ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १०१ ध्वन्यालोकः स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थं प्रतिपादयन् । यथा व्यापारनिष्पत्तौ पदार्थो न विभाव्यते ॥ ११ ॥ यथा स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थं प्रकाशयन्नपि पदार्थो व्यापार- निष्पत्तौ न भाव्यते विभक्ततया ॥ ११ ॥ अपनी सामर्थ्य के वश ही वाक्यार्थ का प्रतिपादन करता हुआ पदार्थ जिस प्रकार व्यापार के निष्पन्न ( पूर्ण ) हो जाने पर विभावित नहीं होता ( अलग प्रतीत नहीं होता ) ॥ ११ ॥ जिस प्रकार अपनी सामर्थ्य के वश ही वाक्यार्थ को प्रकाशित करता हुआ भी पदार्थ व्यापार की निष्पत्ति की स्थिति में विभक्तरूप से भावित ( प्रतीत ) नहीं होता । लोचनम् माकाङ्क्षायोग्यतासन्निधयः । विभाव्यत इति । विशब्देन विभक्ततोक्ता; विभक्त- तया न भाव्यत इत्यर्थः । अनेन विद्यमान एव क्रमो न संवेद्यत इत्युक्तम् । तेन यत्स्फोटाभिप्रायेणासन्नेव क्रम इति व्याचक्षते तत्प्रत्युत विरुद्धमेव । वाच्येऽर्थे विमुखो विश्रान्तिनिबन्धनं परितोषमलभमान आत्मा हृदयं येषामि- त्यनेन सचेतसामित्यस्यैवार्थोऽभिव्यक्तः । सहृदयानामेव तर्ह्ययं महिमास्तु, नहीं करते हैं, इस प्रकार होते हुए भी क्रम का लक्षित नहीं होना ( व्यङ्ग्य अर्थ के ) प्राधान्य में हेतु है । अपनी सामर्थ्य१ अर्थात् आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि । विभावित होता है— । 'वि' शब्द से 'विभक्तता' कही गई; अर्थात् विभक्त रूप में नहीं भावित ( प्रतीत ) होता है । इससे जो 'स्फोट के अभिप्राय से नहीं रहता हुआ भी क्रम' ऐसा व्याख्यान करते हैं, वह ( व्याख्यान ) प्रत्युत विरुद्ध ही है । वाच्य अर्थ में विमुख अर्थात् विश्रान्तिमूलक परितोष को न पाये आत्मा ( हृदय ) है जिनका, इससे 'सहृदयों का' इतने का ही अर्थ अभिव्यक्त है । तब तो यह सहृदयों की ही महिमा १. पदार्थों में जब तक योग्यता, आकांक्षा और सन्निधि ये तीनों विद्यमान नहीं रहते तब तक वाक्य स्वरूप-लाभ नहीं करता । 'योग्यता' पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध में बाधा का अभाव है । पदसमूह में इस 'योग्यता' के अभाव में किसी प्रकार वह वाक्य नहीं कहा जा सकता, जैसे 'वह्निना सिञ्चति' । यह पदसमूह योग्यतारहित है, क्योंकि सेचन कार्य की योग्यता अग्नि में नहीं है, इसलिए यह वाक्य नहीं है । पदसमूह को वाक्य बनने में 'आकांक्षा' भी होनी चाहिए, अर्थात् एक पद से दूसरे पद के अन्वय का अनुभावन होना चाहिए, आकांक्षारहित पदसमूह, जैसे 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मणः' इत्यादि । यहाँ एक पद से दूसरे का अन्वय प्रतीत नहीं होता । 'सन्निधि' या 'आसत्ति' बुद्धि का अविच्छेद है, अर्थात् एक पद का दूसरे से सामयिक व्यवधान नहीं होना चाहिए । जैसे कोई पदसमूह अंशतः घण्टे-घण्टे के व्यवधान से कहा जाय तब उसमें सन्निधि का अभाव होता है अतः वह वाक्य नहीं कहला सकता । जैसे 'घटम्' कहने के एक घण्टे बाद यदि 'आनय' कहा तो यह पदसमूह वाक्य नहीं हो सकता । इस प्रकार ये तीनों ही पदसमूह के वे धर्म हैं जिनसे वाक्य स्वरूपलाभ करता है । यद्यपि 'आकांक्षा' श्रोता की