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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

प्रथम उद्योतः १०१ ध्वन्यालोकः स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थं प्रतिपादयन् । यथा व्यापारनिष्पत्तौ पदार्थो न विभाव्यते ॥ ११ ॥ यथा स्वसामर्थ्यवशेनैव वाक्यार्थं प्रकाशयन्नपि पदार्थो व्यापार- निष्पत्तौ न भाव्यते विभक्ततया ॥ ११ ॥ अपनी सामर्थ्य के वश ही वाक्यार्थ का प्रतिपादन करता हुआ पदार्थ जिस प्रकार व्यापार के निष्पन्न ( पूर्ण ) हो जाने पर विभावित नहीं होता ( अलग प्रतीत नहीं होता ) ॥ ११ ॥ जिस प्रकार अपनी सामर्थ्य के वश ही वाक्यार्थ को प्रकाशित करता हुआ भी पदार्थ व्यापार की निष्पत्ति की स्थिति में विभक्तरूप से भावित ( प्रतीत ) नहीं होता । लोचनम् माकाङ्क्षायोग्यतासन्निधयः । विभाव्यत इति । विशब्देन विभक्ततोक्ता; विभक्त- तया न भाव्यत इत्यर्थः । अनेन विद्यमान एव क्रमो न संवेद्यत इत्युक्तम् । तेन यत्स्फोटाभिप्रायेणासन्नेव क्रम इति व्याचक्षते तत्प्रत्युत विरुद्धमेव । वाच्येऽर्थे विमुखो विश्रान्तिनिबन्धनं परितोषमलभमान आत्मा हृदयं येषामि- त्यनेन सचेतसामित्यस्यैवार्थोऽभिव्यक्तः । सहृदयानामेव तर्ह्ययं महिमास्तु, नहीं करते हैं, इस प्रकार होते हुए भी क्रम का लक्षित नहीं होना ( व्यङ्ग्य अर्थ के ) प्राधान्य में हेतु है । अपनी सामर्थ्य१ अर्थात् आकांक्षा, योग्यता, सन्निधि । विभावित होता है— । 'वि' शब्द से 'विभक्तता' कही गई; अर्थात् विभक्त रूप में नहीं भावित ( प्रतीत ) होता है । इससे जो 'स्फोट के अभिप्राय से नहीं रहता हुआ भी क्रम' ऐसा व्याख्यान करते हैं, वह ( व्याख्यान ) प्रत्युत विरुद्ध ही है । वाच्य अर्थ में विमुख अर्थात् विश्रान्तिमूलक परितोष को न पाये आत्मा ( हृदय ) है जिनका, इससे 'सहृदयों का' इतने का ही अर्थ अभिव्यक्त है । तब तो यह सहृदयों की ही महिमा १. पदार्थों में जब तक योग्यता, आकांक्षा और सन्निधि ये तीनों विद्यमान नहीं रहते तब तक वाक्य स्वरूप-लाभ नहीं करता । 'योग्यता' पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध में बाधा का अभाव है । पदसमूह में इस 'योग्यता' के अभाव में किसी प्रकार वह वाक्य नहीं कहा जा सकता, जैसे 'वह्निना सिञ्चति' । यह पदसमूह योग्यतारहित है, क्योंकि सेचन कार्य की योग्यता अग्नि में नहीं है, इसलिए यह वाक्य नहीं है । पदसमूह को वाक्य बनने में 'आकांक्षा' भी होनी चाहिए, अर्थात् एक पद से दूसरे पद के अन्वय का अनुभावन होना चाहिए, आकांक्षारहित पदसमूह, जैसे 'गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मणः' इत्यादि । यहाँ एक पद से दूसरे का अन्वय प्रतीत नहीं होता । 'सन्निधि' या 'आसत्ति' बुद्धि का अविच्छेद है, अर्थात् एक पद का दूसरे से सामयिक व्यवधान नहीं होना चाहिए । जैसे कोई पदसमूह अंशतः घण्टे-घण्टे के व्यवधान से कहा जाय तब उसमें सन्निधि का अभाव होता है अतः वह वाक्य नहीं कहला सकता । जैसे 'घटम्' कहने के एक घण्टे बाद यदि 'आनय' कहा तो यह पदसमूह वाक्य नहीं हो सकता । इस प्रकार ये तीनों ही पदसमूह के वे धर्म हैं जिनसे वाक्य स्वरूपलाभ करता है । यद्यपि 'आकांक्षा' श्रोता की

१०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः तद्वत्सचेतसां सोऽर्थो वाच्यार्थविमुखात्मनाम् । बुद्धौ तत्त्वार्थदर्शिन्यां झटित्येवावभासते ॥ १२ ॥ एवं वाच्यव्यतिरेकिणो व्यङ्ग्यस्यार्थस्य सद्भावं प्रतिपाद्य प्रकृत उपयोजयन्नाह— यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ । व्यङ्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः॥१३॥ उसी प्रकार वह अर्थ वाच्यार्थ से विमुख आत्मा वाले सहृदयजनों की तत्त्वार्थ- दर्शिनी बुद्धि में झट से ही अवभासित हो जाता है ॥ १२ ॥ इस प्रकार वाच्यार्थ से अतिरिक्त व्यंग्यार्थ के सद्भाव का प्रतिपादन करके प्रकृत में उसका उपयोग करते हुए कहते हैं— जहाँ अर्थ अपने-आपको अथवा शब्द अपने अर्थ को गुणीभूत करके (प्रतीयमान) अर्थ को व्यक्त ( अभिव्यक्त ) करते हैं वह ‘काव्यविशेष' विद्वान् लोगों द्वारा 'ध्वनि' कहा जाता है ॥ १३ ॥ लोचनम् न तु काव्यस्यासौ कश्चिदतिशय इत्याशङ्कयाह—अवभासत इति । तेनात्र विभक्ततया न भासते, न तु वाच्यस्य सर्वथैवानवभासः। अत एव तृतीयोद्द्योते घटप्रदीपदृष्टान्तबलाद्व्यङ्ग्यप्रतीतिकालेऽपि वाच्यप्रतीतिर्न विघटत इति यद्वक्ष्यति तेन सहास्य ग्रन्थस्य न विरोधः ॥ ११-१२ ॥ सद्भावमिति । सत्तां साधुभावं प्राधान्यं चेत्यर्थः । द्वयं हि प्रतिपिपादयि- है, न कि यह, कोई काव्य का अपना अतिशय है, यह आशङ्का करके कहते हैं— अवभासित होता है— । इस लिए यहाँ विभक्त रूप से भासित नहीं होता, न कि वाच्य का सर्वथा ही अनवभास होता है । अत एव तृतीय 'उद्योत' में घट और प्रदीप के दृष्टान्त १ के बल से जो यह कहेंगे कि व्यङ्ग्य की प्रतीति के काल में भी वाच्यप्रतीति नहीं विघटित होती है उसके साथ इस ग्रन्थ का विरोध नहीं है॥११-१२॥ सद्भाव२—। सत्ता अर्थात् साधुभाव और प्राधान्य । क्योंकि दोनों ही प्रतिपादन की जिज्ञासा रूप है तथापि परम्परा-सम्बन्ध द्वारा पदार्थ का भी धर्म है। अपनी इस 'सामर्थ्य' के द्वारा ही पदार्थ वाक्यार्थ का बोध कराते हैं। १. वाच्यार्थ से व्यङ्ग्यार्थ का द्योतन होता है। इसका मतलब है कि जिस प्रकार दीपक अपने प्रकाश से घट को प्रकाशित करता हुआ अपने को भी प्रकाशित करता है उसी प्रकार वाच्यार्थ भी व्यङ्ग्य अर्थ को प्रतीत कराता हुआ स्वयं भी प्रतीत होता है। वाच्यार्थ से विमुख सहृदय लोग झटिति उस व्यङ्ग्य अर्थ का ज्ञान करते हैं। इससे क्रम रहता हुआ भी उन्हें क्रम अभिलक्षित नहीं होता है। यहाँ यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि सहृदयों की विशेषता है जो इस प्रकार व्यङ्ग्य अर्थ का ज्ञान करते हैं, बल्कि व्यङ्ग्यार्थ उन्हें इस प्रकार अवभासित होता है। २. 'सद्भाव' शब्द सत्ता या अस्तित्व के अर्थ में प्रयुक्त होता है, साथ ही उस वस्तु की

