ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) ध्वन्यालोक काव्य के जिस आत्मतत्त्व की महती प्रतिष्ठापना के उद्देश्य से लिखा गया वह है, ध्वनि अर्थात् शब्द का चतुर्थकक्षातिविष्ट व्यङ्ग्य अर्थ । कवि-वाणी की समग्र सार्थकता उसीके प्राधान्यतः स्फुरण में निहित होती है। यह बात भामह, उद्भट प्रभृति प्राचीन आलंङ्कारिकों को उतनी स्पष्टता से विदित न थी। यद्यपि उन्हें व्यङ्ग्य अर्थ का आभास पर्यायोक्त आदि अनेक अलङ्कारों में मिल चुका था, तथापि वे वाच्य अर्थ की अपेक्षा व्यङ्ग्य के चारुत्व में विश्वास न रखते थे। इस कारण उनके यहाँ व्यङ्ग्य की स्थिति वाच्यानुगत ही बनी रही। यहाँ तक कि वाच्यता के स्पर्शलेश से भी शून्य रस-भावादि तत्त्व भी उन प्राचीन आलंङ्कारिकों के यहाँ रसवदादि अलङ्कार के रूप में वाच्य के शोभाहेतु ही बने रहे । तब किसी ऐसे विशिष्ट महामेधावी आचार्य की साहित्य को आवश्यकता थी जो काव्य-शरीर के केवल शोभाहेतु तत्त्वों के निरूपण की बोझिल और बेजान परम्परा को धक्का देकर आत्मा के भास्वर रूप को आलोकित करता और काव्य के प्रकीर्ण एवं व्याकीर्ण तत्त्वों को संगत करते हुए काव्यालोचन को नई वाणी, नया वेग, नया जीवन प्रदान करता। निश्चित ही यह महनीयतम कार्य भारतीय साहित्यशास्त्र के सबसे अधिक महत्त्वशाली ध्वनि-सम्प्रदाय के प्रवर्तक, ध्वन्यालोक के रचयिता श्रीमदानन्दवर्धनाचार्य ( नवम शताब्दी ) द्वारा समग्रता के साथ सम्पन्न हुआ। साहित्य के क्षेत्र में 'ध्वनि' शब्द एक नया प्रयोग था, किन्तु स्वरूपतः उसे 'ध्वनि' के आधारभूत प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ की स्वीकृति द्वारा प्राचीन आचार्यों ने आक्षेप, अप्रस्तुत-प्रशंसा, समासोक्ति, व्याजस्तुति आदि अलङ्कारों में ( अप्रधान रूप से ही ) सङ्केतित कर दिया था। 'रसगङ्गाधर' के पर्यायोक्त-प्रकरण में पण्डितराज ने इसे पूर्णतः स्वीकार किया है— 'ध्वनिकारात् प्राचीनैर्भामहोद्भटप्रभृतिभिः स्वग्रन्थेषु कुत्रापि ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्यादिशब्दा न प्रयुक्ता इत्येतावत्तैव तैर्ध्वन्यादयो न स्वीक्रियन्त इत्याधुनिकानां वाचोयुक्तिरयुक्तैव । यतः समासोक्ति- व्याजस्तुत्यप्रस्तुतप्रशंसाद्यलङ्कारनिरूपणे कियन्तोऽपि गुणीभूतव्यङ्ग्यभेदास्तैरपि निरूपिताः । अपरश्च सर्वोऽपि व्यङ्ग्यप्रपञ्चः पर्यायोक्तकुक्षौ निक्षिप्तः । न ह्यनुभवसिद्धोऽर्थो बालेनाप्यपह्नोतुं शक्यते । ध्वन्यादिशब्दैः परं व्यवहारो न कृतः । न ह्येतावतानङ्गीकारो भवति । प्राधान्यादलङ्कार्यो हि ध्वनिरलङ्कारस्य पर्यायोक्तस्य कुक्षौ कथङ्कारं निविशतामिति तु विचारान्तरम् ।' स्वयं आनन्दवर्धनाचार्य ने भी इसका सङ्केत इन शब्दों में कर दिया है— 'यद्यपि ध्वनिशब्दसङ्कीर्तनेन काव्यलक्षणविधायिभिर्गुणवृत्तिरन्यो वा न कश्चित प्रकारः प्रकाशितः, तथापि अमुख्यवृत्त्या काव्येषु व्यवहारं दर्शयता ध्वनिमार्गो मनाक् स्पृष्टोऽपि न लक्षितः ।' ( पृ० ३४ ) इस अंश पर 'लोचन' भी सर्वथा आकलनीय है। जैसा कि लोचनकार ने स्पष्ट करते हुए लिखा है कि उद्भट और वामन आदि आचार्यों ने ध्वनि का दिगुन्मीलन कर दिया था, क्योंकि 'भामहविवरण' (अप्राप्त) नामक अपने ग्रन्थ में भट्ट उद्भट ने भामह के 'शब्दाश्छन्दोभिधानार्थाः' के व्याख्यान में कहा है—'शब्दों का अभिधान या अभिधा व्यापार दो प्रकार का होता है, मुख्य और गुणवृत्ति ।' इसी प्रकार 'वामन' भी लिखते हैं—'सादृश्यालक्षणा वक्रोक्तिः' अर्थात् सादृश्य के कारण ( सादृश्य से गर्भित होने से ) लक्षणा 'वक्रोक्ति' कहलाती है। इस प्रकार अमुख्य व्यापार और सादृश्य की ओर प्रवृत्ति से विदित होता है कि प्राचीन आचार्य व्यङ्ग्य अर्थ के प्रति गतिशील हो चुके थे, वाच्य अर्थ की सीमा उन्हें पसंद न थी, फिर भी वे उस सीमा को तोड़ न सके।