ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १२५ ध्वन्यालोकः अलङ्कारद्वयसम्भावनायां तु वाच्यव्यङ्ग्ययोः समं प्राधान्यम् । अथ वाच्योपसर्जनीभावेन व्यङ्ग्यस्य तत्रावस्थानं तदा सोऽपि ध्वनिविषयोऽस्तु, न तु स एव ध्वनिरिति वक्तुं शक्यम् । पर्यायोक्त- निर्दिष्टन्यायात् । दो अलङ्कारों की सम्भावना में तो वाच्य और व्यङ्ग्य का प्राधान्य बराबर है । यदि कहिये कि वाच्य को गुणीभूत करके व्यङ्ग्य का वहाँ अवस्थान है तब वह भी 'ध्वनि' का विषय हो सकता है, न कि वही 'ध्वनि' है, ऐसा कह सकते हैं । जैसा कि 'पर्यायोक्त' में ढंग दिखा चुके हैं । लोचनम् परस्परोपकारेण यत्रालङ्कृतयः स्थिताः । स्वातन्त्र्येणात्मलाभं नो लभन्ते सोऽपि सङ्करः ॥ तदाह-यदालङ्कार इत्यादि । एवं चतुर्थेऽपि प्रकारे ध्वनिता निराकृता । मध्यमयोस्तु व्यङ्ग्यसम्भावनैव नास्तीत्युक्तम् । आद्ये तु प्रकारे 'शशिवदने'त्या- युदाहृते कथञ्चिदस्ति सम्भावनेत्याशङ्क्य निराकरोति—अलङ्कारद्वयेति । सममिति । द्वयोरप्यान्दोल्यमानत्वादिति भावः । ननु यत्र व्यङ्ग्यमेव प्राधान्येन भाति तत्र किं कर्तव्यम् । यथा— होइ ण गुणाणुराओ खलाणं णवरं प्रसिद्धिसरणाणम् । किर पहिणुसइ ससिमणं चन्दे पिआमुहे दिट्ठे ॥ अत्रार्थान्तरन्यासस्तावद्वाच्यत्वेनाभाति, व्यतिरेकापह्नुती तु व्यङ्ग्यत्वेन प्रधानतयेत्यभिप्रायेणाशङ्कते—अथेति । तत्रोत्तरम्—तदा सोऽपीति । सङ्करा- 'जहाँ परस्पर उपकार-पूर्वक अलङ्कार स्थित हैं और स्वतन्त्र रूप से आत्मलाभ नहीं प्राप्त करते हैं, वह भी 'सङ्कर' है ।' उसे कहते हैं—जब अलङ्कार इत्यादि— । इस प्रकार (सङ्कर) के चौथे प्रकार में भी ध्वनित्व का निराकरणीय किया । बिचले दो प्रकारों में तो व्यङ्ग्य की सम्भावना ही नहीं है, यह कहा । 'शशिवदना०' इत्यादि उदाहृत (सङ्कर के) पहले प्रकार में किसी प्रकार सम्भावना है, यह आशङ्का करके निराकरण करते हैं—दो अलङ्कारों— । बराबर— । भाव यह कि क्योंकि दोनों ही आन्दोल्यमान (सन्दिह्यमान) हैं । जहाँ व्यङ्ग्य ही प्राधान्यतः मालूम होता है—वहाँ क्या करेंगे ? जैसे— 'केवल प्रसिद्धि पर ही ध्यान देने वाले (वस्तुतत्त्व का विचार न रखने वाले) खल जनों के गुणानुराग नहीं होता । चन्द्रकान्त मणि चन्द्र को देखकर प्रस्रुत होता है, प्रिया के मुख को देखकर नहीं प्रस्रुत होता ।' यहाँ¹ 'अर्थान्तरन्यास' वाच्यरूप से मालूम पड़ता है, किन्तु 'व्यतिरेक' और १. सामान्य का विशेष से समर्थनरूप यहाँ 'अर्थान्तरन्यास' अलङ्कार है, जो वाच्य है । क्योंकि