ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्राधान्येन व्यङ्ग्यत्वं तद्भवतु नाम तस्य ध्वनावन्तर्भावः । न तु ध्वने- अन्तर्भाव हो भी जाय, परन्तु ध्वनि का उसमें अन्तर्भाव नहीं होगा । क्योंकि उसका लोचनम् पर्यायोक्तं यदन्येन प्रकारेणाभिधीयते । वाच्यवाचकवृत्तिभ्यां शून्येनावगमात्मना ।। इति लक्षणम् । यथा— शत्रुच्छेददृढेच्छस्य मुनेरुत्पथगामिनः । रामस्यानेन धनुषा देशिता धर्मदेशना ।। इति । अत्र भीष्मस्य भार्गवप्रभावाभिभावी प्रभाव इति यद्यपि प्रतीयते, तथापि तत्सहायेन देशिता धर्मदेशनेत्यभिधीयमानेनैव काव्यार्थोऽलंकृतः । अत एव पर्यायेण प्रकारान्तरेणावगमात्मना व्यङ्ग्येनोपलक्षितं सद्यदभिधीयते तदभिधी- यमानमुक्तमेव सत्पर्यायोक्तमित्यभिधीयत इति लक्षणपदम्, पर्यायोक्तमिति लक्ष्यपदम्, अर्थालङ्कारत्वं सामान्यलक्षणं चेति सर्वं युज्यते । यदि त्वभिधीयत इत्यस्य बलाद्व्याख्यानमभिधीयते प्रतीयते प्रधानतयेति, उदाहरणं च 'भम धम्मिअ' इत्यादि, तदालङ्कारत्वमेव दूरे सम्पन्नमात्मतायां पर्यवसानात् । तदा चालङ्कारमध्ये गणना न कार्या । भेदान्तराणि चास्य वक्तव्यानि । तदाह— यदि प्राधान्येनेति । ध्वनाविति । आत्मन्यन्तर्भावादात्मैवासौ नालङ्कारस्स्यादि- किया है, न कि उद्भट के ही अभिप्राय से ग्रन्थ व्यवस्थित है, ऐसा मानना चाहिए । 'जो प्रकारान्तर से अभिधान किया जाता है, अर्थात् और वाचक के व्यापारों से रहित, व्यञ्जन रूप व्यापार से जो कहा जाता है वह पर्यायोक्त ( अलङ्कार ) है ।' यह लक्षण है । जैसे—'शत्रु के विनाश की दृढ़ इच्छा वाले, उन्मार्गगामी मुनि ( परशुराम ) को ( भीष्म के ) इस धनुष ने धर्म-पालन की शिक्षा दी ।' यहाँ यद्यपि भीष्म का भार्गव-परशुराम के प्रभाव को अभिभूत करने वाला प्रभाव प्रतीत होता है, तथापि उस ( प्रतीयमानार्थ ) की सहायता से 'धर्म-पालन की शिक्षा दी' इस अभिधीयमान ( वाच्यार्थ ) से ही काव्यार्थ अलङ्कृत है । अत एव पर्याय अर्थात् प्रकारान्तर से अवगम रूप व्यङ्ग्य से उपलक्षित होकर जो अभिहित होता है वह अभिधीयमान उक्त ही होकर 'पर्यायोक्त' कहलाता है, यह लक्षण-पद है, एवं 'पर्यायोक्त' यह लक्ष्य-पद है । और इसका अर्थालङ्कारत्व रूप अलङ्कार का सामान्य लक्षण है । यह सब कुछ उसमें लग जाता है । यदि—'अभिधीयते' ( 'अभिहित होता है' ) इसका बलाद् व्याख्यान 'प्रधान रूप से प्रतीत होता है, यह करते हैं, और 'भम धम्मिअ' इत्यादि का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तब इसका अलङ्कारत्व ही दूर हट जायगा, क्योंकि 'आत्मा' के रूप में इसका पर्यवसान होगा । तब अलङ्कारों के बीच गणना न होगी । इसके भेदान्तर भी कहे जायेंगे । इसे कहते हैं—यदि प्रधान रूप से— । ध्वनि में— । अर्थात् आत्मा में अन्तर्भाव होने से वह आत्मा ही होगा,