प्रथम उद्योतः १०३ लोचनम् षितम् । प्रकृत इति लक्षणे । उपयोजयन् उपयोगं गमयन् । तमर्थमिति चायमुप- योगः । स्वशब्द आत्मवाची । स्वश्चार्थश्च तौ स्वार्थौ; तौ गुणीकृतौ याभ्याम्, यथासंख्येन तेनार्थो गुणीकृतात्मा, शब्दो गुणीकृताभिधेयः । तमर्थमिति । ‘सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु’ इति यदुक्तम् । व्यङ्क्तः द्योतयतः । व्यङ्क्त इति द्विवचनेनेदमाह—यद्यप्यविवक्षितवाच्ये शब्द एव व्यञ्जकस्तथाप्यर्थस्यापि सहकारिता न त्रुट्यति, अन्यथा अज्ञातार्थोऽपि शब्दस्तद्व्यञ्जकः स्यात् । विवक्षितान्यपरवाच्ये च शब्दस्यापि सहकारित्वं भवत्येव, विशिष्टशब्दाभि- धेयतया विना तस्यार्थस्याव्यञ्जकत्वादिति सर्वत्र शब्दार्थयोरुभयोरपि ध्वननं व्यापारः । तेन यद्भट्टनायकेन द्विवचनं दूषितं तद् गजनिमीलिकयैव । अर्थः शब्दो वेति तु विकल्पाभिधानं प्राधान्याभिप्रायेण । काव्यं च तद्विशेषश्चासौ काव्यस्य वा विशेषः । काव्यग्रहणाद् गुणालङ्कारोपस्कृतशब्दार्थपृष्ठपाती ध्वनि- इच्छा के विषय हैं। प्रकृत में—। अर्थात् लक्षण में । उपयोग बताते हुए— । ‘उस प्रतीयमान अर्थ का’ यह उपयोग है । स्व और अर्थ दोनों स्वार्थ हुए, वे स्वार्थ जिनके द्वारा गुणीभूत हुए । उस क्रम से अर्थ अपने आपको गुणीभूत करता है और शब्द अभिधेय ( वाच्य ) का गुणीभूत करता है । उस अर्थ को— । जिसे ‘सरस्वती स्वादु तदर्थवस्तु’ कहा है । ‘व्यक्त करते हैं’ अर्थात् द्योतन करते हैं । ‘व्यङ्क्तः’ ( व्यक्त करते हैं ) इस द्विवचन से यह कहते हैं—यद्यपि ‘अविवक्षितवाच्य’ ध्वनि में शब्द ही व्यञ्जक है, तथापि अर्थ की भी सहकारिता नहीं टूटती है, अन्यथा जिस शब्द का अर्थ ज्ञात नहीं है वह भी उसका व्यञ्जक हो जाता । और ‘विवक्षितान्यपर- वाच्य’ ध्वनि में शब्द भी सहकारी होता ही है, क्योंकि विशिष्ट शब्द द्वारा अभिधान नहीं किया जायगा तो ऐसी स्थिति में वह शब्द उस अर्थ का व्यञ्जक नहीं हो सकता । इस प्रकार सर्वत्र ‘ध्वनन’ शब्द और अर्थ दोनों का ही व्यापार है । इस लिए जो कि भट्टनायक ने ‘द्विवचन’ में दोष बताया था वह तो गजनिमीलिका के कारण ही । ‘अर्थ अथवा शब्द’ इस प्रकार जो विकल्प कहा है वह प्राधान्य१ के अभिप्राय से । अच्छाई और श्रेष्ठता भी इस शब्द से अभिहित होती है—सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते । प्रस्तुत में बड़े विस्तार से आचार्य ने ध्वनि के सद्भाव का जो प्रतिपादन किया है उससे केवल ध्वनि का अस्तित्व या मौजूदगी ही सिद्ध नहीं की है बल्कि उसे साधु और प्रधान भी सिद्ध किया है । १. ‘अर्थ अथवा शब्द’ यह विकल्प प्राधान्य के अभिप्राय से कहा है। अर्थात् जैसा कि यह ऊपर की पंक्तियों में कह चुके हैं कि केवल शब्द या केवल अर्थ व्यञ्जक नहीं होते, बल्कि एक दूसरे की सहायता से व्यञ्जक होते हैं । इस प्रकार जब अर्थ प्रधान रूप से व्यङ्ग्य की व्यञ्जना करता है तब शब्द उसका सहकारी होता है और जब शब्द प्रधान रूप से व्यञ्जक होता है तब अर्थ उसका सहकारी होता है । इसी प्राधान्य के अभिप्राय से आचार्य ने ‘विकल्प’ का प्रयोग किया है और शब्द-अर्थ की इसी सम्मिलित व्यञ्जकता के कारण ‘व्यङ्क्तः’ इस द्विवचन के प्रयोग को भी सार्थकता है । भट्टनायक द्वारा ‘द्विवचन’ का दूषण उनका अज्ञान प्रकट करता है।

१०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यत्रार्थो वाच्यविशेषः वाचकविशेषः शब्दो वा तमर्थं व्यङ्क्तः, स काव्यविशेषो ध्वनिरिति । जहाँ अर्थ याने वाच्यविशेष अथवा वाचकविशेष शब्द उस अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं वह काव्यविशेष 'ध्वनि' (कहलाता) है । लोचनम् लक्षण 'आत्मे'त्युक्तम् । तेनैतन्निरवकाशं श्रुतार्थापत्तावपि ध्वनिव्यवहारः स्यादिति । यच्चोक्तम्—'चारुत्वप्रतीतिस्तर्हि काव्यस्यात्मा स्यात्' इति तदङ्गी- कुर्म एव । नाम्नि खल्वयं विवाद इति । यच्चोक्तम्—'चारुणः प्रतीतिर्यदि काव्यात्मा प्रत्यक्षादिप्रमाणादपि सा भवन्ती तथा स्यात्' इति । तत्र शब्दार्थ- मयकाव्यात्माभिधानप्रस्तावे क एष प्रसङ्ग इति न किञ्चिदेतत् । स इति । अर्थो वा शब्दो वा, व्यापारो वा । अर्थोऽपि वाच्यो वा ध्वनतीति, शब्दोऽप्ये- 'काव्य और उसका विशेष' इस प्रकार (कर्मधारय समास) है, या 'काव्य का विशेष' इस प्रकार (षष्ठी तत्पुरुष समास) है । 'काव्य' के ग्रहण से यह कहा कि जो ध्वनि रूप आत्मा है वह गुण और अलङ्कार से उपस्कृत शब्द और अर्थ का पृष्ठपाती है । इस लिए इस बात का कोई अवकाश नहीं कि (स्थूलकाय देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता' इस) "श्रुतार्थापत्ति' में भी 'काव्य' का व्यवहार होने लगेगा । और जो कि कहा है—'तब तो चारुत्व की प्रतीति काव्य का आत्मा होगा' यह हम स्वीकार करते ही हैं। यह विवाद तो नाम में है ! और जो कि कहा है—'चारु की प्रतीति यदि काव्य का आत्मा है तो प्रत्यक्ष आदि प्रमाण से भी चारु की होतीं हुई प्रतीति उस प्रकार (काव्य का आत्मा) होगी।' वहाँ जब कि शब्दार्थरूप काव्यात्मा के कथन का प्रसङ्ग है, फिर यह कौन प्रसङ्ग है ? अतः यह कुछ भी नहीं । (कारिका में प्रयुक्त) वह—। अर्थ अथवा शब्द, अथवा व्यापार । 'ध्वनति' या ध्वनन करता है, (इस व्युत्पत्ति के अनुसार) वाच्य अर्थ 'ध्वनि' है, इस प्रकार शब्द भी । 'ध्वन्यते' १. आचार्य का यह निर्देश पहले भी हो चुका है कि 'ध्वनि' काव्य का आत्मा अवश्य है किन्तु केवल ध्वनि से काव्य का व्यवहार नहीं होता । बल्कि 'ध्वनि' के साथ शब्द-अर्थ का गुण और अलङ्कार से उपस्कृत भी होना आवश्यक है । इस प्रकार प्रकृत 'कारिका' में 'काव्य' यह साभिप्राय है । यदि केवल ध्वनि के अस्तित्व मात्र से 'काव्य' मान लेने की छूट दे दी जाय तो मीमांसकों के यहाँ प्रसिद्ध 'श्रुतार्थापत्ति' का स्थल भी 'काव्य' के रूप में व्यवहृत होगा । जैसे 'यह मोटा ताजा देवदत्त दिन में नहीं खाता है' (पीनोऽयं देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते) इस श्रुत वाक्य से जो दिन में भोजन के अभाव में पीनत्व रूप अर्थ ज्ञात होता है उसकी अन्यथानुपपत्ति को लेकर 'रात्रि में भोजन करता है' (रात्रौ भुङ्क्ते) इस रात्रिभोजन रूप अर्थ के प्रतिपादक अन्य वाक्य की कल्पना करते हैं । परन्तु यहाँ 'ध्वनि' होते हुए भी गुण-अलङ्कार से उपस्कृत शब्द-अर्थ का अभाव है अतः यहाँ काव्य-व्यवहार नहीं हो सकता । इसका निर्देश 'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' (१।५) कारिका की वृत्ति में 'विविधवाच्यवाचकरचनाप्रपञ्चचारुणः काव्यस्य' में किया है । इस स्थल के लोचन में इसका स्पष्टीकरण दर्शनीय है ।

प्रथम उद्योतः १०५ ध्वन्यालोकः अनेन वाच्यवाचकचारुत्वहेतुभ्य उपमादिभ्योऽनुप्रासादिभ्यश्च विभक्त एव ध्वनेर्विषय इति दर्शितम् । यदप्युक्तम्—‘प्रसिद्धप्रस्थाना- तिक्रमिणो मार्गस्य काव्यहानेर्ध्वनिर्नास्ति’ इति, तदप्ययुक्तम् । यतो लक्षणकृतामेव स केवलं न प्रसिद्धः, लक्ष्ये तु परीक्ष्यमाणे स एव सहृदय- हृदयाह्लादकारि काव्यतत्त्वम् । ततोऽन्यच्चित्रमेवेत्यग्रे दर्शयिष्यामः । इससे वाच्य और वाचक की चारुता के हेतु उपमा आदि और अनुप्रास आदि से ध्वनि का विषय विभक्त ही है, यह दिखाया । जो कि कहा है—‘प्रसिद्ध प्रस्थानों को अतिक्रमण करनेवाला मार्ग काव्यत्व से रहित होता है, अतः ध्वनि नहीं है।’ वह भी ठीक नहीं; क्योंकि लक्षणकारों के लिए ही वह केवल प्रसिद्ध नहीं है, लक्ष्य की परीक्षा करने पर वही सहृदयजनों के हृदय को आह्लादित करनेवाला काव्यतत्त्व है । उससे दूसरा ही ‘चित्र’ है, यह आगे चलकर दिखायेंगे । लोचनम् वम् । व्यङ्ग्यो वा ध्वन्यत इति व्यापारो वा शब्दार्थयोर्ध्वननमिति’ । कारिकया तु प्राधान्येन समुदाय एव काव्यरूपो मुख्यतया ध्वनिरिति प्रतिपादितम् । विभक्त इति । गुणालङ्काराणां वाच्यवाचकभावप्राणत्वात् । अस्य च तदन्यव्यङ्ग्य- व्यञ्जकभावसारत्वान्नास्य तेष्वन्तर्भाव इति । अनन्यत्र भावो विषयशब्दार्थः । एवं तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति निराकृतम् । लक्षणकृतामेवेति । लक्षण- (इस व्युत्पत्ति के अनुसार) व्यंग्य ‘ध्वनि’ है, और शब्द और अर्थ का व्यापार ‘ध्वननम्’ ( इस व्युत्पत्ति के अनुसार ) ‘ध्वनि’ है । कारिका द्वारा तो प्रधानतया समुदाय¹ ही काव्यरूप मुख्यरूप से ‘ध्वनि’ है, ऐसा प्रतिपादन किया है । विभक्त —। क्योंकि गुण और अलङ्कार का प्राणभूत तत्त्व वाच्यवाचकभाव है, और इस ध्वनि का सार उसके अतिरिक्त व्यंग्यव्यञ्जकभाव है, इसलिए इसका उनमें अन्तर्भाव नहीं है । ‘विषय’² शब्द का अर्थ है अन्यत्र सद्भाव का अभाव । इस प्रकार उन ( गुण और अलङ्कार ) से व्यतिरिक्त यह ‘ध्वनि’ क्या है, इसका निराकरण किया । लक्षणकारों के लिए ही—। १. मूल कारिकाग्रन्थ में जिस काव्य विशेष को ‘ध्वनि’ कहा गया है वह मुख्य रूप से रूढि द्वारा समुदाय रूप ध्वनि है । ‘ध्वनति’, ‘ध्वन्यते’ और ‘ध्वननम्’ शब्द, वाच्य, व्यङ्ग्य और व्यञ्जन इनका समुदाय यहाँ ‘ध्वनि’ है । पहले भी ‘लोचन’ में ध्वनि की व्युत्पत्तियों का निर्देश हो चुका है । २. व्युत्पत्ति के अनुसार ‘विषय’ शब्द का यह अर्थ है कि जो अपने सम्बन्ध के पदार्थ को बांध देता है, सीमित कर देता है ( विशेषण सिनोति बध्नातीति विषयः ) । प्रस्तुत में ध्वनि का भी अपनी सीमा से बाहर सद्भाव नहीं है, अर्थात् वह सीमा में बँधा हुआ है । अतः ध्वनि को उपमा आदि के अन्तर्गत नहीं लाया जा सकता है । उपमा आदि वाच्य और वाचक के चारुत्व के हेतु हैं किन्तु ध्वनि का प्राण व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव है और यहाँ स्वयं यह चारुत्व की प्रतीति है ।

