भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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( ६ ) प्राचीनों के यहाँ एकमात्र वाच्य को मूल केन्द्र में रख कर ही तथा उसकी प्रायः सीमा में ही काव्य के विविध तत्त्वों की सार्थकता का परीक्षण किया गया। इसलिए वाच्य के प्राधान्य में चमत्कार का कुछ इस प्रकार उन्हें व्यामोह था कि वे काव्य के बाह्य शरीर के अलङ्करण को ही काव्य का सर्वस्व समझ बैठे थे, किन्तु जब कवि-वाणी के आभ्यन्तर चमत्कार पर ध्वनिकार की दृष्टि गई तब उनके यहाँ शब्द और अर्थ के बाह्य विधानों के सारे रूप एकवारगी शिथिल हो गए और रामायण, महाभारत प्रभृति ग्रन्थों में सर्वत्र अभिनव प्रतीयमान अर्थ स्फुरित होने लगा। ध्वनिकार को ऐसा अनुभव हुआ कि वह प्रतीयमान अर्थ कुछ इस प्रकार है जैसे घंटा का अनुरणन। बस, क्या था, उन्होंने इसी आधार पर उस अर्थ की संज्ञा 'ध्वनि' रख दी तथा इसके प्रमाणस्वरूप उन्हें विद्वान् वैयाकरणों के यहाँ अनुकूल संकेत भी मिल गया। वैयाकरण लोग श्रूयमाण वर्णों में 'ध्वनि' शब्द का व्यवहार करते थे। इतना ही नहीं, शब्द और अर्थ के बाह्य समग्र रूपों और विच्छित्तियों को अतिशयित करके प्राधान्यतः स्फुरित होने वाला वह प्रतीयमान अर्थ उसी प्रकार उन्हें बाह्य तत्त्वों से पृथक् लगा जिस प्रकार अङ्गनाओं में उनका लावण्य उनके अङ्गसंस्थान से अभिव्यङ्ग्य होकर अङ्ग से व्यतिरिक्त होता है। 'लावण्य' के सम्बन्ध में यह श्लोक प्रसिद्ध है— मुक्ताफलेषु च्छायायास्तरळत्वमिवान्तरा। प्रतिभाति यदङ्गेषु तल्लावण्यमिहोच्यते ॥ अर्थात् मुक्ताओं में 'आब' के रूप में जो छाया की तरलता सी कुछ झलकती-दिपती रहती है वही अङ्गों में 'लावण्य' कहलाती है। ध्वनिकार लिखते हैं— प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु ॥ पृ० ४७ अर्थात् महाकवियों की वाणियों में वह प्रतीयमान कुछ और ही है जो वह प्रसिद्ध अवयवों से अतिरिक्त रूप में अङ्गनाओं में लावण्य की भांति भासित होता है। यही नहीं, उस प्रतीयमान अर्थ की छाया, स्त्रियों की लज्जा की भांति, महाकवियों की अलङ्कार- सम्पन्न वाणियों की मुख्य भूषण है— मुख्या महाकविगिरामलङ्कृतिभृतामपि । प्रतीयमानच्छायैषा भूषा लज्जेव योषिताम् ॥ ध्व० ३।३७ ( यद्यपि आचार्य कुन्तक इस पद्य में 'लावण्य' के स्थान पर 'सौभाग्य' पद को अभिषिक्त करते हैं, क्योंकि इस प्रकार सहृदयों के ही संवेद्य प्रतीयमान के साथ सकललोकलोचनसंवेद्य 'लावण्य' का समीकरण नहीं हो सकता और 'सौभाग्य' के वहाँ नियोजन से काव्यपरमार्थज्ञ सहृदयों के ही अनुभव-गोचर और कामिनियों के विलक्षण 'सौभाग्य', जो तदुपभोगोचित नायक- जनों के ही संवेद्य के साथ समीकृत हो जाता है, तथापि जो 'लावण्य' को प्रसिद्धावयवव्यतिरेकिता के साथ प्रतीयमान की प्रसिद्धालंकृत या प्रतीत अवयवों से व्यतिरेकित्व की बात अधिक संगत लगती है और साथ ही जो 'लावण्य' में आकर्षण और स्वारस्य है वह 'सौभाग्य' में नहीं। अस्तु ) ध्वन्यालोककार इस प्रतीयमान या व्यङ्ग्य अर्थ के तीन भेद करते हैं—वस्तु, अलङ्कार और रसादि। इनमें वस्तुध्वनि और अलङ्कारध्वनि, शब्दाभिधेय होने के कारण लौकिक हैं किन्तु