भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 680 में से

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पृष्ठ 183

प्रथम उद्योतः १२३ लोचनम् विरुद्धालंक्रियोल्लेखे समं तद्वृत्त्यसम्भवे । एकस्य च ग्रहे न्यायदोषाभावे च सङ्करः ॥ इति लक्षणादेकः प्रकारः । यथा ममैव- शशिवदनाऽसितसरसिजनयना सितकुन्ददशनपङ्क्तिरियम् । गगनजलस्थलसम्भवहृद्याकारा कृता विधिना ॥ इति ॥ अत्र शशी वदनमस्याः तद्वद्वा वदनमस्या इति रूपकोपमोल्लेखाद्युगपद् द्वयासम्भवादेकतरपक्षत्यागग्रहणे प्रमाणाभावत्सङ्कर इति व्यङ्ग्यवाच्यतया एवानिश्चयात्क्व ध्वनिसम्भावना । योऽपि द्वितीयः प्रकारः- शब्दार्थालङ्काराणा- मेकत्रभाव इति तत्रापि प्रतीयमानस्य का शङ्का । यथा-‘स्मर स्मरमिव प्रियं रमयसे यमालिङ्गनात्’ इति । अत्रैव यमकमुपमा च । तृतीयः प्रकारः-यत्रैकत्र वाक्यांशेऽनेकोऽर्थालङ्कारस्तत्रापि द्वयोः साम्यात्कस्य व्यङ्ग्यता । यथा- विरुद्ध दो अलङ्कारों के उपस्थित होने पर, एक ही स्थान में दोनों की स्थिति सम्भव न होने पर और उनमें से एक को छोड़कर दूसरे के ग्रहण करने में साधक एवं बाधक के अभाव में सङ्कर ( सन्देह सङ्कर ) होता है । इस लक्षण से एक प्रकार का सङ्कर हुआ । जैसे, मेरा ही- ‘शशिवदना, नीलकमलनयना, उज्ज्वलकुन्ददन्तावली इस नायिका को विधाता ने आकाश, जल और स्थल में उत्पन्न होने वाले मनोहर पदार्थों के आकार वाली बनाया है ।’ यहाँ शशी वदन है इसका, अथवा शशी के समान वदन है इसका, यह रूपक और उपमा दो अलङ्कारों के उल्लेख से एक स्थान में दोनों के सम्भव न होने के कारण तथा एकतर पक्ष के त्याग अथवा ग्रहण में प्रमाण के अभाव होने से ‘सङ्कर’ अलङ्कार है, इस प्रकार जब ‘सङ्कर’ के व्यङ्ग्य होने अथवा वाच्य होने में ही कोई निश्चय नहीं तब इसके ‘ध्वनि’ होने की सम्भावना कैसी ? जो कि दूसरा (सङ्कर अलङ्कार का ) प्रकार है-शब्दालङ्कार और अर्थालङ्कार का एकत्र भाव, वहाँ भी प्रतीयमान की सम्भावना कैसी ? जैसे-‘काम के सदृश प्रिय को याद कर जिसे आलिङ्गन के द्वारा तू रमाती है ।’ यहीं यमक और उपमा है । तीसरा प्रकार-जहाँ एक वाक्यांश में अनेक अर्थालङ्कार हैं, वहाँ भी दो के बराबर होने से किसकी व्यङ्ग्यता होगी ? जैसे- यह माना जाय कि उपमा और रूपक में से कोई एक है। इस प्रकार यहाँ दोनों का सन्देह रूप सङ्कर है। दूसरा प्रकार है, शब्द और अर्थ के अलङ्कारों का एक वाक्य में प्रवेश । तीसरा प्रकार है एक वाक्यांश में अनेक अर्थालङ्कार । द्वितीय प्रकार के उदाहरण में ‘स्मर-स्मर’ इस आवृत्ति से यमक ( शब्दालङ्कार ) है और ‘स्मर’ ( काम ) के सदृश’ ( स्मरमिव ) यह उपमा ( अर्थालङ्कार ) । इस प्रकार दोनों का एकाश्रयानुवेश है । तीसरे प्रकार के उदाहरण में सूर्य स्वामी है और वासर सेवक हैं । सूर्य का अस्त होना स्वामी पर विपत्ति है और वासर का तमोगुहा में प्रवेश समुचित