१०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् काराप्रसिद्धता विरुद्धो हेतुः, तत एव हि यत्नेन लक्षणीयता । लक्ष्ये त्वप्रसिद्धत्व- मसिद्धो हेतुः । यच्च नृत्तगीतादिकल्पं, तत्काव्यस्य न किञ्चित् । चित्रमिति । विस्मयकृद्वृत्त्यादिवशात्, न तु सहृदयाभिलषणीयचमत्कारसाररसनिःष्यन्दमय- मित्यर्थः । काव्यानुकारित्वाद्वा चित्रम्, आलेखमात्रत्वाद्वा, कलामात्रत्वाद्वा । अथ इति । लक्षणकारों में अप्रसिद्धतारूप विरुद्ध¹ हेतु है; इसी कारण यत्नपूर्वक ( आचार्य ने ध्वनि को ) लक्षणीय किया है ! लक्ष्य में 'अप्रसिद्धत्व' रूप हेतु असिद्ध है । और जो कि नृत्त, गीत आदि² के समान है, वह काव्य का ( ध्वनि के रूप में लक्षित काव्य का ) कुछ नहीं है । चित्र—। अर्थात् नृत्त³ आदि के कारण विस्मय उत्पन्न करने वाला, न कि सहृदयजनों द्वारा अभिलषणीय चमत्कारसार रसका निष्पन्दमय । काव्य का अनुकरण करनेवाला होने के कारण 'चित्र' है, अथवा आलेखमात्र अथवा कलामात्र होने के कारण ! आगे—। १, पहले ध्वनि के निराकरण के प्रसङ्ग में यह कह चुके हैं कि प्रसिद्ध प्रस्थान ( अर्थात् वह मार्ग जो परम्परा से व्यवहार में आता है, जैसे प्रस्तुत में शब्द-अर्थ तथा उनके गुण और अलङ्कार आदि ) में 'ध्वनि' का निर्देश न होने के कारण उसे काव्य नहीं माना जा सकता । तात्पर्य यह कि ध्वनि इस कारण नहीं है कि वह प्रसिद्ध प्रस्थानों में नहीं आता उन्हें अतिक्रमण करने वाला है, इस प्रकार ध्वनि का विरोध किया गया है । इसी को 'न्याय' की भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं—ध्वनिर्नाम काव्यप्रकारो नास्ति, प्रसिद्धप्रस्थानातिकामित्वात् । इस 'हेतु' के तात्पर्य के रूप में दो बातें प्रतीत होती हैं, एक यह कि प्राचीन अलङ्कार-शास्त्र के लक्षणकारों में यह 'ध्वनि' तत्त्व प्रसिद्ध नहीं था और दूसरी यह कि यह कोई अप्रसिद्ध लक्ष्य था । इन दोनों का निराकरण करते हुये मूल-वृत्ति ग्रन्थ में जैसा कहा है कि लक्षणकारों के लिये ही वह केवल प्रसिद्ध नहीं है, किन्तु लक्ष्य की परीक्षा करने पर वही सहृदयों को आह्लादित करने वाला काव्य तत्त्व है । इस प्रकार 'लक्षणकाराप्रसिद्धता' रूप हेतु विरुद्ध है और 'लक्ष्याप्रसिद्धता' रूप हेतु असिद्ध है । ध्वनि लक्षणकारों के लिये अप्रसिद्ध है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह नहीं है, बल्कि इससे तो यह समझना चाहिये कि वह यत्नपूर्वक लक्षणीय है, क्योंकि वह सिर्फ 'काव्य' नहीं बल्कि 'काव्यविशेष' है । अतः यह हेतु विरुद्ध है । दूसरे यह कहना कि वह लक्ष्य में प्रसिद्ध नहीं, बिलकुल ठीक नहीं, क्योंकि परीक्षा करके लक्ष्य में देखने पर वही सहृदयहृदयाह्लादकारी तत्त्व दिखाई देता है । अतः यह हेतु असिद्ध है । २. जैसे नाटक आदि में शोभा के लिये नृत्त, गीत आदि का आयोजन करते हैं उसी प्रकार यह ध्वनि भी कोई शोभाकारी तत्त्व हो सकता है । जिस प्रकार नृत्त-गीत कवनीय न होने के कारण काव्य नहीं हैं उसी प्रकार ध्वनि भी काव्य नहीं है यह पहले ध्वनि के काव्य के रूप में लक्षित करने के प्रसङ्ग में कह चुके हैं । प्रस्तुत में 'ध्वनि' को 'काव्यविशेष' रूप में सिद्ध करके यह निर्णय कर दिया कि वह एक कवनीय तत्त्व है अतः वह 'काव्य' है । ऐसी स्थिति में उसे नृत्त-गीतादि की समानता की कोटि में नहीं ला सकते हैं, क्योंकि नृत्त-गीत आदि काव्य से कोई सम्बन्ध नहीं रखते, वे सर्वथा कवनीय नहीं हैं और ध्वनि कवनीय है, कवि के व्यापार का विषय है । ३. लोचन में 'वृत्तादि' छपा है, 'बालप्रिया' में 'वृत्त' शब्द से यमक-उपमा आदि का परिग्रह किया है । क्योंकि यमक-उपमा आदि अलङ्कारों के कारण 'विस्मय' होता है । परन्तु 'दिव्याङ्गना'

प्रथम उद्योतः १०७ ध्वन्यालोकः यदप्युक्तम्—'कामनीयकमनतिवर्तमानस्य तस्योक्तालङ्कारादि- प्रकारेष्वन्तर्भावः' इति, तदप्यसमीचीनम्; वाच्यवाचकमात्राश्रयिणि प्रस्थाने व्यङ्ग्यव्यञ्जकसमाश्रयेण व्यवस्थितस्य ध्वनेः कथमन्तर्भावः, वाच्यवाचकचारुत्वहेतवो हि तस्याङ्गभूताः, स त्वङ्गिरूप एवेति प्रति- पादयिष्यमाणत्वात् । जो कि कहा है—'कमनीयता का अतिक्रमण न करने के कारण (विशेष कमनीय न होने के कारण) उस ध्वनि का उक्त अलङ्कार आदि प्रकारों में अन्तर्भाव है।' वह भी समीचीन नहीं। (क्योंकि अलङ्कार आदि) प्रस्थान जब कि एकमात्र वाच्यवाचकभाव पर आश्रित हैं तो उनका ध्वनि, जो व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव का आश्रयण करके व्यवस्थित है, में कैसे अन्तर्भाव होगा ? क्योंकि यह प्रतिपादन करेंगे कि वाच्य और वाचक के चारुत्वहेतु (अलङ्कार आदि) उस (ध्वनि) के अङ्गभूत हैं, और वह (ध्वनि) तो अङ्गी रूप ही है । लोचनम् प्रधानगुणभावाभ्यां व्यङ्ग्यस्यैवं व्यवस्थितम् । द्विधा काव्यं ततोऽन्यद्यत्तच्चित्रमभिधीयते ॥ इति तृतीयोद्द्योते वक्ष्यति । परिकरार्थं कारिकार्थस्याधिकावापं कर्तुं श्लोकः 'इस प्रकार व्यंग्य का प्रधानभाव और गुणभाव के कारण' काव्य दो प्रकार से व्यवस्थित है, उससे जो अतिरिक्त है वह 'चित्र' कहलाता है । यह 'तृतीयोद्योत' में कहेंगे । परिकर के लिए अर्थात् कारिका के अर्थ का अधिक आवाप (अर्थात् कारिका में नहीं कहे गए अधिक अर्थ का प्रक्षेप) करने के लिए जो टिप्पणी में 'वृत्त्यादि' पाठ माना है और 'वृत्ति' शब्द से उपनागरिका आदि का ग्रहण किया है । इस पाठपरिवर्तन का अभिप्राय मैं समझ नहीं पा रहा हूँ । 'वृत्त' के द्वारा अलङ्कारों का ग्रहण करना मुझे ठीक लगता है । क्योंकि चमत्कार या तो रस से होता है या अलङ्कार से । 'चमत्कार विस्मय की ही उत्कृष्ट भूमि है । ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्ग्य के स्थलों में चमत्कार 'रस' के कारण अनुभव में आता है किन्तु जहाँ केवल अलङ्कारों के कारण चमत्कार होता है वह 'विस्मय' का ही एक रूप है अतः विस्मयकारी होने के कारण अलङ्कार-प्रधान काव्य को 'चित्रकाव्य' कहने की परम्परा है । अलङ्कार-प्रधान काव्य को 'चित्र' कहने के और भी कारण हो सकते हैं जैसे वह वस्तुतः काव्य नहीं बल्कि काव्य का अनुकरण करता है । जैसे घोड़े के चित्र वस्तुतः घोड़ा नहीं, किन्तु घोड़े का अनुकरण करता है । इसी प्रकार आलेखमात्र अथवा कलामात्र होने के कारण यह 'चित्र' कहा गया है ।

