ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३ ) पतञ्जलि का यह शब्द 'स्फोट' रूप है। ध्वनि स्फोट का गुण है। जिस प्रकार भेरी के आघात में एक अनुरणन होता है, वही ध्वनि है। स्फोट और ध्वनि में प्रथम व्यङ्ग्य है और दूसरा व्यञ्जक। तात्पर्य यह कि ध्वनि से स्फोट रूप शब्द अभिव्यक्त होता है और अभिव्यक्त स्फोट रूप शब्द से अर्थ का ज्ञान होता है। 'वाक्यपदीय' ग्रन्थ में भर्तृहरि ने 'स्फोट' का यथावत विवेचन किया है। वही आगे के सभी वैयाकरणों का आधार हुआ है। वैयाकरणों ने 'स्फोट' शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ किया है—'स्फुटत्यर्थोऽस्मादिति स्फोटः' अर्थात् जिससे अर्थ स्फुटित होता है वह शब्द स्फोट कहलाता है। इस प्रकार यह एक यौगिक शब्द है। 'स्फोटचन्द्रिका' में श्रीकृष्ण ने इसे योगरूढ बताया है। कहा जा चुका है कि वैयाकरणों के अनुसार स्फोट और ध्वनि शब्द के दो भेद माने गए हैं। आचार्य भर्तृहरि ने उसे ही कहा है— द्वावुपादानशब्देषु शब्दौ शब्दविदो विदुः। एको निमित्तं शब्दानामपरोऽर्थे प्रयुज्यते॥ पुण्यराज के अनुसार इसे इस प्रकार समझ सकते हैं कि स्फोट ध्वनि रूप शब्द ६। उपादान कारण है क्योंकि उससे अर्थ का ज्ञान होता है, और दूसरे ध्वनिरूप शब्द का अर्थों में प्रयोग किया जाता है, अथवा वह शब्द-समुदाय (उपादान) जिसे ध्वनि कहते हैं, स्फोट का निमित्त अर्थात् व्यञ्जक होता है तत्पश्चात् दूसरे स्फोट रूप शब्द के अभिव्यक्त होने पर अर्थ की प्रतीति होती है। अभिप्राय यह कि श्रोता की बुद्धि में स्थित क्रमरहित शब्द स्फोट या ध्वनि शब्द के सुनते ही अभिव्यक्त होता है और वह अर्थ का बोध कराता है। इस प्रकार स्फोट व्यङ्ग्य है और ध्वनि व्यञ्जक। जिस प्रकार कारण और कार्य को कुछ दार्शनिक भिन्न मानते हैं तो कुछ अभिन्न, इसी प्रकार का मतभेद स्फोट और ध्वनि के सन्दर्भ में भी प्राचीन दार्शनिकों में हुआ। स्फोट की स्थिति बुद्धि में उस प्रकार की होती है जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि की। उस स्थिति में वह अज्ञात रहता है। किन्तु जब कण्ठ, तालु आदि करणों के आश्रय से विवर्त की स्थिति में आता है तब ध्वनि रूप से प्रतीत होने लगता है। व्यञ्जक ध्वनि के भेद से उसमें भी भेद हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि स्वयं को प्रकाशित करता हुआ अन्य घटादि वस्तुओं को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार ध्वनि द्वारा व्यञ्जित स्फोट शब्द भी अपने को प्रकाशित करता हुआ अर्थ को भी प्रकाशित करता है। स्फोट और ध्वनि में तादात्म्य माना जाता है, क्योंकि यदि ऐसा न माना जाय तो किसी भी ध्वनि से किसी अर्थ का ज्ञान होना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं होता। फिर भी स्फोट में कोई क्रम नहीं होता तथा भेद भी नहीं होता। उसमें क्रम और भेद की प्रतीति ध्वनि की अभिव्यक्ति के क्रम से होती है। जिस प्रकार चन्द्रमा में चञ्चलता नहीं, किन्तु तरल जल में उसके प्रतिबिम्ब को देखकर उसमें भी चञ्चलता आरोपित करते हैं उसी प्रकार स्फोट में क्रम और भेद वास्तविक नहीं हैं, प्रत्युत आरोपित हैं। मनुष्य की बुद्धि में वह ब्रह्माण्डव्यापी शब्द अपने क्रमरहित एवं निर्विभाग रूप में विद्यमान रहता है और जब उच्चारण की इच्छा होती है तब उसमें एक क्रियारूपा वृत्ति होती है, फिर वह