ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १२१ ध्वन्यालोकः अपह्नुतिदीपकयोः पुनर्वाच्यस्य प्राधान्यं व्यङ्ग्यस्य चानुयायित्वं प्रसिद्धमेव । और फिर अपह्नुति और दीपक (अलङ्कारों) में वाच्य का प्राधान्य और व्यङ्ग्य का अनुयायित्व प्रसिद्ध ही है । लोचनम् चिरन्तनानामभिमत इति तात्पर्यम् । अपह्नुतिदीपकयोरिति । एतत्पूर्वमेव निर्णीतम् । अत एवाह—प्रसिद्धमिति । प्रतीतं प्रसाधितं प्रामाणिकं चेत्यर्थः । पूर्वं चैतदुपमादिव्यपदेशभाजनमेव तद्यथा न भवतीत्यमुया छायया दृष्टान्त- तयोक्तमप्युद्देशकूमपूरणाय ग्रन्थशय्यां योजयितुं पुनरप्युक्तं 'व्यङ्ग्यप्राधान्या- भावान्न ध्वनिरि'ति छायान्तरेण वस्तु पुनरेकमेवोपमाया एव व्यङ्ग्यत्वेन ध्वनित्वाशङ्कनात् । यत्तु विवरणकृत्—दीपकस्य सर्वत्रोपमान्वयो नास्तीति बहुनोदाहरणप्रपञ्चेन विचारितवांस्तदनुपयोगि निस्सारं सुप्रतिक्षेपं च । प्राचीनों का अभिमत है, यह तात्पर्य है । अपह्नुति और दीपक में— । यह पहले ही निर्णय कर चुके हैं । अत एव कहते हैं—प्रसिद्ध— । अर्थात् प्रतीत, प्रसाधित एवं प्रामाणिक है । पहले तो यह 'उपमादि के व्यपदेश का भाजन ही जिस प्रकार नहीं हो सकता' इस प्रकार से दृष्टान्त के रूप में उक्त होकर भी उद्देश क्रम की पूर्ति के लिए एवं ग्रन्थशय्या की योजना¹ के लिए फिर भी कहा है—'व्यङ्ग्य का प्राधान्य न होने के कारण ध्वनि नहीं है ।' प्रकारान्तर से ( अप्राधान्य रूप ) वस्तु एक ही है इस प्रकार उपमा के व्यङ्ग्य होने से 'ध्वनि' की शङ्का नहीं । जो कि विवरणकार ने— 'दीपक का सर्वत्र उपमा से सम्बन्ध नहीं है' यह बहुत से उदाहरण—प्रपञ्च द्वारा विचार किया है, वह उपयोगी नहीं, तथा निःसार एवं सहज ही निराकरणीय है । रस अर्थात् विष के दान का निषेध पर्याय या प्रकारान्तर से है व्यंग्य, किन्तु यह व्यङ्ग्य आगे की 'तच्च रसदाननिवृत्तये' ( विषदान की निवृत्ति के लिए ) इस उक्ति से अभिहित हो जाता है । इस प्रकार यह पर्यायोक्त अलङ्कार है । क्योंकि अभिहित हो जाने के कारण व्यंग्य का चमत्कार जाता रहता है । १. पहले 'समासोक्ति' और 'आक्षेप' के प्रसंग में यह भी सिद्धान्ततः आचार्य ने कहा था कि व्यंग्य और वाच्य में जो चारुत्वयुक्त होने के कारण प्रधान होता है उसी के आधार पर व्यपदेश भी होता है । इसके उदाहरणस्वरूप उन्होंने वहाँ दीपक और अपह्नुति की चर्चा की थी, जिनमें उपमा व्यंग्य होती हुई भी प्राधान्यतः विवक्षित नहीं है । प्रस्तुत में पुनः अपह्नुति और दीपक अलङ्कारों के उल्लेख पहले उल्लिखित अलङ्कारों के उद्देशक्रम की पूर्ति करने एवं ग्रन्थशय्या की योजना के उद्देश्य से ग्रन्थकार ने किया है । समासोक्ति, आक्षेप, अनुक्तनिमित्त विशेषोक्ति, पर्यायोक्त, अपह्नुति, दीपक और सङ्कर अलङ्कारों का नामोल्लेख किया है । इसी क्रम में पर्यायोक्त के बाद अपह्नुति और दीपक की यहाँ चर्चा हुई है ।