१०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः

परिकरश्लोकश्चात्र— व्यङ्ग्यव्यञ्जकसम्बन्धनिबन्धनतया ध्वनेः । वाच्यवाचकचारुत्वहेत्वन्तःपातिता कुतः ॥ ननु यत्र प्रतीयमानस्यार्थस्य वैशद्येनाप्रतीतिः स नाम मा भूद् ध्वनेर्विषयः । यत्र तु प्रतीतिरस्ति, यथा—समासोक्त्याक्षेपानुक्त- निमित्तविशेषोक्तिपर्यायोक्तापह्नुतिदीपकसङ्करालङ्कारादौ, तत्र ध्वनेरन्त- र्भावो भविष्यतीत्यादि निराकर्तुमभिहितम्-‘उपसर्जनीकृतस्वार्थौ’ इति । अर्थो गुणीकृतात्मा, गुणीकृताभिधेयः शब्दो वा यत्रार्थान्तर- मभिव्यनक्ति स ध्वनिरिति । तेषु कथं तस्यान्तर्भावः । व्यङ्ग्य- प्राधान्ये हि ध्वनिः । न चैतत्समासोक्त्यादिष्वस्ति । और यहाँ एक परिकर श्लोक है— 'ध्वनि के मूल में व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव के सम्बन्ध के होने के कारण वाच्य और वाचक के चारुत्व के हेतुओं में उसका अन्तर्भाव कैसे हो सकता है ?' जहाँ प्रतीयमान अर्थ की विशदतापूर्वक प्रतीति नहीं होती है वह ध्वनि का विषय मत हो, किन्तु जहाँ प्रतीति है, जैसे—समासोक्ति, आक्षेप, अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति, अपह्नुति, दीपक, सङ्कर आदि में, वहाँ ध्वनि का अन्तर्भाव होगा, इत्यादि (शङ्का) के निवारण के लिए अभिहित किया है—'उपसर्जनीकृतस्वार्थौ ।' अर्थात् अर्थ अपने आपको (आत्मा को) गुणीभूत करके, जहाँ दूसरे अर्थ को अभिव्यक्त करता है वह 'ध्वनि' है । उनमें उसका अन्तर्भाव कैसे हो सकता है ? क्योंकि व्यङ्ग्य अर्थ के प्राधान्य में ध्वनि होता है । और यह समासोक्ति आदि में नहीं है । लोचनम् परिकरश्लोकः । यत्रेत्यलङ्कारे । वैशद्येनेति । चारुतया स्फुटतया चेत्यर्थः । अभिहितमिति । भूतप्रयोग आदौ व्यङ्क्त इत्यस्य व्याख्यातत्वात् । गुणीकृता- त्मेति । आत्मेत्यनेन स्वशब्दस्यार्थो व्याख्यातः । न चैतदिति । व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यम् । प्राधान्यं च यद्यपि ज्ञप्तौ न चकास्ति; 'बुद्धौ तत्त्वावभासिन्याम्' श्लोक होता है वह परिकर श्लोक है । जहाँ—। अलङ्कार में । विशदतापूर्वक—। अर्थात् चारुतापूर्वक और स्फुटतापूर्वक । 'अभिहित' यह 'भूत' प्रयोग है, क्योंकि पहले 'व्यङ्क्तः' ( 'व्यञ्जित करते हैं' ) इसका व्याख्यान किया गया है । गुणीकृतात्मा—। 'आत्मा' द्वारा 'स्व' शब्द का अर्थ व्याख्यान किया है । यह……नहीं है—। व्यंग्य का प्राधान्य (नहीं है )। यद्यपि व्यंग्य का प्राधान्य ज्ञप्ति (ज्ञान) में नहीं भासित होता है, क्योंकि

प्रथम उद्योतः १०९ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः समासोक्तौ तावत्— उपोढरागेण विलोलतारकं तथा गृहीतं शशिना निशामुखम् । यथा समस्तं तिमिरांशुकं तया पुरोऽपि रागाद्गलितं न लक्षितम् ॥ समासोक्ति में—प्रवृद्धराग शशी ने निशा के मुख को इस प्रकार ग्रहण किया कि उस (निशा) ने राग के कारण (सामने = पूर्व दिशा में) ढले हुए पूरे अन्धकार के अंशुक को नहीं लक्षित किया। लोचनम् इति नयेनाखण्डचर्वणाविश्रान्तेः, तथापि विवेचकैर्जीवितान्वेषणे क्रियमाणे यदा व्यङ्ग्योऽर्थः पुनरपि वाच्यमेवानुप्राणयन्नास्ते तदा तदुपकरणत्वादेव तस्यालङ्कारता । ततो वाच्यादेव तदुपस्कृताच्चमत्कारलाभ इति । यद्यपि पर्यन्ते रसध्वनिरस्ति, तथापि मध्यकक्षानिविष्टोऽसौ व्यङ्ग्योऽर्थो न रसोन्मुखीभवति स्वातन्त्र्येण, अपि तु वाच्यमेवार्थं संस्कृतुं धावतीति गुणीभूतव्यङ्ग्यताक्ता । समासोक्ताविति । यत्रोक्तौ गम्यतेऽन्योऽर्थस्तत्समानैर्विशेषणैः । सा समासोक्तिरुदिता संक्षिप्तार्थतया बुधैः ॥ इत्यत्र समासोक्तेर्लक्षणस्वरूपं हेतुर्नाम तन्निर्वचनमिति पादचतुष्टयेन क्रमादुक्तम् । उपोढो रागः सान्ध्योऽरुणिमा प्रेम च येन । विलोलास्तारका ज्योतींषि नेत्रत्रिभागाश्च यत्र । तथेति । झटित्येव प्रेमरभसेन च । गृहीतमाभा- सितं परिचुम्बितुमाक्रान्तं च । निशाया मुखं प्रारम्भो वदनकोकनदं चेति । यथेति । झटिति ग्रहणेन प्रेमरभसेन च । तिमिरं चांशुकञ्च सूक्ष्मंशावस्तिम- 'बुद्धौ तत्त्वावभासिन्याम्' इस न्याय के अनुसार अखण्ड चर्वणा में विश्रान्ति होती है, तथापि विवेचक लोगों द्वारा जीवित (आत्मा) के अन्वेषण किए जाने पर जब व्यंग्य अर्थ फिर भी वाच्य ही को अनुप्राणन करता है तब उस (वाच्य) का उपकरण होने के कारण उसका अलङ्कारत्व माना जाता है। ऐसी स्थिति में, उस व्यंग्य के द्वारा उपस्कृत उस वाच्य से ही चमत्कार का लाभ होता है। यद्यपि पर्यवसान में रसध्वनि है, तथापि बीच वाली कक्षा में पड़ा व्यंग्य अर्थ रस की ओर उन्मुख नहीं होता, बल्कि स्वतन्त्रतापूर्वक वाच्य अर्थ को ही संस्कृत करने के लिए दौड़ लगाता है, इसलिए(उसका) गुणीभूतव्यंग्यत्व कहा है। समासोक्ति में—। जिस उक्ति में अन्य अर्थ (प्रस्तुत से अतिरिक्त अप्रस्तुत अर्थ) समान विशेषणों से प्रतीत होता है उसे विद्वान् लोग संक्षिप्तार्थ होने से समास कहते हैं। यहाँ श्लोक के चार चरणों द्वारा क्रम से समासोक्ति का लक्षण-स्वरूप, हेतु, नाम और उसका निर्वचन (व्युत्पत्ति) बताया गया है। प्रवृद्ध है राग अर्थात् सन्ध्याकाल की लाली और प्रेम जिससे । विलोल (चंचल) तारक अर्थात् तारे और नेत्रत्रिभाग हैं जहाँ । तथा—। झट ही और प्रेम के वेग से। गृहीत (ग्रहण किया) अर्थात् आभासित और

११० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः इत्यादौ व्यङ्ग्येनानुगतं वाच्यमेव प्राधान्येन प्रतीयते समारो- पितनायिकानायकव्यवहारयोर्निशाशशिनोरेव वाक्यार्थत्वात् । इत्यादि ( उदाहरण ) में व्यङ्ग्य से अनुगत वाच्य ही प्राधान्यतः प्रतीत होता है, क्योंकि जिस पर नायिका और नायक के व्यवहारों का आरोप किया गया है ऐसे निशा और शशी ही वाक्यार्थ हैं। लोचनम् रांशुकं रश्मिशबलीकृतं तमःपटलं, तिमिरांशुकं नीलजालिका नवोढाप्रौढवधू- चिता । रागाद्रक्तत्वात् सन्ध्याकृतादनन्तरं प्रेमरूपाच्च हेतोः । पुरोऽपि पूर्वस्यां दिशि अग्रे च । गलितं प्रशान्तं पतितं च । रात्र्या करणभूतया समस्तं मिश्रि- तम्; उपलक्षणत्वेन वा । न लक्षितं रात्रिप्रारम्भोऽसाविति न ज्ञातं, तिमिर- संवलितांशुदर्शने हि रात्रिमुखमिति लोकेन लक्ष्यते न तु स्फुट आलोके । नायिकापक्षे तु तयेति कर्तृपदम् । रात्रिपक्षे तु अपिशब्दो लक्षितमित्यस्यान- न्तरः । अत्र च नायकेन पश्चाद्गतेन चुम्बनोपक्रमे पुरो नीलांशुकस्य गलनं पतनम् । यदि वा ‘पुरोऽग्रे नायकेन तथा गृहीतं मुखमि’ति सम्बन्धः । तेनात्र व्यङ्ग्ये प्रतीतेऽपि न प्राधान्यम् । तथाहि नायकव्यवहारो निशाशशिनावेव परिचुम्बन के लिए आक्रान्त । निशा का मुख अर्थात् प्रारम्भ और मुख-कमल । यथा—। झट पकड़ लेने से और प्रेम के वेग से । तिमिर और अंशुक ( चन्द्र की सूक्ष्म किरणें ) । तिमिरांशुक अर्थात् रश्मि से मिला-जुला अन्धकार-पटल, तिमिरांशुक अर्थात् नवोढा प्रौढवधू द्वारा पहनी हुई नीली साड़ी । राग अर्थात् सन्ध्या की लाली के कारण और प्रेमरूप राग के कारण । 'पुरोऽपि'—पूर्व दिशा में, और सामने । गलित अर्थात् प्रशान्त और पतित ( ढला हुआ ) । रात्रि करणभूत रात्रि द्वारा समस्त अर्थात् मिश्रित, अथवा उपलक्षण के रूप में रात्रि से । नहीं लक्षित किया—। यह रात्रि का प्रारम्भ है यह नहीं जाना, क्योंकि अन्धकार से मिश्रित किरणों को देखने पर ही 'रात्रिमुख' को लोग लक्षित करते हैं—समझते हैं, न कि स्फुट आलोक में । नायिका-पक्ष में 'तया' ( उसने ) यह कर्तृपद है । रात्रिपक्ष में 'अपि' ( भी ) शब्द 'लक्षितम्' के बाद है । यहाँ पीछे की ओर से पहुँचे हुए नायक के द्वारा चुम्बन का उपक्रम किए जाने पर सामने नीलांशुक का गलन या पतन है । यदि वा, 'आगे नायक ने उस प्रकार मुख को पकड़ा' यह सम्बन्ध करते हैं, ऐसी स्थिति में यहाँ व्यंग्य के प्रतीत होने पर भी उसका प्राधान्य नहीं बनेगा । क्योंकि नायक का व्यवहार शृंगार के विभावरूप निशा और शशी को ही उपस्कृत करता हुआ अलङ्कारभाव को प्राप्त कर रहा है, तब तो विभावीभूत वाच्य से रसनिष्यन्द होगा । जिसने व्याख्यान किया है—'तया निशया' यह कर्तृपद है, निशा के अचेतन होने के कारण उसका कर्तृत्व बन नहीं सकता, इस प्रकार यहाँ शब्द ही के द्वारा नायक का व्यवहार उन्नीत होने से अभिधेय ही है न कि व्यंग्य,

