ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः ११५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः स्तरान्तर्भावः । तस्य महाविषयत्वेनाङ्गित्वेन च प्रतिपादयिष्यमाण- त्वात् । न पुनः पर्यायो भामहोदाहृतसदृशे व्यङ्ग्यस्यैव प्राधान्यम् । वाच्यस्य तत्रोपसर्जनीभावेनाविवक्षितत्वात् । महाविषय रूप एवं अङ्गीरूप से प्रतिपादन करेंगे । ऐसा नहीं कि जैसा भामह ने जिस 'पर्यायोक्त' को कहा है उसके सदृश पर्यायोक्त में व्यङ्ग्य का ही प्राधान्य है, क्योंकि वहाँ वाच्य के उपसर्जनीभाव ( गुणीभाव ) की विवक्षा नहीं की गयी है । लोचनम् त्यर्थः । तत्रेति । यादृशोऽलङ्कारत्वेन विवक्षितस्तादृशे ध्वनिर्नान्तर्भवति, न तादृगस्माभिर्ध्वनिरुक्तः । ध्वनिहिं महाविषयः सर्वत्र भावाव्यापकः समस्तप्र- तिष्ठास्थानत्वाच्चाङ्गी । न चालङ्कारो व्यापकोऽन्यालङ्कारवत् । न चाङ्गी, अलङ्कार्यतन्त्रत्वात् । अथ व्यापकत्वाङ्गित्वे तस्योपगम्येते, त्यज्यते चालङ्का- रता, तर्ह्यस्मन्नय एवायमवलम्ब्यते केवलं मात्सर्यग्रहात्पर्यायोक्तवाचेति भावः । न चेयदपि प्राक्तनैर्दृष्टमपि त्वस्माभिरेवोन्मीलितमिति दर्शयति-न पुनरिति । भामहस्य यादृक्तदीयं रूपमभिमतं तादृगुदाहरणेन दर्शितम् । तत्रापि नैव व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यं चारुत्वाहेतुत्वात् । तेन तदनुसारितया तत्सदृशं यदुदाहर- णान्तरमपि कल्प्यते तत्र नैव व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यमिति सङ्गतिः । यदि तु तदुक्तमुदाहरणमनादृत्य 'भम धम्मिअ' इत्याद्युदाह्रियते, तदस्म- च्छिष्यतैव । केवलं तु नयमनवलम्ब्यापह्नवशेनात्मसंस्कार इत्यनार्यचेष्टितम् । अलङ्कार नहीं । वहाँ— । अलङ्कार के रूप में जैसा विवक्षित है वैसे में ध्वनि का अन्तर्भाव नहीं होगा, हमने उस प्रकार 'ध्वनि' को नहीं कहा है । क्योंकि 'ध्वनि' महाविषय है, सर्वत्र होने से व्यापक और सबका प्रतिष्ठान ( आधार ) होने से अङ्गी है । अलङ्कार दूसरे अलङ्कारों की तरह व्यापक नहीं है और अङ्गी भी नहीं है, क्योंकि वह अपने अलङ्कार्य के अधीन होता है। अगर उस ( अलङ्कार ) का व्यापकत्व एवं अङ्गत्व मानते हैं और अलङ्कारता छोड़ देते हैं तो केवल मात्सर्यग्रह के कारण 'पर्यायोक्त' के कथन द्वारा भी हमारा पक्ष ही अवलम्बन किया जाता है—यह मतलब है । न कि इतना भी ( व्यङ्ग्य का प्राधान्य भी ) प्राचीनों ने देखा है, अपितु हमने ही उसका उन्मीलन किया है, इस बात को दिखाते हैं—ऐसा नहीं— । भामह को जैसा उसका ( पर्यायोक्त का ) रूप अभिमत था वैसा उदाहरण से दिखाया जा चुका है। वहाँ भी व्यङ्ग्य का प्राधान्य नहीं है, क्योंकि व्यङ्ग्य वहाँ चारुत्व का कारण नहीं है। इसलिए उसका अनुसरण करके जो कुछ दूसरा भी तत्सदृश उदाहरण देंगे वहाँ भी व्यङ्ग का प्राधान्य नहीं होगा—यह ( ग्रन्थ की ) सङ्गति है । यदि उन ( भामह ) के कहे उदाहरण को हटाकर 'भम धम्मिअ०' इत्यादि को उदाहरण देते हैं तो हमारा शिष्य ही बनते हैं। केवल न्याय का अवलम्बन न करके