछ काला है! २. प्रस्तुत गाथा में प्रतीयमान विधि को निषेध का अभाव रूप समझना चाहिए, क्योंकि नायिका ने 'खाट पर गिर न जाना' इस निषेध के प्रकार से पथिक को मिलन का वचन दिया है। यहाँ आचार्य का निर्देश है कि 'विधि' को निमन्त्रण स्वरूप नहीं समझ लेना चाहिए, अर्थात् नायिका ने यहाँ अप्रवृत्त पथिक को निमन्त्रण के द्वारा प्रवृत्त नहीं किया है, क्योंकि यदि ऐसा माना जायगा तब उसे अपने सौभाग्य का अभिमान क्या रह जायगा। पथिक तो स्वयं नायिका से-