प्रथम उद्योतः १११ ध्वन्यालोकः आक्षेपेऽपि व्यङ्ग्यविशेषाक्षेपिणोऽपि वाच्यस्यैव चारुत्वं प्राधान्येन वाक्यार्थ आक्षेपोक्तिसामर्थ्यादेव ज्ञायते । तथाहि—तत्र शब्दोपारूढो विशेषाभिधानेच्छया प्रतिषेधरूपो य आक्षेपः स एव व्यङ्ग्यविशेषमाक्षि- पन्मुख्यं काव्यशरीरम् । ‘आक्षेप’ अलङ्कार में भी व्यङ्ग्यविशेष का आक्षेप करने वाले वाच्य अर्थ की ही चारुता है, प्राधान्यतः वाक्यार्थ आक्षेपोक्ति की सामर्थ्य से ही जाना जाता है । जैसा कि—विशेष बात कहने की इच्छा से शब्द द्वारा वाच्य जो प्रतिषेध रूप आक्षेप है वही व्यङ्ग्य विशेष को व्यञ्जित करता हुआ मुख्य काव्यशरीर है । लोचनम् शृङ्गारविभावरूपौ संस्कुर्वाणोऽलङ्कारतां भजते, ततस्तु वाच्याद्विभावीभूताद्र- सनिःष्यन्दः । यस्तु व्याचष्टे—'तया निशयेति कर्तृपदं, न चाचेतनायाः कर्तृ- त्वमुपपन्नमिति शब्देनैवात्र नायकव्यवहार उन्नीतोऽभिधेय एव, न व्यङ्ग्य इत्यत एव समासोक्तिः' इति । स प्रकृतमेव ग्रन्थार्थमत्यजद्व्यङ्ग्येनानुगत- मिति । एकदेशविवर्ति चेत्थं रूपकं स्यात्, 'राजहंसैरवीज्यन्त शरदैव सरोनृपाः' इतिवत्, न तु समासोक्तिः; तुल्यविशेषणाभावात् । गम्यत इति चानेनाभि- धाव्यापारनिरासादित्यलमवान्तरेण बहुना । नायिकाया नायके यो व्यवहारः स निशायां समारोपितः; नायिकायां नायकस्य यो व्यवहारः स शशिनि समा- रोपित इति व्याख्याने नैकशेषप्रसङ्गः । आक्षेप इति । अतएव समासोक्ति है ।' उस ( व्याख्याता ) ने 'व्यंग्येनानुगतम्' यह प्रस्तुत अर्थ छोड़ दिया है । इस प्रकार 'एकदेशविवर्ति' रूपक होगा, जैसा कि—'सरोवररूपी राजे राजहंसरूपी शरत्काल द्वारा हवा दिए गए ।' समासोक्ति नहीं है, क्योंकि समान विशेषण नहीं है । समासोक्ति में 'गम्यते' ( प्रतीत होता है' ) इस पद का प्रयोग करके अभिधा व्यापार का निराकरण किया है । यह बहुत अवान्तर चर्चा व्यर्थ है ! नायिका का नायक में जो व्यवहार है उसका निशा में समारोप किया है और जो व्यवहार नायिका में नायक का है उसका शशी में समारोप किया है, इस प्रकार व्याख्यान करने पर एकशेष' का प्रसंग नहीं उपस्थित होगा । आक्षेप—। १. स्वयं लोचनकार ने प्रस्तुत 'समासोक्ति' के उदाहरण 'उपोढरागेण' का विशद व्याख्यान प्रस्तुत कर दिया है । यहाँ वृत्तिग्रन्थ में 'नायिका और नायक' जो कहा गया है वहाँ पाणिनि के 'पुमान् स्त्रिया' इस नियम के अनुसार एकशेष होना चाहिए यह शङ्का उपस्थित होती है मतलब यह कि 'नायक' कह देने मात्र से स्वतः नायिका का भी ग्रहण हो सकता था । इस शङ्का के समाधान में आचार्य अभिनवगुप्त ने इस प्रकार व्याख्यान किया है दोनों के उल्लेख की आवश्यकता हो जाती है। उनका कहना है कि कवि ने नायिका के नायक में नीलांशुक के गलन को लक्षित न करने आदि व्यवहार ( व्यापार ) को निशा में आरोपित किया है और नायिका में नायक के

११२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया । वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः ॥ तत्राद्यौ यथा— अहं त्वां यदि नेक्षेय क्षणमप्युत्सुका ततः । इयद्देवास्त्वतोऽन्येन किमुक्तेनाप्रियेण ते ॥ इति वक्ष्यमाणमरणविषयो निषेधात्माक्षेपः । तत्रेयदस्त्वित्येतदेवात्र म्रिये इत्याक्षिप्तच्चारुत्वनिबन्धनमित्याक्षेपेणाक्षेपकमलङ्कृतं सत्प्रधानम् । उक्तवि- षयस्तु यथा ममैव— भो भोः किं किमकाण्ड एव पतितस्त्वं पान्थ कान्‍या गति- स्तत्तादृक्तृषितस्य मे खलमतिः सोऽयं जलं गूहते । अस्थानोपनतामकालसुलभां तृष्णां प्रति क्रुध्य भो- स्त्रैलोक्यप्रथितप्रभावमहिमा मार्गः पुनर्मारवः ॥ अत्र कश्चित्सेवकःप्राप्तः प्राप्तव्यमस्मात्किमिति न लभ इति प्रत्याशाविशास्य- मानहृदयः केनचिदमुनाक्षेपेण प्रतिबोध्यते । तत्राक्षेपेण निषेधरूपेण विशेष कथन की इच्छा से इष्ट वस्तु का प्रतिषेध-सा किया जाय तो वह 'वक्ष्यमाण- विषय' और 'उक्तविषय' के भेद से दो प्रकार का 'आक्षेप' होता है । उसमें पहला जैसे— 'यदि उत्सुक मैं क्षण भर भी तुझे न देखूँ तब···इतना ही रहने दो, इसके बाद की दूसरी तेरी अप्रिय बात कहने से क्या लाभ ?' यह वक्ष्यमाण मरणविषय निषेधरूप आक्षेप है । 'इतना रहने दो' केवल यही यहाँ 'मर जाऊँगी' इस बात को आक्षिप्त ( व्यञ्जित ) करता हुआ चारुत्व का निबन्धन ( आधार ) है । इस प्रकार आक्षेप्य द्वारा आक्षेपक अलंकृत होता हुआ प्रधान ठहरता है । 'उक्तविषय', जैसे मेरा ही— 'हे हे पथिक ! तुम क्यों गलत जगह में आ पहुँचे ?' 'मुझे ऐसी प्यास ही लगी है, मैं क्या करता ?' यह दुष्ट मार्ग तो जल को छिपा लेता है !' अरे गलत जगह में उत्पन्न हुई अकाल सुलभ मेरी तृष्णा के प्रति क्रोध करो, अन्यथा ( किसे नहीं मालूम कि ) यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध प्रभाव और महिमा वाला मरु का मार्ग है ( यहाँ जल की आशा व्यर्थ है ) ।' यहाँ कोई सेवक अपने मालिक के पास पहुँचा है, इस प्रत्याशा से कि क्यों नहीं इससे वह अपने प्राप्तव्य का लाभ करेगा ? उसका हृदय विश्वास कर रहा है, तभी कोई उसे इस 'आक्षेप' के द्वारा प्रतिबोधन करता है । वहाँ निषेधरूप आक्षेप के द्वारा मुखचुम्बनादि व्यापार को शशी में आरोपित किया है । यदि एकशेष कर दिया जायगा तब इस प्रकार नायिका और नायक के शशी और निशा में व्यवहार के समारोपण का स्पष्टीकरण नहीं हो सकेगा ।

