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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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१२२ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः

सङ्करालङ्कारेऽपि यदालंकारोऽलंकारान्तरच्छायामनुगृह्णाति, तदा व्यङ्ग्यस्य प्राधान्येनाविवक्षितत्वान्न ध्वनिविषयत्वम् । सङ्करालङ्कार में भी जब अलङ्कार दूसरे अलङ्कार की छाया (सौन्दर्य) को अनुगृहीत (पुष्ट) करता है तब व्यङ्ग्य के प्राधान्यतः विवक्षित न होने पर ध्वनि का विषय नहीं होता।

लोचनम्

'मदो जनयति प्रीतिं सानङ्गं मानभञ्जनम् । स प्रियासङ्गमोत्कण्ठां सासह्यां मनसः शुचम् ॥ इति ॥ अत्राप्युत्तरोत्तरजन्यत्वेऽप्युपमानोपमेयभावस्य सुकल्पत्वात् । न हि क्रमिकाणां नोपमानोपमेयभावः । तथा हि— राम इव दशरथोऽभूद्दशरथ इव रघुरजोऽपि रघुसदृशः । अज इव दिलीपवंशश्चित्रं रामस्य कीर्तिरियम् ॥ इति न न भवति। तस्मात्क्रमिकत्वं समं वा प्राकरणिकत्वमुपमां निरुणद्धीति कोऽयं त्रास इत्यलं गर्द्दभीदोहानुवर्तनेन । सङ्करालङ्कारेऽपीति । 'मद प्रीति उत्पन्न करता है, वह (प्रीति) मान को दूर करने वाले अनङ्ग को, वह (अनङ्ग) प्रियतमा के सङ्गम की उत्कण्ठा को और वह (उत्कण्ठा) मन के शोक को।' यहाँ उत्तरोत्तर उत्पन्न होने पर भी उपमानोपमेयभाव सहज ही बन सकता है। यह नहीं कि क्रमिकों का उपमानोपमेयभाव नहीं होता। जैसा कि— राम के सदृश दशरथ हुए, दशरथ के सदृश रघु, रघु के सदृश अज एवं अज के समान दिलीप का वंश। इस प्रकार राम की कीर्ति आश्चर्ययुक्त है। यहाँ (उपमानोपमेयभाव) नहीं है यह नहीं। इस लिए क्रमिकत्व, सम अथवा प्राकरणिकत्व उपमा को रोक लेता है, यह कौन सा त्रास है ? अब गर्दभी को बार-बार दुहना ठीक नहीं। सङ्करालङ्कार में भी— ।


१. 'लोचन' में निर्दिष्ट 'सङ्करालङ्कार' के सम्बन्ध में संक्षिप्त किन्तु स्पष्टार्थ विचार यह है कि भामह आदि ने 'सङ्कर' के चार प्रकार गिनाए हैं, जब कि आगे चल कर उसके तीन ही प्रकार निर्दिष्ट किए जाते हैं। तीन प्रकार हैं—अङ्गाङ्गिभावसङ्कर, एकाश्रयानुप्रवेशसङ्कर और सन्देहसङ्कर । भामह ने एकाश्रयानुप्रवेश को एकवाक्यानुवर्तन और एकवाक्यांशसमावेश इन दो रूपों में विभक्त कर दिया है ! जैसा कि 'सन्देह' सङ्कर का उदाहरण 'सरसिजवदना' आदि है वहाँ रूपक के अनुसार समास करने पर, कि 'शशी एव वदनं यस्याः सा' और उपमा के अनुसार समास करने पर, 'शशिवद् वदनं यस्याः सा' रूप होंगे। तीनों विशेषण क्रमशः आकाश, जल और स्थल से सम्बन्ध होने से नायिका का उसमें सम्भव होना बोधित होता है। यहाँ पर कोई प्रमाण नहीं जिसके आधार पर