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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 680 में से

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यहां लोचनकार के कथन को और भी पल्लवित रूप दे सकें, वैयाकरणों के 'ध्वनि' के आधारभूत स्फोटवाद पर विचार कर लेना आवश्यक समझते हैं क्योंकि स्फोटवाद शब्द की सृष्टिप्रक्रिया से सम्बन्ध रखता है और हम बिना इसको समझे लोचन के निर्देश को समझ नहीं सकते। स्फोटवाद—यह वह दर्शन है जिसमें शब्द के रूप तथा उससे अर्थ के विकास का निर्णय हुआ है। इस दर्शन का प्रारम्भ कब से हुआ यह निश्चित नहीं, फिर पाणिनि के 'अष्टाध्यायी' ग्रन्थ में एक सूत्र मिलता है—'अवङ् स्फोटायनस्य' (६, १, १२३)। यहाँ किन्हीं 'स्फोटायन' नामक आचार्य का निर्देश है। इनके नाम में 'स्फोट' शब्द है और प्रथमतः उल्लेख के रूप में यही मिलता है अतः कल्पना की जाती है कि स्फोटवाद के प्रतिपादक यह स्फोटायन ही थे। जैसा कि काशिका की टीका 'पदमञ्जरी' में हरदत्त ने लिखा है— 'स्फोटोऽयनं परायणं यस्य स स्फोटायनः स्फोटप्रतिपादनपरो वैयाकरणाचार्यः ।' स्फोटवाद शब्द की नित्यता को स्वीकार करता है और यास्क, पाणिनि ने इसी सिद्धान्त को माना है। शब्द के नित्यत्व पर 'संग्रह' नामक ग्रन्थ में व्याडि ने भी विचार किया था ऐसा निर्देश मिलता है। कात्यायन और पतञ्जलि भी स्फोटवाद के समर्थक हैं। वैयाकरणों ने स्फोटवाद में शब्द को नित्य, एक तथा अखण्ड माना। उस शब्द की अभिव्यक्ति ध्वनि से होती है जिसके दो भेद हैं प्राकृत एवं वैकृत। उनके अनुसार वर्ण और पद सार्थक नहीं, बल्कि वाक्य सार्थक होता है, अर्थात् अर्थ की प्रतीति वाक्य से होती है। पतञ्जलि ने अपना मत स्पष्ट शब्दों में लिखा है— नित्याश्च शब्दाः । नित्येषु च शब्देषु कूटस्थैरविचालिभिर्वर्णैर्भवितव्यमनपायोपजन- विकारिभिः । महाभाष्य, आ० २ पतञ्जलि ने जिस शब्द का लक्षण-निर्देश किया है वह स्फोट शब्द का ही है— श्रोत्रोपलब्धिर्बुद्धिर्निग्राह्यः प्रयोगेणाभिज्वलित आकाशदेशः शब्दः । एकं च पुन- राकाशम् । महाभाष्य, अ.० २ अर्थात् शब्द की उपलब्धि श्रोत्र के माध्यम से होती है। श्रोत्र एक इन्द्रिय है जो कर्णशष्कुल्य- वच्छिन्न आकाशरूप है। तात्पर्य यह कि हमारे कर्ण देश में जितना आकाश है उसी में शब्द की उपलब्धि होती है। श्रोत्रेन्द्रिय एक आकाश ही है। फिर यहां प्रश्न होता है कि जब शब्द में निहित वर्ण अपने उच्चारण के दूसरे क्षण में नष्ट हो जाते हैं तब शब्द का ग्रहण कैसे सम्भव होगा ? इसके समाधान में बुद्धिर्निग्राह्य कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्व-पूर्व ध्वनि से उत्पन्न संस्कार का परिपाक होने पर अन्त्य वर्ण के ज्ञान से शब्द का ग्रहण होता है। बुद्धि शब्दों को ग्रहण करती है। बुद्धि में ध्वनियां संस्कार छोड़ती जाती हैं और अन्तिम वर्ण से शब्द का ज्ञान होता है। प्रयोग से अभिज्वलित या प्रकाशित का तात्पर्य यह है कि शब्द तो सर्वदा सर्वत्र विद्यमान रहता है। किन्तु उसकी उपलब्धि उच्चारण से ही होती है। जो विद्यमान शब्द है वही ध्वनि, वर्ण या प्रयोग है। आकाश जो शब्द का आश्रय है वह जब एक है तब उसमें रहने वाला शब्द भी एक ही है। शब्द में वस्तुतः भेद नहीं होता बल्कि उसको व्यक्त करने वाली ध्वनि के तथा देश के भेद के कारण उसमें भेद आरोपित कर लेते हैं, जिस प्रकार एक ही आकाश घटाकाश, मठाकाश आदि रूप में भिन्न हो जाता है।