प्रथम उद्योतः ११३ लोचनम् वाच्यस्यैवासत्पुरुषसेवा तद्वैफल्यतत्कृतोद्वेगात्मनः शान्तरसस्थायिभूतनिर्वेद- विभावरूपतया चमत्कृतिदायित्वम् । वामनस्य तु 'उपमानाक्षेपः' इत्याक्षेपलक्ष- णम् । उपमानस्य चन्द्रादेश्चाक्षेपः; अस्मिन्सति किं त्वया कृत्यमिति । यथा— तस्यास्तन्मुखमस्ति सौम्यसुभगं किं पार्वणेनेन्दुना सौन्दर्यस्य पदं दृशौ यदि च तैः किं नाम नीलोत्पलैः । किं वा कोमलकान्तिभिः किसलयैः सत्येव तत्राधरे ही धातुः पुनरुक्तवस्तुरचनारम्भेष्वपूर्वो ग्रहः ॥ अत्र व्यङ्ग्योऽप्युपमार्थो वाच्यस्यैवोपस्कुरुते । किं तेन कृत्यमिति त्वप- हस्तनारूप आक्षेपो वाच्य एव चमत्कारकारणम् । यदि वोपमानस्याक्षेपः सामर्थ्यादाकर्षणम् । यथा— ऐन्द्रं धनुः पाण्डुपयोधरेण शरद्घनाद्र्रनखक्षताभम् । असत्पुरुष की सेवा और उसके वैफल्य तथा उससे उत्पन्न उद्वेगरूप वाच्य का शान्तरस के स्थायीभाव निर्वेद के (उद्दीपक) विभाव होने के कारण चमत्कृतिकारित्व १ है । परन्तु वामन का 'आक्षेप' लक्षण 'उपमान का आक्षेप' है । उपमान चन्द्र आदि का आक्षेप, इसके रहते तुझसे क्या होगा ? जैसे— 'सौम्य एवं सुभग उस रमणी का वह मुख विद्यमान है तो पूर्णिमा के चन्द्र से क्या ? यदि सौन्दर्य का स्थानभूत उसकी आँखें हैं तब उन नीले कमलों से क्या ? वहाँ उसके अधर के रहते कोमल कान्ति वाले किसलयों से क्या ? ओह ! एक वस्तु के बाद पुनः उसी के समान दूसरी वस्तु के निर्माण में विधाता का अपूर्व आग्रह है !' यहाँ उपमारूप अर्थ व्यंग्य होता हुआ भी वाच्य का ही उपस्कारक है । 'उससे क्या काम ?' यह 'अपहस्तना' (निराकरण) रूप 'आक्षेप' वाच्य होकर ही चमत्कार का कारण है । अथवा यदि उपमान का आक्षेप अर्थात् '(अर्थ की) सामर्थ्य से आकर्षण' है । जैसे— 'अपने पाण्डु वर्ण वाले पयोधर (मेघ, पक्ष में स्तन) से गीले नखक्षत की भाँति १. पहले प्रस्तुत उदाहरण के मूल स्वरूप पर विचार कर लेना चाहिए । इसका दूसरा चरण, जैसा कि 'तत्तादृक् तृषितस्य मे खलमतेः सोऽयं जलं गूहते' मुद्रित है, अर्थ होगा 'उस प्रकार मुझ प्यासे की और दूसरी गति क्या हो सकती है ?' यह दुष्ट मति का (मार्ग अथवा व्यक्ति) जल को छिपा लेता है । किन्तु 'बालप्रिया' में इस चरण के अन्य पाठभेद को मानकर कि 'भे खल ! सृतिः सेयं' अर्थात् रे दुष्ट पथिक ! मुझ प्यासे के लिए और दूसरी गति क्या है ?' 'यह मार्ग (सृति) जल को छिपा लेता है।' व्याख्या किया है । मैंने इन दोनों पाठों से कुछ मिलता-जुलता अर्थ किया है । यहाँ असत्पुरुष की सेवा की विफलता वाच्य हो रही है और शान्तरस व्यङ्ग्य है । 'अस्थान में पहुँचने से इष्ट का लाभ होनेवाला नहीं' इस 'आक्षेप' से वाच्य की शोभा हो रही है । चमत्कार के कम-वेश होने पर ही अप्रधानता और प्रधानता का निर्णय होता है यह सिद्धान्त मूल वृत्तिग्रन्थ में, इसी प्रसंग में आचार्य ने निर्देश कर दिया है । इस उदाहरण में 'आक्षेप' का विषय उक्त है । ८ ध्व०

११४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः चारुत्वोत्कर्षनिबन्धना हि वाच्यव्यङ्ग्ययोः प्राधान्यविवक्षा। यथा— अनुरागवती सन्ध्या दिवसस्तत्पुरस्सरः। अहो दैवगतिः कीदृक्तथापि न समागमः॥ अत्र सत्यामपि व्यङ्ग्यप्रतीतौ वाच्यस्यैव चारुत्वमुत्कर्षवदिति तस्यैव प्राधान्यविवक्षा। क्योंकि, वाच्य और व्यङ्ग्य के प्राधान्य की विवक्षा चारुत्व के उत्कर्ष के आधार पर होती है। जैसे— सन्ध्या (नायिका) अनुराग (सन्ध्याकालीन लाली, अथवा प्रेम) से भरी है और दिवस (नायक) उसके सामने सरक रहा है। अहो, दैव की गति वैसी है कि तब भी समागम नहीं होता। यहाँ व्यङ्ग्य की प्रतीति होने पर भी वाच्य का ही चारुत्व उत्कर्षयुक्त है, अतः उसीके प्राधान्य की विवक्षा है। लोचनम् प्रसादयन्ती सकलङ्कमिन्दुं तापं रवेरभ्यधिकं चकार॥ इत्यत्रेर्ष्याकलुषितनायकान्तरमुपमानमाक्षिप्तमपि वाच्यार्थमेवालङ्करोती- त्येषा तु समासोक्तिरेव। तदाह—चारुत्वोत्कर्षेति। अत्रैव प्रसिद्धं दृष्टान्तमाह— अनुरागवतीति। तेनाक्षेपप्रमेयसमर्थनमेवापरिसमाप्तमिति मन्तव्यम्। तत्रोदा- हरणत्वेन समासोक्तिश्लोकः पठितः। अहो दैवगतिरिति। गुरुपारतन्त्र्यादि- निमित्तोऽसमागम इत्यर्थः। तस्यैवेति। वाच्यस्यैवेति यावत्। वामनाभिप्राये- इन्द्र-धनुष को धारण किए हुई और सकलंक चन्द्रमा को प्रसन्न करती हुई शरद् ने सूर्य के ताप को बढ़ा दिया।¹ यहाँ ईर्ष्या से कलुषित अन्य 'नायकरूप उपमान आक्षिप्त होकर भी वाच्यार्थ को ही अलंकृत करता है। इस प्रकार यह तो 'समासोक्ति' ही है। जैसा कि कहा है— चारुत्व के उत्कर्ष—। यहीं पर प्रसिद्ध दृष्टान्त को कहते हैं—सन्ध्या अनुराग से—। इसलिए यह मानना चाहिए कि 'आक्षेप' अलङ्कार के प्रमेय (उदाहरण) का समर्थन अभी पूरा समाप्त नहीं हुआ है। वहाँ उदाहरण के रूप में 'समासोक्ति' का श्लोक पढ़ा है। अहो दैवगतिः—। अर्थात् गुरुजनों की परतन्त्रता आदि के कारण समागम नहीं होता। उसी के—मतलब कि वाच्य की ही। वामन के अभिप्राय से यह 'आक्षेप' १. शरद् नायिका है और चन्द्र उसका प्रिय नायक। सूर्य उसका ईर्ष्यालु नायक है। यह नायक-नायिका व्यवहार यहाँ जो श्लिष्ट प्रयोगों से व्यञ्जित हो रहा है उससे वाच्य की शोभा ही

प्रथम उद्योतः ११५ ध्वन्यालोकः यथा च दीपकापह्नुत्यादौ व्यङ्ग्यत्वेनोपमायाः प्रतीतावपि प्राधान्येनाविवक्षितत्वान्न तया व्यपदेशस्तद्वदत्रापि द्रष्टव्यम् । और, जैसे दीपक, अपह्नुति आदि में व्यङ्ग्य रूप से उपमा की प्रतीति होने पर भी प्राधान्यतः विवक्षित न होने के कारण उससे व्यपदेश नहीं होता, उसी प्रकार यहाँ भी देखना चाहिए । लोचनम् णायमाक्षेपः, भामहाभिप्रायेण तु समासोक्तिरित्यमुमाशयं हृदये गृहीत्वा समासोक्त्याक्षेपयोः युक्त्येदमेकमेवोदाहरणं व्यतरद् ग्रन्थकृत् । एषापि समासोक्तिर्वाऽस्तु आक्षेपो वा, किमनेनास्माकम् । सर्वथालङ्कारेषु व्यङ्ग्यं वाच्ये गुणीभवतीति नः साध्यमित्यत्राशयोऽत्र ग्रन्थेऽस्मद्गुरुभिर्निरूपितः । एवं प्राधान्यविवक्षायां दृष्टान्तमुक्त्वा व्यपदेशोऽपि प्राधान्यकृत एव भवतीत्यत्र दृष्टान्तं स्वपरप्रसिद्धमाह—यथा चेति । उपमाया इति । उपमानो- पमेयभावस्येत्यर्थः तयेत्युपमया । दीपके हि 'आदिमध्यान्तविषयं त्रिधा दीपकमिष्यते' इति लक्षणम् । मणिः शाणोल्लीढः समरविजयी हेतिदलितः कलाशेषश्चन्द्रः सुरतमृदिता बालललना । मदक्षीणो नागः शरदि सरिदाश्यानपुलिना तनिम्ना शोभन्ते गलितविभवाश्चार्थिषु जनाः ।। है, किन्तु 'भामह' के अभिप्राय से समासोक्ति है, इस आशय को हृदय में रखकर ग्रन्थकार ने युक्ति से समासोक्ति और आक्षेप का यह एक ही उदाहरण दिया है । यह 'समासोक्ति' हो अथवा आक्षेप, इससे हमें क्या ? सर्वथा हमारा साध्य यह है कि अलङ्कारों में व्यंग्य वाच्य में गुणीभूत होकर रहता है—इस आशय को इस ग्रन्थ में हमारे गुरुदेव ने निरूपण किया है । इस प्रकार प्राधान्य की विवक्षा के सम्बन्ध में दृष्टान्त कहकर व्यपदेश ( नाम का व्यवहार ) भी प्राधान्य के कारण ही होता है, इसका यहाँ अपने और दूसरे के अनुसार प्रसिद्ध दृष्टान्त देते हैं—और जैसे—। उपमा की—। अर्थात् उपमानोपमेयभाव की । उससे—। अर्थात् उपमा से । 'दीपक' में, 'आदिविषय, मध्यविषय और अन्तविषय के भेद से तीन प्रकार का दीपक होता है' यह लक्षण है । शान पर निखारा हुआ मणि, शस्त्रों के प्रहार से आहत समरविजयी वीर, एक कलामात्र शेषवाला चन्द्र, सुरत के प्रसंग में मसली हुई बालललना, क्षीण मद वाला रहीं हैं। इस प्रकार वामन के पक्ष से यहाँ 'आक्षेप' है किन्तु भामह के मान्य मत के अनुसार 'समासोक्ति' है। वामन का लक्षण सर्वमान्य नहीं हो सका ।

११६ सलोचन-ध्वन्यालोकः

लोचनम्
इत्यत्र दीपनकृतमेव चारुत्वम्। 'अपह्नुतिरभीष्टस्य किञ्चिदन्तर्ग॑तोपमा'
इति। तत्रापह्नुत्यैव शोभा। यथा—
नेयं विरौति भृङ्गाली मदेन मुखरा मुहुः।
अयमाकृष्यमाणस्य कन्दर्पधनुषो ध्वनिः।। इति।
एवमाक्षेपं विचार्योद्देशकमेणैव प्रमेयान्तरमाह-अनुक्तनिमित्तायामिति।
एकदेशस्य विगमे या गुणान्तरसंस्तुतिः।
विशेषप्रथनायासौ विशेषोक्तिरिति स्मृता॥
यथा—
स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमयुधः।
हरतापि तनुं यस्य शम्भुना न हृतं बलम्॥
इयं चाचिन्त्यनिमित्तेति नास्यां व्यङ्ग्यस्य सद्भावः। उक्तनिमित्तायामपि
वस्तुस्वभावमात्रत्वे पर्यवसानमिति तत्रापि न व्यङ्ग्यसद्भावशङ्का। यथा—
कर्पूर इव दग्धोऽपि शक्तिमान् यो जने जने।
नमोऽस्त्ववार्यवीर्याय तस्मै कुसुमधन्वने॥
हाथी, शरत्काल में सूखे पुलिन वाली सरिता और याचकों को दान देकर क्षीण धन वाले
लोग अपनी कृशता से शोभित होते हैं।
यहाँ चारुत्व दीपन—(अनेक में एक धर्म का अन्वयरूप दीपन—) कृत है।
'अभीष्ट (अर्थात् वर्ण्यविषय) का निषेध, जिसमें उपमा व्यंग्य होती हो, अपह्नुति
कहलाता है।' वहाँ अपह्नुति (निषेध) से ही शोभा होती है। जैसे—
'यह मदमुखर भ्रमर-पङ्क्ति बार-बार नहीं गुञ्जार कर रही है, बल्कि यह खींचे हुए
कामदेव के धनुष की आवाज है।'
इस प्रकार 'आक्षेप' का विचार करके निर्दिष्ट क्रम के अनुसार ही प्रमेयान्तर को
कहते हैं—अनुक्तनिमित्ता—।
'एकदेश के न रहने पर, कुछ अतिशय बात के ख्यापन के लिए जो गुणान्तर का
कथन होता है उसे 'विशेषोक्ति' कहते हैं।'
जैसे—
'वह फूल को बाणों वाला कामदेव अकेले ही तीनों जगत् पर विजय प्राप्त करता
है, जिसके शरीर को नष्ट करते हुए भी शिवजी ने बल को नष्ट नहीं किया।
यह विशेषोक्ति अचिन्त्यनिमित्ता है (क्योंकि शरीर के हरण होने पर भी बल के
हरण न होने का कारण नहीं कहा जा सकता)। इसलिए इसमें व्यंग्य का सद्भाव नहीं
है। 'उक्तनिमित्ता' (अर्थात् जिस विशेषोक्ति में निमित्त या कारण का कथन किया
गया होता है) में भी वस्तु के स्वभावमात्र में पर्यवसान हो जाता है, इसलिए वहाँ भी
व्यंग्य के सद्भाव की शंका नहीं। जैसे—
'कपूर के समान जला हुआ भी जो जन-जन में शक्तिमान् है उस फूलों के धनुषवाले
अवार्यवीर्य कामदेव के लिए नमस्कार है।'

प्रथम उद्योतः ११७ ध्वन्यालोकः अनुक्तनिमित्तायामपि विशेषोक्तौ— आहूतोऽपि सहायैर्रोमित्युक्त्वा विमुक्तनिद्रोऽपि । गन्तुमना अपि पथिकः सङ्कोचं नैव शिथिलयति ॥ इत्यादौ व्यङ्ग्यस्य प्रकरणसामर्थ्यात्प्रतीतिमात्रं न तु तत्प्रतीति- निमित्ता काचिच्चारुत्वनिष्पत्तिरिति न प्राधान्यम्। पर्यायोक्तेऽपि यदि अनुक्तनिमित्ता ‘विशेषोक्ति’ में भी— 'अपने साथियों द्वारा पुकारे जाने पर भी, 'हाँ' कहकर नींद छोड़ देने पर भी एवं जाने की इच्छा रखता हुआ भी पथिक अधिक संकोच को शिथिल नहीं करता है।' इत्यादि (उदाहरण) में प्रकरण की सामर्थ्य से व्यङ्ग्य की प्रतीतिमात्र हो जाती है, न कि उस प्रतीति के कारण कोई चारुत्व की निष्पत्ति होती है अतः (व्यङ्ग्य का) प्राधान्य नहीं है। 'पर्यायोक्त' में भी यदि प्राधान्यतः व्यङ्ग्य है तो उसका 'ध्वनि' में लोचनम् तेन प्रकारद्वयमवधीर्य तृतीयं प्रकारमाशङ्कते—अनुक्तनिमित्तायामपीति। व्यङ्ग्यस्येति। शीतकृता खल्वार्तिरत्र निमित्तमिति भट्टोद्भटः, तदभिप्रायेणाह- न त्वत्र काचिच्चारुत्वनिष्पत्तिरिति। यत्तु रसिकैरपि निमित्तं कल्पितम्-‘कान्ता- समागमे गमनादपि लघुतरमुपायं स्वप्नं मन्यमानो निद्रागमबुद्ध्या सङ्कोचं नात्यजत्' इति तदपि निमित्तं चारुत्वहेतुतया नालङ्कारविद्भिः कल्पितम्, अपि तु विशेषोक्तिभाग एव न शिथिलयतीत्येवम्भूतोऽभिव्यज्यमाननिमित्तोपस्कृत- श्चारुत्वहेतुः। अन्यथा तु विशेषोक्तिरेवेयं न भवेत्। एवमभिप्रायद्वयमपि साधारणोक्त्या ग्रन्थकृन्न्यरूपयन्न त्वौद्भटेनैवाभिप्रायेण ग्रन्थो व्यवस्थित इति मन्तव्यम्। पर्यायोक्तेऽपीति— (यहाँ 'अवार्यवीर्यं' इस निमित्त का कथन है, अतः यह 'उक्तनिमित्ता' है)। अतः (विशेषोक्ति के इन) दोनों प्रकारों को छोड़कर तीसरे प्रकार की आशङ्का करते हैं—अनुक्तनिमित्ता में भी—। व्यङ्ग्य की—। 'भट्ट उद्भट' के अनुसार 'यहाँ शीत के कारण कष्ट निमित्त है।' इस अभिप्राय से कहते हैं—न कि उस व्यङ्ग्य की प्रतीति के कारण कोई चारुत्व की निष्पत्ति होती है—। जो कि रसिक जनों ने भी (यहाँ) 'निमित्त' की कल्पना की है, कि—'कान्ता के समागम के लिए गमन करने से भी लघुतर (शीघ्रतर) उपाय स्वप्न को मानते हुए पथिक ने, जिससे कि नींद लग जाय, इस बुद्धि से, सङ्कोच नहीं छोड़ा।' इस निमित्त को भी अलङ्कारज्ञों ने चारुत्वहेतु के रूप में नहीं स्वीकार किया है, बल्कि अभिव्यक्त होते हुए निमित्त के द्वारा उपस्कृत नहीं होता 'नहीं शिथिल करता है' इस प्रकार का विशेषोक्ति-अंश ही चारुत्व का हेतु है। अन्यथा, यह विशेषोक्ति ही न होगी। इस प्रकार (उद्भट और रसिकों के) दो अभिप्रायों को ग्रन्थकार ने सामान्य उक्ति ('व्यङ्ग्य की' यह उक्ति) द्वारा निरूपण

११८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्राधान्येन व्यङ्ग्यत्वं तद्भवतु नाम तस्य ध्वनावन्तर्भावः । न तु ध्वने- अन्तर्भाव हो भी जाय, परन्तु ध्वनि का उसमें अन्तर्भाव नहीं होगा । क्योंकि उसका लोचनम् पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते । वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां शून्येनावगमात्मना ।। इति लक्षणम् । यथा— शत्रुच्छेददृढेच्छस्य मुनेरुत्पथगामिनः । रामस्यानेन धनुषा देशिता धर्मदेशना ।। इति । अत्र भीष्मस्य भार्गवप्रभावाभिभावी प्रभाव इति यद्यपि प्रतीयते, तथापि तत्सहायेन देशिता धर्मदेशनेत्यभिधीयमानेनैव काव्यार्थोऽलंकृतः । अत एव पर्यायेण प्रकारान्तरेणावगमात्मना व्यङ्ग्येनोपलक्षितं सद्यदभिधीयते तदभिधी- यमानमुक्तमेव सत्पर्यायोक्तमित्यभिधीयत इति लक्षणपदम्, पर्यायोक्तमिति लक्ष्यपदम्, अर्थालङ्कारत्वं सामान्यलक्षणं चेति सर्वं युज्यते । यदि त्वभिधीयत इत्यस्य बलाद्व्याख्यानमभिधीयते प्रतीयते प्रधानतयेति, उदाहरणं च 'भम धम्मिअ' इत्यादि, तदालङ्कारत्वमेव दूरे सम्पन्नमात्मतायां पर्यवसानात् । तदा चालङ्कारमध्ये गणना न कार्या । भेदान्तराणि चास्य वक्तव्यानि । तदाह— यदि प्राधान्येनेति । ध्वनाविति । आत्मन्यन्तर्भावादात्मैवासौ नालङ्कारस्स्यादि- किया है, न कि उद्भट के ही अभिप्राय से ग्रन्थ व्यवस्थित है, ऐसा मानना चाहिए । 'जो प्रकारान्तर से अभिधान किया जाता है, अर्थात् और वाचक के व्यापारों से रहित, व्यञ्जन रूप व्यापार से जो कहा जाता है वह पर्यायोक्त ( अलङ्कार ) है ।' यह लक्षण है । जैसे—'शत्रु के विनाश की दृढ़ इच्छा वाले, उन्मार्गगामी मुनि ( परशुराम ) को ( भीष्म के ) इस धनुष ने धर्म-पालन की शिक्षा दी ।' यहाँ यद्यपि भीष्म का भार्गव-परशुराम के प्रभाव को अभिभूत करने वाला प्रभाव प्रतीत होता है, तथापि उस ( प्रतीयमानार्थ ) की सहायता से 'धर्म-पालन की शिक्षा दी' इस अभिधीयमान ( वाच्यार्थ ) से ही काव्यार्थ अलङ्कृत है । अत एव पर्याय अर्थात् प्रकारान्तर से अवगम रूप व्यङ्ग्य से उपलक्षित होकर जो अभिहित होता है वह अभिधीयमान उक्त ही होकर 'पर्यायोक्त' कहलाता है, यह लक्षण-पद है, एवं 'पर्यायोक्त' यह लक्ष्य-पद है । और इसका अर्थालङ्कारत्व रूप अलङ्कार का सामान्य लक्षण है । यह सब कुछ उसमें लग जाता है । यदि—'अभिधीयते' ( 'अभिहित होता है' ) इसका बलाद् व्याख्यान 'प्रधान रूप से प्रतीत होता है, यह करते हैं, और 'भम धम्मिअ' इत्यादि का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तब इसका अलङ्कारत्व ही दूर हट जायगा, क्योंकि 'आत्मा' के रूप में इसका पर्यवसान होगा । तब अलङ्कारों के बीच गणना न होगी । इसके भेदान्तर भी कहे जायेंगे । इसे कहते हैं—यदि प्रधान रूप से— । ध्वनि में— । अर्थात् आत्मा में अन्तर्भाव होने से वह आत्मा ही होगा,

प्रथम उद्योतः ११५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः स्तरान्तर्भावः । तस्य महाविषयत्वेनाङ्गित्वेन च प्रतिपादयिष्यमाण- त्वात् । न पुनः पर्यायो भामहोदाहृतसदृशे व्यङ्ग्यस्यैव प्राधान्यम् । वाच्यस्य तत्रोपसर्जनीभावेनाविवक्षितत्वात् । महाविषय रूप एवं अङ्गीरूप से प्रतिपादन करेंगे । ऐसा नहीं कि जैसा भामह ने जिस 'पर्यायोक्त' को कहा है उसके सदृश पर्यायोक्त में व्यङ्ग्य का ही प्राधान्य है, क्योंकि वहाँ वाच्य के उपसर्जनीभाव ( गुणीभाव ) की विवक्षा नहीं की गयी है । लोचनम् त्यर्थः । तत्रेति । यादृशोऽलङ्कारत्वेन विवक्षितस्तादृशे ध्वनिर्नान्तर्भवति, न तादृगस्माभिर्ध्वनिरुक्तः । ध्वनिहिं महाविषयः सर्वत्र भावाव्यापकः समस्तप्र- तिष्ठास्थानत्वाच्चाङ्गी । न चालङ्कारो व्यापकोऽन्यालङ्कारवत् । न चाङ्गी, अलङ्कार्यतन्त्रत्वात् । अथ व्यापकत्वाङ्गित्वे तस्योपगम्येते, त्यज्यते चालङ्का- रता, तर्ह्यस्मन्नय एवायमवलम्ब्यते केवलं मात्सर्यग्रहात्पर्यायोक्तवाचेति भावः । न चेयदपि प्राक्तनैर्दृष्टमपि त्वस्माभिरेवोन्मीलितमिति दर्शयति-न पुनरिति । भामहस्य यादृक्तदीयं रूपमभिमतं तादृगुदाहरणेन दर्शितम् । तत्रापि नैव व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यं चारुत्वाहेतुत्वात् । तेन तदनुसारितया तत्सदृशं यदुदाहर- णान्तरमपि कल्प्यते तत्र नैव व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यमिति सङ्गतिः । यदि तु तदुक्तमुदाहरणमनादृत्य 'भम धम्मिअ' इत्याद्युदाह्रियते, तदस्म- च्छिष्यतैव । केवलं तु नयमनवलम्ब्यापह्नवशेनात्मसंस्कार इत्यनार्यचेष्टितम् । अलङ्कार नहीं । वहाँ— । अलङ्कार के रूप में जैसा विवक्षित है वैसे में ध्वनि का अन्तर्भाव नहीं होगा, हमने उस प्रकार 'ध्वनि' को नहीं कहा है । क्योंकि 'ध्वनि' महाविषय है, सर्वत्र होने से व्यापक और सबका प्रतिष्ठान ( आधार ) होने से अङ्गी है । अलङ्कार दूसरे अलङ्कारों की तरह व्यापक नहीं है और अङ्गी भी नहीं है, क्योंकि वह अपने अलङ्कार्य के अधीन होता है। अगर उस ( अलङ्कार ) का व्यापकत्व एवं अङ्गत्व मानते हैं और अलङ्कारता छोड़ देते हैं तो केवल मात्सर्यग्रह के कारण 'पर्यायोक्त' के कथन द्वारा भी हमारा पक्ष ही अवलम्बन किया जाता है—यह मतलब है । न कि इतना भी ( व्यङ्ग्य का प्राधान्य भी ) प्राचीनों ने देखा है, अपितु हमने ही उसका उन्मीलन किया है, इस बात को दिखाते हैं—ऐसा नहीं— । भामह को जैसा उसका ( पर्यायोक्त का ) रूप अभिमत था वैसा उदाहरण से दिखाया जा चुका है। वहाँ भी व्यङ्ग्य का प्राधान्य नहीं है, क्योंकि व्यङ्ग्य वहाँ चारुत्व का कारण नहीं है। इसलिए उसका अनुसरण करके जो कुछ दूसरा भी तत्सदृश उदाहरण देंगे वहाँ भी व्यङ्ग का प्राधान्य नहीं होगा—यह ( ग्रन्थ की ) सङ्गति है । यदि उन ( भामह ) के कहे उदाहरण को हटाकर 'भम धम्मिअ०' इत्यादि को उदाहरण देते हैं तो हमारा शिष्य ही बनते हैं। केवल न्याय का अवलम्बन न करके

१२० सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् यदाहुरैतिहासिकाः—'अवज्ञाप्यापवच्छाद्य शृण्वन्नरकमृच्छति' इति । भामहेन ह्युदाहृतम्— 'गृहेष्वध्वसु वा नान्नं भुञ्ज्महे यदधीतिनः । विप्रा न भुञ्जते' इति । एतद्धि भगवद्वासुदेववचनं पर्यायेण रसदानं निषेधति । यत्स एवाह—'तच्च रसदाननिवृत्तये' इति । न चास्य रसदाननिषेधस्य व्यङ्ग्यस्य किञ्चिच्चारुत्व- मस्ति येन प्राधान्यं शङ्क्येत । अपि तु तद्व्यङ्ग्योपोद्वलितं विप्रभोजनेन विना यन्नभोजनं तदेवोक्तप्रकारेण पर्यायोक्तं सत्प्राकरणिकं भोजनार्थमलङ्कुरुते । न ह्यस्य निर्विषं भोजनं भवत्विति विवक्षितमिति पर्यायोक्तमलङ्कार एवेति अपश्रवण द्वारा आत्मा का संस्कार यह अनार्य-चेष्टा है । जैसा कि ऐतिहासिकों ने कहा है—'(विद्या में एवं गुरु के प्रति) अवज्ञा से आत्मापप्लव करके सुनता हुआ व्यक्ति नरक जाता है।' भामह ने उदाहरण दिया है— 'जिस अन्न को स्वाध्याय करने वाले विप्रलोग नहीं खाते उसे हम लोग घरों में और मार्गों में नहीं खाते हैं।' यह भगवान् वासुदेव का वचन 'पर्याय' द्वारा (प्रकारान्तर से) रसदान (विषदान) का निषेध करता है। जो कि वे ही कहते हैं—'रसदान (विषदान) की निवृत्ति के लिए।' इस विषदान के निषेध रूप व्यङ्ग्य का कोई चारुत्व नहीं है, जिससे उसके प्राधान्य की शङ्का होगी। बल्कि उस व्यङ्ग्य से उपोद्वलित 'विप्रभोजन के बिना जो नहीं भोजन है' वही उक्त (पर्याय के) प्रकार से पर्यायोक्त होकर प्राकरणिक भोजन के अर्थ को अलङ्कृत करता है। वासुदेव श्रीकृष्ण का (शिशुपाल के प्रति) यह विवक्षित नहीं है कि विषरहित भोजन हो इस² प्रकार पर्यायोक्त अलङ्कार ही १. यह निर्देश पहले ही कर चुके हैं कि आचार्य भामह ने जो 'पर्यायोक्त' अलङ्कार का उदाहरण दिया है उसमें व्यङ्ग्य की प्रधानता नहीं है। स्वयं उन्होंने 'अभिधीयते' कह-कर व्यङ्ग्य की अपेक्षा वाच्य को प्रधानता दी है। यदि इस बात को न स्वीकार करके 'भम धम्मिअ' इत्यादि को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं तब स्वयं ध्वनिमार्ग के पक्षपाती बनकर हमारी शिष्यता स्वीकार करते हैं। क्योंकि इस स्थल में व्यंग्य की प्रधानता है और तदपेक्षया वाच्य गुणीभूत है। इस प्रकार यह 'ध्वनि' का उदाहरण है। ऐसी स्थिति में 'पर्यायोक्त' कोई अलङ्कार नहीं रह जाता है बल्कि वह अलङ्कार्य होकर अलङ्कार-ध्वनि की स्थिति को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार अनायास ध्वनि का यहाँ प्रसंग उपस्थित हो जाता है। इस प्रकार वादी ने स्वयं ध्वनि को स्वीकार कर लिया और ध्वनिवादी आचार्य का बेढंगा 'शिष्य' हुआ। 'बेढंगा' इसलिए कि उसने परम्परा से गुरु के यहाँ उपस्थित होकर अध्ययन नहीं किया और स्वयं गुरु की बात तक जैसे-तैसे पहुँच गया। नियमतः शिष्य को गुरु के मुख से ही शास्त्रार्थ का श्रवण करना चाहिए, यही आर्य-परम्परा है। यदि शिष्य ने ऐसा न किया और विद्या ग्रहण कर लिया तो उसके इस प्रयत्न को 'अपश्रवण' और 'अनार्यचेष्टित' कहा जाता है। २. भगवान् कृष्ण का यह अभिप्राय है कि शिशुपाल कहीं अन्न के साथ मुझे विष न दे दे, इस लिए वह पहले ब्राह्मणों को खिला कर स्वयं खाने की बात करते हैं। इस प्रकार प्रस्तुत उदाहरण में